मऊ

विकास के साथ “मातम” का मुद्दा है इस क्षेत्र में लोकसभा चुनाव का ; जातीय गणित से सधती रही है यहाँ की चुनावी केमिस्ट्री

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जगदंबा उपाध्याय की रिपोर्ट

मऊ: घोसी उत्तर प्रदेश की उन बिरले लोकसभा सीटों में है, जिसने सियासत में ‘सबका साथ’ के नारे को वास्तव में जमीन पर उतारा है। कभी यह वामपंथ का गढ़ रहा। कांग्रेस का भी यहां झंडा फहरा। निर्दल ने भी जीत का ताना-बना बुना। बसपा को भी घोसी का साथ मिला तो समाजवाद से लेकर दक्षिणपंथ तक को भी नुमाइंदगी मिली। सपा-भाजपा को एक बार ही सही, लेकिन जीत उनको भी मिली। 

हालांकि, पिछले डेढ़ दशक से घोसी की राजनीति के मुद्दे भी बदले हैं और कलेवर भी। इस बार की लड़ाई त्रिकोणीय है और विकास के साथ ‘मातम’ यानी मुख्तार अंसारी की मौत भी सियासत का मुद्दा है। 

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बुनकरों की कारगरी के लिए मशहूर घोसी का सियासी भूगोल मऊ जिले की चार विधानसभा सीटों मऊ, घोसी, मोहम्मदाबाद-गोहना, मधुबन और बलिया जिले की रसड़ा सीट मिलाकर बुना हुआ है। पूर्वांचल की एकाध सीटों को छोड़ दिया जाय तो जातीय गणित पर ही यहां चुनावी केमिस्ट्री सधती है।

घोसी की सियासत के शुरुआती चार दशकों का ट्रेंड अलग रहा है। लगभग 60 से 70 हजार आबादी वाली भूमिहार बिरादरी से यहां 12 सांसद चुने गए हैं। इस सीट पर लगभग 4 लाख दलित और ढाई से तीन लाख मुस्लिम वोटर हैं। डेढ़ लाख से अधिक राजभर और लगभग इतने ही यादव हैं। 

डेढ़ लाख से अधिक लोनिया चौहान तो राजपूत, ब्राह्मण व वैश्य की सम्मिलित आबादी दो लाख से अधिक है। पिछले दो दशक से नतीजे जातियों की गोलबंदी पर ही तय हो रहे हैं। इस बार भी लोकसभा चुनाव में पक्ष-विपक्ष ने जातीय शतरंज पर ही अपने मोहरे उतारे हैं।

कांग्रेस का आगाज और लेफ्ट का परचम

1957 में घोसी अलग सीट बनी तो पहले चुनाव में कांग्रेस के उमराव सिंह सांसद बने। इसके बाद यहां के मतदाता वामपंथ की हवा में ही बहते रहे। 

1962 और 1967 में जनता ने आजादी के आंदोलन में हिस्सेदार रहे जयबहादुर सिंह को CPI के टिकट पर चुना। जमींदार परिवार से रहे जयबहादुर ने गांव-गरीब की लड़ाई लड़ी। 

उर्दू को दूसरी भाषा की मान्यता देने की लड़ाई लड़ने के चलते उन्हें ‘शहीद-ए-उर्दू’ का खिताब भी दिया गया। उनके निधन के बाद 68 में हुए उपचुनाव में CPI के ही झारखंडे राय जीते। धन और धरती गरीबों में बांटने के नारे को उन्होंने भी आगे बढ़ाया था।

1971 में उनकी जीत बरकरार रही। हालांकि, 1977 में जनता पार्टी की लहर में शिवराम राय ने लेफ्ट से जीत छीन ली। 1980 में झारखंडे ने फिर CPI को जीत दिलाई। हालांकि, इस चुनाव तक यहां की सियासत में कल्पनाथ राय की जड़ें जम चुकी थीं। कांग्रेस के टिकट पर वह महज 7 हजार वोट से पिछड़े थे। 

हालांकि, 1984 में उनकी जगह राजकुमार राय को टिकट मिला और वह इंदिरा की हत्या के बने माहौल में कांग्रेस को जीत दिलाने में सफल रहे।

…और कल्पनाथ ने ढहा दिए सारे गढ़

राज्यसभा सांसद और फिर राजीव सरकार में मंत्री बने कल्पनाथ राय ने घोसी की सूरत बदलनी शुरू की। बुनियादी सुविधाओं से लेकर सड़क, पुल, बिजली की उपलब्धता ने यहां की तस्वीर ऐसी बदली कि दूसरी जगहों से यह क्षेत्र अलग दिखने लगा। 

कल्पनाथ की विकास पुरुष की पहचान ने यहां सारे गढ़ ढहा दिए। 1989 और 1991 में वह कांग्रेस के टिकट पर जीते। इस बीच उनकी तत्कालीन पीएम पीवी नरसिम्हा राव से खटक गई।

चीनी मिल घोटाले में नाम आया। मुंबई में हुए एक हत्याकांड में दाऊद इब्राहीम से नजदीकियों का आरोप लगा। लिहाजा कल्पनाथ TADA (टेररिस्ट ऐंड डिसरप्टिव ऐक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट) में जेल में डाल दिए गए। कांग्रेस ने उनका टिकट काट दिया तो कल्पनाथ ने निर्दल ही घोसी से ताल ठोंक दी। कल्पनाथ के कांग्रेस छोड़ते ही कांग्रेस के पांव उखड़ गए।

घोसी की सियासत में उसी समय बसपा के टिकट पर माफिया मुख्तार अंसारी ने एंट्री की। कल्पनाथ व मुख्तार के बीच सीधी लड़ाई हुई। 14 हजार वोटों से यह चुनाव कल्पनाथ जीत गए, लेकिन मुख्तार की भी यहां राजनीतिक जमीन तैयार हो गई। 1998 में राय ने समता पार्टी से उम्मीदवारी की और लगातार चौथी जीत दर्ज की। बाद में TADA से भी वह बरी हो गए।

घोसी लोकसभा सीट एक नजर में:

कुल वोटर : 20.66 लाख

पुरुष : 10.95 लाख

महिला : 9.71 लाख

कल्पनाथ के बाद बदलते रहे चेहरे

अगस्त 1999 में कल्पनाथ का निधन हो गया। इसके एक महीने बाद ही लोकसभा चुनाव की घोषणा हो गई। सियासी महत्वाकांक्षा ने कल्पनाथ के परिवार में दो फाड़ कर दिए। बेटे सिद्धार्थ राय ने जेडीयू से ताल ठोंकी और पत्नी सुधा राय कांग्रेस की उम्मीदवार बनीं। 

इस विभाजन ने कल्पनाथ की विरासत पर लगाम लगा दी और दूसरे चेहरों के लिए मौका बना। पहली बार यहां बसपा जीती और बालकृष्ण चौहान सांसद बने। 1957 के बाद यहां दूसरी बार गैर-भूमिहार सांसद बना था। कल्पनाथ के बेटे दूसरे नंबर पर रहे और पत्नी की जमानत जब्त हो गई।

2004 में यहां सपा से चंद्रदेव राजभर जीते तो 2009 में बसपा से दारा सिंह चौहान सांसद बने। 2014 में मोदी लहर में घोसी का भी मिजाज बदला और पहली बार कमल खिला। हरिनारायण राजभर संसद पहुंचे। हालांकि, इस जीत में मऊ सदर से विधायक मुख्तार अंसारी की अहम भूमिका रही। अपनी पार्टी कौमी एकता दल से उतरे मुख्तार ने 1.66 लाख वोट हासिल किए। वोटों का यह बंटवारा भाजपा के लिए मुफीद साबित हुआ।

2019 में सपा-बसपा की एका ने जिताऊ समीकरण बनाया। सीट बसपा के खाते में थी। टिकट मिला मुख्तार के करीबी अतुल राय को। चुनाव के पहले ही अतुल राय रेप के आरोप में जेल चले गए। चुनाव प्रचार की कमान मुख्तार के परिवार ने संभाली। दलित-मुस्लिम समीकरण के साथ ही सपा के साथ ने जेल में रहते हुए अतुल राय को सांसद बना दिया।

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"कलम हमेशा लिखती हैं इतिहास क्रांति के नारों का, कलमकार की कलम ख़रीदे सत्ता की औकात नहीं.."

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