राजनीति

अजब गजब मोड़ पर खड़ी लोकसभा चुनाव 2024 की रणनीति 

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट 

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी धार बनाए रखने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने एक बड़ा दांव खेल दिया है। पार्टी की ओर से सभी धर्मों को साधने के लिए कोशिश तेज हो गई है। लोकसभा चुनाव को लेकर सभी पार्टियां अपने समीकरण को बैठाने में जुटी हुई हैं। इसी क्रम में भाजपा पूर्वांचल से अब तक पांच लोगों को राज्यपाल बना चुकी है। इस इलाके में भाजपा को मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी से चुनौती मिल रही है। माना जा रहा है कि इन राज्यपाल की नियुक्तियों से भाजपा न केवल जातीय समीकरण साधेगी, बल्कि रामचरितमानस और जातीय जनगणना के माध्यम से ओबीसी वोट तोड़ने की विपक्ष की कोशिशों को भी करारा जवाब दिया जा सकेगा। प्रदेश स्तर पर विकासात्मक योजनाओं को अलग रख दें तो विपक्ष की रणनीति को विभिन्न जातीय समूह को साधने की भरसक कोशिश की गई है। अभी चुनाव में भले ही करीब एक साल से ज्यादा का समय बाकी हो, लेकिन भाजपा कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती है। राज्यपाल भले ही राजनीतिक पद न हो, फिर भी चेहरे के जरिए पार्टी एक बड़ा संदेश देने की कोशिश की है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता की मानें तो यूपी में पार्टी सभी सीटों पर जीत चाहती है। लेकिन कुछ दिनों से ऐसे मुद्दे उठाए जा रहे, जो सियासत में जातीय समीकरण को काफी प्रभावित कर सकते हैं। इसी लिहाज से यह कदम उठाया गया है। इसके माध्यम पार्टी को जातीय समीकरण बनाने में मजबूती मिलेगी।

तमाम वर्गों को साधने का प्रयास

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भाजपा तमाम वर्गों को साधने का प्रयास करती दिख रही है। संघ प्रमुख मोहन भागवत के ब्राह्मणों को लेकर दिए गए बयानों के बाद नाराजगी बढ़ने जैसी स्थिति से निपटने के लिए ब्राह्मण चेहरे को आगे किया गया है। वहीं, दलित, पिछड़े और आदिवासी समाज में सेंधमारी की समाजवादी पार्टी की कोशिश से निपटने के लिए इसी समाज के चेहरे को राज्यपाल बनाकर पार्टी ने अलग संदेश दे दिया है। स्वामी प्रसाद मौर्य एक तरफ साधु-संतों और श्रीरामचरितमानस पर बयान देकर सेंधमारी की कोशिशों में जुटे हैं। दूसरी तरफ, भाजपा मिशन 80 के लक्ष्य को साधने की कोशिश कर रही है। विपक्षी वोटों के बिखराव से इतर पार्टी प्रदेश में 50 फीसदी वोट शेयर को इस चुनाव में हासिल करना चाहती है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को 49 फीसदी से अधिक वोट मिले थे। ऐसे में यूपी चुनाव 2022 में भाजपा के लिए परेशानी खड़ी करने वाले पूर्वांचल को साधने की रणनीति पर काम शुरू किया गया है। आइए किन चेहरों के जरिए यह राजनीति साधने की कोशिश हो रही है, इसके बारे में जानते हैं।

फागू चौहान के जरिए ओबीसी को साधने की कोशिश

फागू चौहान ओबीसी समुदाय से आते हैं। घोसी विधानसभा सीट से छह बार विधायक रहे फागू चौहान को जुलाई 2019 में बिहार का राज्यपाल बनाया गया था। चौधरी चरण सिंह के दलित मजदूर किसान पार्टी से वर्ष 1985 में पहली बार चुनाव जीतने वाले फागू चौहान को भाजपा के ओबीसी चेहरे के रूप में जाने जाते रहे हैं। इस वर्ग को साधने में पार्टी उनके चेहरे का इस्तेमाल करेगी। उन्हें अभी बिहार से मेघालय ट्रांसफर किया गया है।

ब्राह्मणों को साधेंगे शिव प्रताप शुक्ला

गोरखपुर से आने वाले शिव प्रताप शुक्ला को राज्यपाल बनाया गया है। उन्हें हिमाचल प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य की जिम्मेदारी दी गई है। हिमाचल प्रदेश में पिछले वर्ष हुए चुनाव में सत्ता परिवर्तन हुआ है। ऐसे में राज्यपाल की भूमिका अहम होने वाली है। वहीं, उनकी नियुक्ति के जरिए पूर्वांचल समेत यूपी के ब्राह्मणों को साधने की कोशिश की गई है। भाजपा ने अपने अनुभवी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शिवप्रताप शुक्ल को कमान देकर ब्राह्मणों को साधने का प्रयास किया है।

मनोज सिन्हा के जरिए ऊपरी जातियों को संदेश

मनोज सिन्हा भूमिहार जाति से आते हैं। जम्मू कश्मीर के उप राज्यपाल के पद पर रहते हुए उन्होंने वहां पर विकास के कई कार्यक्रम चलाए हैं। एक संवेदनशील राज्य में माहौल को सामान्य बनाने के उनके प्रयासों की सराहना हुई है। पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर पहुंची कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने में भी उनके प्रशासनिक कौशल की झलक दिखी। कश्मीर में बदलती स्थिति की चर्चा सदन में पीएम नरेंद्र मोदी ने भी की। उन्हें वहां अभी एलजी के पद पर बरकरार रखा गया है। ऐसे में बिहार और यूपी के उच्च वर्ग को बड़ा संदेश देने का प्रयास है। वे पूर्वांचल क्षेत्र के गाजीपुर के जमनिया इलाके से आते हैं।

कलराज मिश्र रहे हैं भाजपा का चेहरा

भाजपा के चेहरों में कलराज मिश्र का नाम भी सामने आता रहा है। गाजीपुर के सैदपुर में 1 जुलाई 1941 को जन्मे कलराज मिश्र को यूपी की ब्राह्मण राजनीति का बड़ा चेहरा माना जाता है। उम्र बढ़ने के कारण वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के मैदान में नहीं उतारा गया। इसके बाद जुलाई 2019 में उन्हें भाजपा सरकार ने राजस्थान का राज्यपाल नियुक्त कर दिया। अभी वे इसी पद पर कार्यकरत हैं। पूर्वांचल और यूपी की ब्राह्मण राजनीति को भाजपा उनके चेहरे के सहारे भी भुनाती रही है। एक बार फिर यही प्रयास होगा।

लक्ष्मण आचार्य को भी जिम्मेदारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले चुनाव संयोजक एमएलसी लक्ष्मण प्रसाद आचार्य को सिक्कम का राज्यपाल बनाया गया है। लक्ष्मण प्रसाद आचार्य अनुसूचित जनजाति समाज से आते हैं। जिन दलित और आदिवासी समाज के मुद्दे स्वामी प्रसाद मौर्य रामचरितमानस विवाद से हवा दे रहे हैं। उसको काटने में लक्ष्मण प्रसाद आचार्य की भूमिका अहम होगी। पूर्वांचल में आदिवासी-दलित समाज के बीच भाजपा की पैठ बनाने में इनकी अच्छी भूमिका मानी जाती है। लक्ष्मण आदिवासी बहुल सोनभद्र के मूल निवासी हैं। जानकारों का मानना है कि प्रदेश में रामचरित मानस की चौपाई के जरिये विपक्ष दलितों और पिछड़ों के बीच भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहा है। केंद्र सरकार ने आचार्य की नियुक्ति के जरिए इन वर्गों को संदेश देने की कोशिश की है कि भाजपा के लिए पिछड़ों और दलितों का महत्व सर्वोपरि है।

samachar

"कलम हमेशा लिखती हैं इतिहास क्रांति के नारों का, कलमकार की कलम ख़रीदे सत्ता की औकात नहीं.."

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