अनिल अनूप
प्रयागराज में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन तट पर महाकुंभ 2025 का यह ऐतिहासिक अध्याय आज अपने समापन की ओर बढ़ रहा है। पिछले कुछ महीनों से इस दिव्य आयोजन ने देश-विदेश के श्रद्धालुओं, संतों, आचार्यों और पर्यटकों को एक साथ जोड़कर एक अद्भुत आध्यात्मिक चेतना का संचार किया। आज जब अंतिम शाही स्नान के साथ यह महायज्ञ पूर्ण हो रहा है, तब यह आवश्यक है कि हम इसकी भव्यता, इसके प्रभाव और इससे मिलने वाली सीख को याद करें।
इतिहास में दर्ज हुआ यह महापर्व
महाकुंभ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारत की सनातन परंपरा, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का उत्सव है। इस बार, ग्रह-नक्षत्रों की दुर्लभ स्थिति के कारण यह कुंभ और भी विशेष बन गया, क्योंकि ऐसा संयोग अब 144 वर्षों के बाद ही दोबारा आएगा। इस ऐतिहासिक अवसर पर 13 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में पवित्र स्नान कर पुण्य अर्जित किया, जिससे यह अब तक का सबसे बड़ा आध्यात्मिक आयोजन बन गया।
उधर जैसे-जैसे कुंभ को लेकर देश में उत्साह और श्रद्धा का उफान आया हुआ था, वैसे-वैसे विपक्षी दलों में निराशा घर करती जा रही थी। लेकिन गहराई से जांचने पर पता चलता था कि यह निराशा कुंभ को लेकर नहीं थी। कुंभ में आस्था बराबर थी और बिना राजनीतिक भेदभाव से सभी संगम पर जा रहे थे, लेकिन दिल्ली, लखनऊ में अपनी राजनीतिक निराशा को जरूर व्यक्त कर रहे थे। ममता बनर्जी तो इतना घबरा गईं कि कुंभ का नाम भूल कर उसे मृत्यु कुंभ ही कहने लगीं। लालू यादव भी विष्णु सहस्रनामा पढ़ते-पढ़ते बड़बड़ाने लगे कुंभ बकबास है। यादवों ने जाकर समझाया क्यों महाराज बुढ़ापे में अंट-संट बतिया रहे हो। बीमारी ठिमारी के चलते आप का भीड़भाड़ में जाना ठीक नहीं है, लेकिन बिरादरी को तो बदनाम मत कीजिए। अखिलेश यादव संगम में नहाते भी जा रहे थे और चचिया भी रहे थे, लेकिन चच्चा को लेकर नहीं गए त्रिवेणी घाट। राजनीति जो न कराए सो थोड़ा। सारा भारत प्रयागराज की ओर चला हुआ था और सारा विपक्ष संगम स्नान भी कर रहा था और स्नान के बाद गिरिया भी रहा था।
श्रद्धालुओं का महासंगम और आस्था का सैलाब
महाकुंभ 2025 में भारत के कोने-कोने से आए साधु-संतों, अखाड़ों, तपस्वियों और आम श्रद्धालुओं ने स्नान और सत्संग के माध्यम से अपनी आस्था को प्रकट किया। अखाड़ों की शाही पेशवाई, विभिन्न संप्रदायों के संतों के प्रवचन, आध्यात्मिक चर्चाएँ और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने इस आयोजन को एक समग्र आध्यात्मिक अनुभव में बदल दिया।
प्रशासन और व्यवस्था: एक चुनौतीपूर्ण कार्य
इतने विशाल जनसैलाब को संभालना प्रशासन के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार के समन्वय से कुंभ का आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। सुरक्षा के कड़े इंतजाम, स्वच्छता मिशन, कुंभ नगरी में यातायात प्रबंधन और डिजिटल तकनीक के उपयोग ने इस आयोजन को एक सुव्यवस्थित और आधुनिक महाकुंभ बना दिया।
ड्रोन सर्विलांस, सीसीटीवी कैमरों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित भीड़ नियंत्रण प्रणाली और ऑनलाइन सूचना सेवा के माध्यम से प्रशासन ने कुंभ की व्यवस्था को ऐतिहासिक रूप से सफल बनाया।
आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव
महाकुंभ 2025 न केवल आध्यात्मिक बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। प्रयागराज और आसपास के क्षेत्रों में व्यापारिक गतिविधियाँ अपने चरम पर रहीं। होटल, परिवहन, खान-पान और धार्मिक वस्तुओं की बिक्री में रिकॉर्ड वृद्धि हुई। पर्यटन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, महाकुंभ से उत्तर प्रदेश को हजारों करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को जबरदस्त बढ़ावा मिला।
इसके साथ ही, दुनिया भर के पत्रकारों, शोधकर्ताओं और पर्यटकों ने इस आयोजन को कवर किया, जिससे भारत की आध्यात्मिक धरोहर को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान मिली।
महाकुंभ की सीख: समरसता और आत्मचिंतन
महाकुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और आत्मचिंतन का अवसर भी है। यहाँ आकर हर व्यक्ति जाति, धर्म, भाषा और वर्ग से ऊपर उठकर एकात्मता के अनुभव से गुजरता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि भारत की आध्यात्मिक विरासत हमें जोड़ने का कार्य करती है, तोड़ने का नहीं।
अब जब यह कुंभ अपने समापन की ओर बढ़ रहा है, तो हम सभी को यह संकल्प लेना चाहिए कि इस आयोजन की पवित्रता और सीख को अपने जीवन में उतारें। समाज में प्रेम, भाईचारे और सहिष्णुता को बढ़ावा दें और अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजें।
अगली पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा
महाकुंभ 2025 का यह ऐतिहासिक आयोजन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा बनकर रहेगा। जो लोग इस बार संगम में स्नान कर चुके हैं, वे इस दिव्य अनुभव को अपनी यादों में संजोएंगे, और जो नहीं आ सके, वे अगले अवसर की प्रतीक्षा करेंगे।
अंततः, महाकुंभ 2025 का समापन केवल एक अनुष्ठान की समाप्ति नहीं, बल्कि एक नए युग की शुरुआत है – एक ऐसा युग जो हमारी सनातन परंपराओं को आधुनिकता के साथ जोड़ता है, हमारी आस्था को विज्ञान से मिलाता है और हमारी संस्कृति को वैश्विक पटल पर स्थापित करता है।
इस ‘भारत उत्सव’ में भारत तो था लेकिन भारत को समझने का दावा करने वाले गायब थे। शायद वे भारत का सामना करने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। हम संगम पर पहुंच गए थे। यह महाकुंभ ऐसा महाकुंभ है, जहां आधे से अधिक भारतीयों ने पवित्र स्नान किया।
हर-हर गंगे! जय महाकुंभ 2025!
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Author: जगदंबा उपाध्याय, मुख्य व्यवसाय प्रभारी
जिद है दुनिया जीतने की