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विचार

विद्यालयों को आनंदघर बनाने की जरूरत

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प्रमोद दीक्षित मलय

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आज ‘बालदेवो भव’ के उपासक और शिक्षक समुदाय एवं समाज के समक्ष विद्यालयों को आनंदघर बनाने का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करने वाले शिक्षाविद् गिरिजाशंकर भगवानदास बधेका का जन्मदिवस है, जिन्हें हम ‘गिजुभाई बधेका’ उपनाम से जानते हैं। उन्होंने शिक्षा में व्याप्त जड़ता, उपदेशात्मक, तोतारटंत एवं अध्यापक केंद्रित शिक्षण पद्धति से जूझकर लोकतांत्रिक, बालकेंद्रित एवं समझ आधारित आनंदमय शिक्षण पद्धति प्रचलित करते हुए विद्यालयों को आनंदघर के रूप में विकसित करने, रूपांतरित करने का न केवल विचार प्रस्तुत किया बल्कि पहल करते हुए उस विचार को साकार कर उदाहरण भी उपस्थित किया।

पाठकों के मन में अब यह सवाल उभरना स्वाभाविक है कि आनंदघर विद्यालय क्या है, किस विद्यालय को आनंदघर का दर्जा दिया जाये।

आनंदघर विद्यालय के बारे में विचार रखने के पहले मुझे लगता है कि विद्यालयों एवं शिक्षकों को लेकर अभिभावकों एवं समुदाय में बनी छवि को पकड़ने की कोशिश की जाये।सामान्यतौर पर बच्चे उमंग, उल्लास एवं उत्साह से भरे रहते हैं। उनके अंदर रचनात्मक ऊर्जा का प्रवाह सतत गतिमान होता है। वे हमेशा कुछ नया रचते-गुनते रहते हैं। अपनी कल्पना को साकार रूप देने के अवसर और जगह तलाशते रहते हैं और जहां भी उनको उचित मौके मिलते हैं, वे अपनी सर्जना का आरम्भ करने लगते हैं।

हमारे परिवारों एवं पड़ोस में कम उम्र के ऐसे बच्चे होते हैं जो विद्यालय नहीं जा रहे होते हैं। वे घर-पड़ोस में ही पूरा दिन गुजारते हैं। गहराई से देखें कि वे बच्चे रचनात्मकता का प्रकटीकरण कैसे करते हैं। अनुभव से गुजरे कुछ उदाहरण साझा करता हूं। पड़ोस के एक घर में चार साल के एक बच्चे अक्षांश ने एक दिन मेज पर पड़ा पेन उठाया और पांचवीं में अध्ययनरत अपनी दीदी संस्कृति के विभिन्न विषयों की कापियां बस्ते से निकाल-निकाल चेक कर दीं (किसी को ऐसा करते देखा होगा), खाली पृष्ठों पर आड़ी-तिरछी, खड़ी-पड़ी रेखाओं से चित्र बना दिये, जिसे केवल वही समझ सकता था। बच्चे का यह चित्रांकन देख उसकी मम्मी गुस्सा हुई और कहा कि कल ही स्कूल में नाम लिखवाती हूं तो सब कलाकारी निकल जायेगी। जबकि बच्चे ने एक चित्र को दिखाकर कहा कि यह मम्मी-पापा हैं, यह संस्कृति दीदी है, ये बिल्ली और कुत्ता हैं, हाथी है, घर, टीवी, कुर्सी-मेज, फूल, आम, केला आदि बनाये हैं, जबकि बड़ों को सिवाय टेढ़ी रेखाओं के उनमें वैसा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। पर वह खुश था।

एक अन्य उदाहरण, मेरे घर पर एक किरायेदार थे। उनकी चार साल की बेटी गुनगुन थी। एक दिन घर एक पड़ोसन अपने तीन साल के बच्चे सिमोनी के साथ आईं। वह पत्नी के साथ बातचीत में व्यस्त हो गईं। गुनगुन, सिमोनी को लेकर ऊपर अपने कमरे गयी और मम्मी की लिपिस्टिक निकाल कर पूरे चेहरे पर खूब लगाया। फिर काजल लगाया और अंत में सिंदूर पोत लिया। जब वह पड़ोसन चलने को हुईं तो सिमोनी की खोज हुई। देखा कि दोनों बच्चों का पूरा मुंह, हाथ-पैर लाल। सहसा लगा कि गम्भीर चोट लग गयी और ढेर सारा खून बह गया है। पड़ोसन चिल्लाई कि क्या हुआ। बच्चों ने मासूम सा उत्तर दिया, ” आंटी, हम मंकी-मंकी खेल रहे थे।” दोनों बच्चों की मम्मियों का एक साथ स्वर गूंजा, “स्कूल में नाम लिखा देते हैं तो सब शैतानी निकल जायेगी।”

एक अंतिम उदाहरण और, एक गांव में जहां मैं पदस्थ हूं कि दो व्यक्ति अपने 5-6 साल के बच्चों को लेकर आये और बोले कि ये दिन भर आवारागर्दी, शैतानी और मटरगस्ती करते हैं। मेरे पूछने पर वह बोले कि दिन भर खेत, बगीचों में घूमना, पेड़ पर चढ़ना, चिड़ियों के पंख बीनना, जंगल जलेबी के बीज एकत्रित करना, कंचे खेलना। इसीलिए लाये हैं कि सुधर जायें। बच्चे रुआंसे थे, मेरी किसी भी बात का उत्तर नहीं दे रहे थे। एक दिन जब मैं उन बच्चों और अभिभावकों से मिलने जा रहा था तो उनमें से एक के पिता की आवाज कानों से टकराई कि स्कूल में जब दिन भर बंद रहोगे तो तभी आदमी बनोगे।

इन तीन उदाहारणों में घटनाएं अलग है पर उनसे निकला संदर्भ एक है कि स्कूल एक बाड़ा है, कैद है, जहां बच्चे 6-7 घंटे के लिए बंद हैं, जहां उन्हें अपने मन की करने की आजादी नहीं है और जहां कोई अन्य व्यक्ति अर्थात शिक्षक उनको निर्देशित-नियंत्रित करेगा।

कहना नहीं होगा कि स्कूल कि छवि एक कैदखाने या सर्कस की और शिक्षक रिंग मास्टर या जेलर के रूप में गढ़ दी गयी है। इसीलिए जब अभिभावक बच्चों का दाखिला कराने स्कूल लाते हैं तो वह रोते हैं। यह दृश्य शहरी एवं ग्रामीण स्कूलों में सभी जगह समान रूप से दिखाई देता है। कारण की पड़ताल करें तो यह स्पष्ट होता है कि बच्चों के मन में स्कूलों के प्रति नकारात्मक छवि निर्मित कर दी है जहां तमाम बंधन हैं, गुलामी है, किसी का निर्देश एवं नियंत्रण है। जबकि होना यह चाहिए था कि बच्चों के स्कूल जाने के पूर्व की स्वस्थ सकारात्मक तैयारी होती।

स्कूल को लेकर यह बताया जाता कि वहां तुम्हें अपने मन का काम करने और अपने जैसे तमाम बच्चों के साथ खेलने-कूदने, रचने-गुनने के असीम और स्वतंत्र अवसर मिलेंगे जैसे कि घर और पड़ोस में। नानी के घर जैसी खुशी मिलेगी। गीत, कहानी, खेल और नाटक होंगे। जहां नित नये अनुभवों से गुजर कर सहज सीखना सम्भव हो सकेगा। पर ऐसा हुआ नहीं। रही सही कसर विद्यालयों के नीरसता, जड़ता और शिक्षकों के निष्ठुर व्यवहार ने पूरी कर दी। फलत: बच्चों को विद्यालय अपनी सपनीली जगह नहीं लगी, वे उसे कैद समझने लगे। इसीलिए विद्यालय आते समय बच्चों में उत्साह नहीं दिखता लेकिन छुट्टी के समय बच्चों के चेहरे पर तैरती खुशी, हृदय में उत्ताल उमंग देखी जा सकती है मानो वे मुक्ति का उत्सव मनाने की राह पर निकले हों। लेकिन विद्यालय आनंदघर बन गये होते तो विद्यालय आने की ललक, सीखने की खुशी, अधिक ठहरने का उल्लास विद्यालय परिसर में सिंधु ज्वार सा उमड़ता दृष्टिगोचर होता। लेकिन परिदृश्य केवल नैराश्य से भरा नहीं अपितु आशा का संचार करने वाले उदाहरणों से सुस्मित भी है। बहुत सारे शिक्षक-शिक्षकाएं और शिक्षक समूह इस दिशा में सार्थक प्रयत्न कर रहे हैं।‌ भोपाल के डॉ. दामोदर जैन के नेतृत्व में शिक्षक संदर्भ समूह विद्यालयों को आनंदघर बनाने के संकल्प के साथ बढ़ रहा है और मध्य प्रदेश में ऐसे डेढ़ हजार विद्यालय आनंदघर बनें हैं और अपनी आनंद यात्रा का लेखन कर रहे हैं। ऐसे ही उत्तर प्रदेश में रचनाधर्मी शिक्षक-शिक्षिकाओं का स्वैच्छिक मैत्री समूह शैक्षिक संवाद मंच पचास जिलों में सदस्य साथियों के साथ आनंदघर के रूप में विद्यालय रूपांतरण के अभियान में कटिबद्ध है। इसके पहले कि लेख समाप्त करूं, आनंदघर विद्यालय को समझते हैं।

मुझे लगता है कि जिन विद्यालयों में उमंग, उत्साह एवं सर्जना का ऐसा रचनात्मक वातावरण तैयार हो जहां अभिव्यक्ति के अनुकूल और बेहतर अवसर प्राप्त कर बिना डर, भय एवं तनाव के लोकतांत्रिक परिवेश में बच्चों का सीखना निर्बाध संभव हो सके। जहां बचपन खिले-महके। जहां बच्चों की इच्छा-आकांक्षा और कोमल कल्पनाओं को सुनहरे पंख मिल सकें। जहां उन्हें प्यार-दुलार, सम्मान और मानवोचित गरिमापूर्ण व्यवहार मिले। छात्र-शिक्षक संबंध बाल मैत्रीपूर्ण हों और विद्यालय वह रचना स्थल बने जहां बच्चे परस्पर मिलकर ज्ञान का निर्माण कर सकें। बच्चों की हर नवल सर्जना की स्वीकृति हो, स्थान एवं महत्व हो। शिक्षक पाठ नहीं बच्चों को पढ़ें-पढ़ायें। शिक्षक आनंदित मन हों जो बच्चों को स्वयं कल्पना करने, सोचने, खोजबीन करने एवं संवाद के अवसर उपलब्ध करायें। जहां उनकी अपनी भाष-बोली और समझ को महत्व मिले और उनके निर्णयों को भी महत्व दिया जाये। घंटी हो नहीं और यदि हो तो बच्चों के लिए विद्यालय की घंटी में शोर नहीं बल्कि संगीत के मधुर स्वर गूंजे, ऐसे विद्यालय को आनंदघर विद्यालय कहा जायेगा। आज विद्यालयों को आनंदघर बनाने की जरूरत है। सरकार, समाज और शिक्षक संगठनों को मिलकर इसे साकार करने संकल्प लेना होगा।विद्यालयों को आनंदघर बनाने की यह यात्रा ऐसे ही गतिमान रहेगी। नये समर्पित साथी जुड़कर इस प्रवाह को समृद्ध करेंगे। हमारे विद्यालय आनंदघर बनकर बच्चों का स्नेह सिंचन करें, यही कामना है।

लेखक शिक्षक एवं शैक्षिक संवाद मंच के संस्थापक हैं। बांदा, उ.प्र.

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