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शिवपाल ने कैसे दिया भाजपा को “जोर का झटका धीरे से”? पढ़िए इस खबर को

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट 

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भाजपा बीते कुछ चुनाव से शिवपाल के सहारे यादव मतों के बिखराव और अखिलेश पर निशाना साधने के रास्ते निकालती रही है। अब 2024 तक यह साथ बना रहता है तो भाजपा को नई रणनीति तैयार करनी होगी। विशेषकर उन सीटों पर जहां सपा के साथ शिवपाल यादव का व्यक्तिगत प्रभाव भी माना जाता है।

उपचुनाव की बात करें तो भाजपा मैनपुरी सीट को जीतकर प्रदेश में सारे गढ़ ढहाने का संदेश देना चाहती है। पूर्व में भाजपा काे लग रहा था कि शिवपाल यदि चुनाव न भी लड़ें तो भी शायद तटस्थ भूमिका में रहेंगे।

ऐसे में जसवंतनगर में पकड़ रखने वाले उनके प्रत्याशी रघुराज सिंह शाक्य को बड़ा फायदा होगा। परंतु अब शिवपाल-अखिलेश के एक होने से भाजपा ने जसवंतनगर को लेकर अपनी रणनीति में बदलाव किया है।

भाजपा अपने प्रत्याशी और संगठन के बल पर सपा की बढ़त को कम कर खुद आगे निकलने को पसीना बहा रही है। उपचुनाव में सपा को यह हुआ फायदासपा को सबसे ज्यादा चिंता मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र में शामिल जसवंतनगर विधानसभा सीट की थी। सपा प्रत्याशी पूर्व के चुनावों में इसी क्षेत्र से निर्णायक बढ़त पाते रहे हैं। जसवंतनगर सीट शिवपाल का गढ़ मानी जाती है।

वर्ष 1993 के विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव यहां जीते थे, फिर सीट को छोड़कर 1994 के चुनाव में शिवपाल सिंह यादव को प्रत्याशी बनाया। इसके बाद से शिवपाल लगातार जीत रहे हैं।

इस साल के चुनाव में भी शिवपाल की जीत का अंतर 90 हजार मतों से अधिक था। सपा के साथ मुश्किल यह थी कि जसवंतनगर के मतदाताओं से मुलायम के बाद केवल शिवपाल का सीधा जुड़ाव है। परिवार के अन्य किसी सदस्य का वहां सीधा कोई जुड़ाव नहीं, यहां तक कि पार्टी के संगठन पर भी शिवपाल का होल्ड माना जाता है। अब सपा यहां से पूर्व की तरह ही बड़ी बढ़त मिलने को लेकर लगभग निश्चिंत हो गई है।

दूसरी तरफ मैनपुरी के अन्य चार विधानसभा क्षेत्रों में भी शिवपाल सिंह का पुराना जुड़ाव है। यहां तक कि यादव समाज के मतदाता भी शिवपाल यादव के रुख को लेकर पूर्व में थोड़े असमंजस में थे। अब यह असमंजस खत्म हो गया और छोटी-मोटी गुटबाजी भी। सपा इस सब को अपने लिए शुभ संकेत मान रही है।

मैनपुरी लोकसभा सीट को मुलायम सिंह यादव का गढ़ कहा जाता है। उनके निधन के बाद अब सपा के सामने अपने इस गढ़ को बचाए रखने की चुनौती है।

भाजपा यहां सपा का वर्चस्व तोड़ने को पूरी ताकत झोंक रही है। इसी चुनौती को देख अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल सिंह यादव से फिर हाथ मिला लिया है। हाथ तो बीते विधानसभा चुनाव में भी मिला था, परंतु इस बार कहा जा रहा है कि दिल भी मिल गए हैं। शिवपाल खुद भी आगे भी साथ रहने की बात चुके हैं।

शिवपाल के साथ आने से गढ़ को बचाने की सपा की रणनीति को तो बहुत बल मिला ही है, वह आगामी चुनावों में भी इसके लाभ देख रही है। क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा को शिवपाल फैक्टर से नुकसान उठाना पड़ा था। फिरोजाबाद जैसी परंपरागत सीट भी भाजपा की झोली में जा गिरी थी। अब परिवार के एक होने के बाद शिवपाल ने दावा भी किया कि उन पर भरोसा रखा तो 2024 में 50 सीटें जिताकर देंगे। भाजपा भी इस दावे को हल्के में नहीं ले रही है, क्योंकि मुलायम सिंह के समय में शिवपाल ही सपा के प्रमुख रणनीतिकार रहे हैं और अकेले फिरोजाबाद ही नहीं, पूर्वांचल सहित कई क्षेत्रों में उनका प्रभाव माना जाता है। सपा अब यह मान रही है कि पूर्व में जो भी मतों का बिखराव, हुआ वह इस स्थिति में नहीं होगा।

2017 के चुनाव के बाद से सपा के विरुद्ध, शिवपाल के इर्दगिर्द अपनी रणनीति बुनती रही भाजपा फिलहाल सकते में है।

उपचुनाव की योजना में बदलाव में जुटी है। परंतु साथ में उसे अब निकाय चुनावों से लेकर अगले लोकसभा चुनाव तक के लिए अलग रणनीति बनानी होगी, ऐसी रणनीति जिसमें शिवपाल, सपा के साथ रखे जाएंगे। क्योंकि पूर्व में फिरोजाबाद लोकसभा सीट सहित अन्य क्षेत्रों में भी भाजपा को परिवार की रार का सीधा लाभ मिला था।

दूसरी तरफ सपा मुखिया अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के मिलन को सपा अपने लिए रामबाण मान रही है, जो निष्फल नहीं होगा। उपचुनाव ही नहीं, आगामी निकाय चुनाव और अगले लोकसभा चुनाव तक असर दिखाएगा।

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