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संपादकीय

जेल की सज़ा मे मंत्री जी की मौज….

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अनिल अनूप 

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मंत्री जी किसी बैरक में कैद नहीं हैं, बल्कि एक विशेष कक्ष में वह आरामफरमा हैं। उस कक्ष में कुर्सियां, टीवी, मोबाइल चार्जर, मिनरल वाटर की बोतलें, चार व्यक्ति, जेल की पोशाक के बजाय टी-शर्ट और मालिश करने वाले सेवादार भी….

सत्येन्द्र जैन मौजूदा दिल्ली सरकार में जेल एवं स्वास्थ्य मंत्री थे। अब वह एक आरोपित और विचाराधीन कैदी के तौर पर तिहाड़ जेल में बंद हैं। बीती 30 मई से वह जेल में हैं और अदालत उन्हें जमानत देने की पक्षधर नहीं है। अदालत प्रथमद्रष्ट्या धनशोधन और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप मानती रही है। बेशक वह जेल में हैं, लेकिन मुख्यमंत्री केजरीवाल ने उन्हें ‘बिना विभाग का मंत्री’ बनाकर उनका संवैधानिक रुतबा बरकरार रखा है। कैसा है हमारा संविधान और कानून…? हम भी मानते हैं कि कैबिनेट चुनना किसी भी मुख्यमंत्री का संवैधानिक विशेषाधिकार है, लेकिन किसी मंत्री पर गंभीर आरोप हैं और वह कानूनन छह माह से जेल में कैद है, तो क्या मुख्यमंत्री का नैतिक और ईमानदार दायित्व नहीं बनता कि उस मंत्री को कैबिनेट से बर्खास्त किया जाए? यदि बाद में अदालत उन्हें ‘दोषहीन’ करार देते हुए बरी करती है, तो उस मंत्री को दोबारा कैबिनेट में शामिल किया जा सकता है, लेकिन मुख्यमंत्री केजरीवाल ने जिस तरह संवैधानिक विशेषाधिकार का दुरुपयोग कर सत्येन्द्र जैन को मंत्री बनाए रखा है, उसके पीछे मुख्यमंत्री की भी बदनीयत समझ आ रही है। यह सवाल अदालत में भी उठा है, लेकिन संवैधानिक विशेषाधिकार के आगे अदालत भी असहाय दिखी है।

क्या ऐसे संवैधानिक प्रावधानों में संशोधन नहीं किया जाना चाहिए? दरअसल मुख्यमंत्री अपने मंत्री की ‘परोक्ष ताकत’ को कायम रखना चाहते हैं। जिस शुचिता, ईमानदारी और नैतिकता की बुलंद हुंकारों के साथ केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी (आप) राजनीति में उतरे थे और अद्र्धराज्य दिल्ली में 2015 से लगातार सत्तारूढ़ हैं, वे सब आज ढोंग लगते हैं। बेशक सत्येन्द्र जैन आज भी मंत्री हैं, लेकिन जेल में वह एक सामान्य, विचाराधीन कैदी हैं, क्योंकि राजनेताओं का ‘अतिविशिष्ट दर्जा’ और जेल के भीतर ‘ऐयाश कक्ष’ की व्यवस्था केजरीवाल सरकार ने ही समाप्त की थी। हालांकि उनका ऐसा दावा ‘हकीकत’ नहीं लगता, क्योंकि एक वीडियो के जरिए बहुत कुछ बेनकाब हुआ है। हालांकि हम सार्वजनिक वीडियो की पुष्टि नहीं करते, लेकिन मीडिया की आंखों के सामने जो कुछ दृश्यमान हो रहा है, उसे नजरअंदाज कैसे किया जा सकता है? जेल में मंत्री सत्येन्द्र जैन एक ऐयाश जिन्दगी जी रहे हैं। वीडियो से जो स्पष्ट है, मंत्री जी किसी बैरक में कैद नहीं हैं, बल्कि एक विशेष कक्ष में वह आरामफरमा हैं। उस कक्ष में कुर्सियां, टीवी, मोबाइल चार्जर, मिनरल वाटर की बोतलें, चार व्यक्ति, जेल की पोशाक के बजाय टी-शर्ट और मालिश करने वाले सेवादार भी हैं। वे हाजिर लोग कौन हैं? यदि मंत्री के साथ कोई दुर्घटना हो गई, तो जिम्मेदार कौन होगा? यही नहीं, मंत्री जी की धर्मपत्नी औसतन हररोज़ घर का खाना लाती हैं। साथ में बादाम, काजू, खजूर और दूध भी लाती हैं। मंत्री के साथ धनशोधन, हवाला हरकतों आदि के अन्य आरोपित भी उनसे मुलाकात करने आते हैं।

साक्ष्यों से खिलवाड़ किया जा सकता है या कोई और रणनीति अपना कर जांच को नाकाम किया जा सकता है, लिहाजा ऐसी शिकायत प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी अदालत में दर्ज कराई थी। क्या अदालत कोई संज्ञान लेगी? बहरहाल मान लेते हैं कि सत्येन्द्र जैन जेल के भीतर गिर कर चोटिल हुए थे, जैसा कि उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने खुलासा किया है। यह भी दावा किया गया कि मंत्री की रीढ़ की हड्डी क्षतिग्रस्त हुई और उस पर दो ऑपरेशन करने पड़े। यदि डॉक्टरों के मतानुसार फिजियोथेरेपी करना अनिवार्य है, तो सिर में चंपी करना, पांव में मालिश करना और शरीर दबाना कमोबेश फिजिथेरेपी नहीं है। तिहाड़ जेल में बाकायदा चिकित्सा केंद्र है, जिसमें फिजिथेरेपी की मशीनें, उपकरण और प्रशिक्षित स्टाफ भी है। यह खुलासा करते हुए तिहाड़ के पीआरओ रहे सुनील गुप्ता ने यह भी स्पष्ट किया है कि बैरक या कक्ष में फिजिथेरेपी की अनुमति नहीं है। अलबत्ता कैदी टीवी और मिनरल वाटर की मांग कर सकता है, लेकिन कोई भी कैदी अपने सेल में महफिल नहीं कर सकता और न ही आरोपितों से मुलाकात कर सकता है। ऐसा करना जेल मैन्युअल का उल्लंघन है, जो अपने आप में ‘अपराध’ है। कमाल यह है कि मंत्री जी ने जेल में ही कायदे-कानून की धज्जियां उड़ाई हैं और अदालत में ‘अवमानना याचिका’ दाखिल की है। बहरहाल उसके मद्देनजर ईडी को नोटिस भेजा गया है। यह अदालती औपचारिकता का हिस्सा है, लेकिन इस तरह ‘आप’ की राजनीतिक संस्कृति बेनकाब हुई है।

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