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अजब शादी के गज़ब रिवाज ; जब कुआं और बगिया की हुई अनोखी विधिपूर्वक शादी, देखिए शानदार तस्वीरें

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट 

लखनऊ। एक अनोखी शादी कैसरगंज के कड़सर बिटौरा में सम्पन्न हुई है जिसमें बाकायदा आम शादियों की तरह कार्ड छापे गए और वर के स्थान पर कुंआ तथा वधू के स्थान पर बगिया लिखा गया। इसलिए इसको लोग कुँए और बगिया की शादी भी कह रहे है। इसमें वधू वही पेड़ हो सकता है जो प्राकृतिक रूप से उगा हो यानि उस पेड़ को किसी ने न लगाया हो।

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बारात..तेल पूजन..निभाई गईं सभी रस्में​

राकेश सिंह, अखिलेश सिंह, अमरेश सिंह व सुरेश सिंह ने शादी की तैयारियां शुरू कर दी, प्रतीक रूप से लकड़ी के दूल्हा दुल्हन बनवाए गए, कार्ड छपे। 13 तारीख बारात की मुकर्रर हुई, उससे पहले मिरचिवा व तेल पूजन की रस्मे विधि विधान से सम्पन्न हुई। सभी रस्मे पण्डित ने पूरी कराई। तेल पूजन में परिवार पट्टीदार और रिश्तेदारों को पूछा गया जिसमें लगभग 400 लोंगों ने भोजन किया। शादी की रस्मो के लिए अखिलेश ने वर पक्ष की ज़िम्मेदारी निभाई और वधू पक्ष की ज़िम्मेदारी उनके बड़े भाई सुरेश सिंह ने निभाई। बारात जब बगिया पहुँची तो बाकायदा द्वारचार भी हुआ।

1500 लोगों को दिया गया न्योता

बारात में रिश्तेदारों पट्टीदारों के अतिरिक्त लगभग 4-5 किलोमीटर के दायरे के गाँव चुलमबार, रूकनपुर, गुड़ईय्या, डिहवाशेर बहादुर सिंह, बकद्वारा, सिदरखा, सिदरखी, देवलखा, सरैय्या, सरायअली व कैसरगंज आदि से लगभग पन्द्रह सौ हिन्दू, मुस्लिम को न्योता दिया गया। आम लोंगों के अतिरिक्त उपजिलाधिकारी कैसरगंज महेश कुमार कैथल भी इस शादी के गवाह बने। कैसरगंज के ब्लाक प्रमुख मनीष सिंह ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि हमने जीवन मे पहली बार ऐसी शादी देखी और मुझे काफी अच्छा लगा इसलिए मैं काफी देर रुका।

शादी की वजह भी जान लीजिए​

श्रीराम-जानकी पंचायती मंदिर के महन्त राधा कृष्ण पाठक ने बताया कि हिन्दू सनातन धर्म में जब किसी के घर में बच्चा जन्म लेता है तो जच्चा और बच्चा के साथ परिवार के लोग कुएं की पूजा करते हैं। इसी तरह जब किसी युवक की शादी होनी होती है तो दूल्हा बनने के बाद बारात जाने से पहले उसे कुएं पर लाया जाता है जहाँ वह कुएं का भांवर घूमता है। यह परम्परा इसलिए है ताकि जीवन मे जल तत्व की अधिकता बनी रहे।

खत्म होती जा रही परंपरा

सनातन धर्म की सैकड़ों साल पुरानी यह परम्परा अब अपना या तो स्वरूप बदलती जा रही या कुछ जगहों पर खत्म होती भी दिखाई दे रही है। कुछ लोग टब में पानी भर कर या फिर ज़मीन में थोड़ा सा गड्ढा खोदकर अपनी पुरानी परम्पराओं को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं।

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"कलम हमेशा लिखती हैं इतिहास क्रांति के नारों का, कलमकार की कलम ख़रीदे सत्ता की औकात नहीं.."

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