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संपादकीय
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शपथ और विदाई; संयोग नहीं दस्तूर

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अनिल अनूप 

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राष्ट्रपति की सम्मान और गरिमा के साथ विदाई हुई है। विदाई का भाव आते ही मन भरने लगता है। बहुत कुछ छूटने लगता है, यादें उमड़-घुमड़ करने लगती हैं, लेकिन यही प्रकृति और संविधान का दस्तूर है। हमें कर्तव्य-पथ पर निरंतर आगे बढऩा है। जीवन में जड़ता बेमानी है, लिहाजा पुरातन और नवीनता का सिलसिला जारी रखना ही जीवन और संवैधानिक दायित्व हैं।

राष्ट्रपति कोविंद ने भारत के ‘सांस्कृतिक दूत’ की भूमिका भी निभाई। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक, वैचारिक, आध्यात्मिक और वैश्विक परंपराओं को विश्व के सामने रखा

निर्वाचित महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आज 25 जुलाई को पद की शपथ लेंगी। देश के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमना उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाएंगे। एक और नया संवैधानिक अध्याय शुरू हो रहा है। दूसरी तरफ राष्ट्रपति पद से रामनाथ कोविंद की विदाई हुई है। उन्हें कई स्तरों पर भावभीनी विदाई दी गई है। वह पांच साल तक भारत के राष्ट्रपति रहे। उनका कार्यकाल सहज, सरल, ईमानदार, निष्ठापूर्ण, विनम्र, अनुशासित और संविधान के प्रति प्रतिबद्धताओं का दौर रहा। प्रधानमंत्री और कैबिनेट के साथ एक भी विवाद और टकराव सतह पर नहीं आने दिया। राष्ट्रपति कोविंद कई मायनों में ‘जन-राष्ट्रपति’ थे, न कि प्रोटोकॉल से बंधे राष्ट्राध्यक्ष थे।

उनसे एक बूढ़ी मां ने हेलीकॉप्टर में सवारी कराने की भोली-भावुक इच्छा जताई, तो जब अपने 92 वर्षीय अध्यापक को सामने देखा, तो मंच और प्रोटोकॉल झटक कर नीचे आए और ‘गुरू’ के पांव छुए। संविधान के सर्वोच्च पद तक पहुंचने की काबीलियत और ज्ञान में उस ‘गुरू’ ने ही बुनियादी भूमिका निभाई थी। रामनाथ कोविंद देश के दूसरे दलित राष्ट्रपति थे। पहले दलित चेहरे के तौर पर केआर नारायणन ने इस पद को ग्रहण किया और एक वंचित समुदाय को गौरवान्वित होने का मौका दिया। कोविंद राज्यसभा सांसद और बिहार के राज्यपाल भी रहे। अब वह अंतिम राष्ट्रपति हैं, जिन्हें संसद भवन के ऐतिहासिक सेंट्रल हाल में विदाई दी गई। अगली विदाई नए संसद भवन में होगी। बहरहाल राष्ट्रपति के तौर पर रामनाथ कोविंद ने 33 देशों की यात्रा की। उनमें अधिकतर वे देश थे, जो गरीब और पिछड़े थे तथा भारत के महामहिम ने उन देशों में प्रवास नहीं किया था।

उन देशों के साथ उन्होंने भारत के संबंधों की स्थापना की। ऐसा करते हुए राष्ट्रपति कोविंद ने भारत के ‘सांस्कृतिक दूत’ की भूमिका भी निभाई। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक, वैचारिक, आध्यात्मिक और वैश्विक परंपराओं को विश्व के सामने रखा। उन्हें कई देशों ने सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान से भी नवाजा। राष्ट्रपति काल के दौरान कोविंद ने अनुच्छेद 370 समाप्त करने, तीन तलाक संबंधी, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन, ओबीसी संशोधन, साधारण बीमा कारोबार संशोधन सरीखे महत्त्वपूर्ण बिलों पर हस्ताक्षर करके उन्हें कानून का रूप दिया। इतिहास उन्हें सदैव याद रखेगा। राष्ट्रपति कार्यकाल के दो ऐतिहासिक आयोजनों को उन्होंने खास तौर पर याद किया-राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के संदर्भ में समारोह मनाए गए। दूसरे, देश की स्वाधीनता के 75 वर्ष पूरे होने पर ‘अमृत महोत्सव’ उत्साह से मनाया जा रहा है। महामहिम के तौर पर कोविंद दोनों ऐतिहासिक आयोजनों के साक्षी रहे हैं। उन्होंने कोरोना वैश्विक महामारी का जिक़्र किया, तो 200 करोड़ से ज्यादा टीके की खुराकों का भी उल्लेख किया। उनकी टिप्पणी थी-‘मानवता न तो प्रकृति से अलग है और न ही उससे ऊपर है। कोरोना ने हमें यह एहसास करा दिया।’ बहरहाल विदाई के दौर में उन्होंने संसद सदस्यों समेत राष्ट्र को भी संबोधित किया। उन्होंने देशहित में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर काम करने का आह्वान किया और कहा कि लक्ष्यों के लिए गांधीवादी तरीके से विरोध प्रकट किया जाना चाहिए। राष्ट्रपति की विदाई के दौर में कोविंद ने शांति और सद्भाव के मूल्यों पर जोर दिया। बहरहाल कोविंद को हमारी भी शुभकामनाएं हैं कि वह स्वस्थ और सानंद रहें और देश के नागरिक के तौर पर अपनी भूमिका सदैव निभाते रहें।

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