राजनीति

घोसी उपचुनाव ; भाजपाइयों के चेहरे की बढ़ती शिकन के साथ दारा सिंह की राजनीति भी कई सवालों में उलझ गई

…आप जनता को बार-बार अपने हिसाब से अपने पक्ष में नहीं कर सकते…शायद घोसी उपचुनाव योगी-मोदी से यही कह रही है

मोहन द्विवेदी की खास रिपोर्ट 

मऊ: उत्तर प्रदेश के घोसी विधानसभा चुनाव का परिणाम बड़े राजनीतिक संकेत देता दिख रहा है। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले घोसी उप चुनाव को सत्ता के सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा था। इसके कई कारण हैं। सबसे बड़ा भारतीय जनता पार्टी ने ओबीसी वोट बैंक को अपनी तरफ करने के लिए दारा सिंह चौहान को अपने पाले में लाया। उनके साथ-साथ ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी भी एनडीए का हिस्सा बन गई। इन दो बड़े ओबीसी नेताओं के अपने पाले में आने के बाद भाजपा एक प्रकार से पूर्वांचल को लेकर निश्चिंत हो गई थी।

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यूपी चुनाव 2022 में घोसी भले ही भाजपा के हाथों से फिसल गई हो, लेकिन उप चुनाव के जरिए इस सीट को कब्जे में लेने की कोशिश की गई। इसमें असफलता हाथ लगी है। दारा सिंह चौहान को सुधाकर सिंह के हाथों हार का सामना करना पड़ा है।

भाजपा की पूरी रणनीति पर घोसी उप चुनाव के रिजल्ट ने एक प्रकार से पानी फेर दिया है। पार्टी को अब पश्चिमी यूपी के साथ-साथ पूर्वांचल के लिए एक नई रणनीति के साथ चुनावी मैदान में उतरने की जरूरत होगी। वहीं, इस रिजल्ट ने दारा सिंह चौहान की राजनीति पर भी सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।

लगातार दल-बदल के दिखे हैं परिणाम

लगातार दल-बदल के परिणाम हाल के समय में दिखे हैं। यूपी चुनाव के समय में भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी में जाने वाले कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्य को हार का सामना करना पड़ा। अब इसी प्रकार की स्थिति दारा सिंह चौहान को झेलनी पड़ रही है। जनता लगातार दलों को छोड़ने वाले नेताओं को पसंद नहीं कर रही है, उप चुनाव के परिणाम का संदेश साफ है।

समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज कर एक साल के बाद पार्टी और विधायकी छोड़ने वाले दारा सिंह चौहान को घोसी की जनता ने एक प्रकार से नापसंद किया है। पूर्वांचल में चौहान वोटरों का चेहरा होने का दावा करने वाले दारा सिंह चौहान को क्षेत्र में अपने लोगों का पूरा समर्थन मिलता नहीं दिख रहा है।

यूपी चुनाव 2022 के दौरान भाजपा का वोट प्रतिशत लगभग 34 फीसदी था। सपा के दारा सिंह चौहान 42 फीसदी से अधिक वोट लाकर तब जीते थे। अभी तक के वोटों की गिनती में भाजपा को 38 फीसदी के आसपास वोट मिलते दिख रहे हैं। वहीं, सपा उम्मीदवार के पक्ष में 57 से 58 फीसदी वोट जाता दिख रहा है। मतलब साफ है, दारा सिंह चौहान के परंपरागत वोटर उनके साथ भाजपा में शिफ्ट अगर हुए भी तो काफी कम।

ओम प्रकाश राजभर की भी स्थिति साफ

दारा सिंह चौहान की तरह ओम प्रकाश राजभर की स्थिति भी क्षेत्र में साफ होती दिख रही है। घोसी में राजभर वोटों की संख्या काफी ज्यादा है। इससे माना जा रहा था कि यूपी चुनाव 2022 के दौरान जब ओपी राजभर समाजवादी पार्टी के साथ थे, तो उन्होंने भाजपा को बड़ा नुकसान पहुंचाया। भाजपा ने यहां से विजय राजभर को उम्मीदवार बनाया था। वे अपने वोटरों को साधने में अपने स्तर पर कामयाब हुए। ओम प्रकाश राजभर के एनडीए से जुड़ने के बाद कोई बड़ी बढ़त भाजपा को मिलती नहीं दिखी।

मायावती फैक्टर रहा है अहम

घोसी के चुनावी मैदान में मायावती फैक्टर काफी अहम रहा। विधानसभा क्षेत्र में दलित वोटरों की आबादी अच्छी-खासी है। मायावती की इन पर पकड़ भी है। बिना कुछ अधिक प्रचार-प्रचार के भी यूपी चुनाव 2022 के दौरान बसपा उम्मीदवार वसीम इकबाल 54 हजार से अधिक वोट हासिल करने में कामयाब हो गए थे।

घोसी चुनाव के पहले मायावती का रुख साफ नहीं था। चुनाव के ऐन पहले मायावती ने ऐलान किया कि उनके परंपरागत वोट मतदान करने जाएं तो नोटा पर बटन दबाएं। या फिर मतदान प्रक्रिया से खुद को बाहर रखें।

घोसी उप चुनाव की वोटिंग के दौरान बड़ी संख्या में दलित वोटरों को बूथों पर देखा गया। चुनाव परिणाम पर गौर करें तो नोटा को अब तक करीब 1100 वोट मिले हैं। ऐसे में दलितों ने वोटिंग की तो उसकी अधिकतम संख्या समाजवादी पार्टी के पक्ष में जाती दिख रही है। कुछ वोट भाजपा के पाले में भी आए। भाजपा के वोट प्रतिशत में वृद्धि को इसी बढ़े वोट का परिणाम माना जा रहा है।

अखिलेश का पीडीए काम कर गया

अखिलेश यादव का पीडीए (पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक) फ्रंट घोसी सीट पर काम करता दिख रहा है। माय समीकरण को मजबूज करते हुए समाजवादी पार्टी अन्य पिछड़ा और दलित वोट बैंक में सेंधमारी करती दिख रही है। इसके अलावा पार्टी को सवर्ण वोट बैंक का भी समर्थन मिलता दिखा है। लोकसभा चुनाव से पहले यह चुनाव परिणाम भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। पार्टी को रणनीति में बदलाव करने का अहम संकेत भी है।

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