राजनीति

उत्तर प्रदेश उपचुनाव: 10 विधानसभा सीटों पर सियासी जंग, भाजपा और सपा के बीच कड़ी टक्कर

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट

लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में 10 विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव होने वाले हैं, जिनमें से 9 सीटें विधायकों के सांसद चुने जाने के कारण और एक सीट समाजवादी पार्टी (सपा) के विधायक इरफान सोलंकी को अयोग्य ठहराए जाने के कारण खाली हुई है। इन उपचुनावों को सियासी जंग का मैदान माना जा रहा है।

उत्तर प्रदेश में होने वाले इन उपचुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुवाई वाला एनडीए और सपा की अगुवाई वाला इंडिया गठबंधन अपनी-अपनी रणनीतियों पर काम कर रहे हैं। 

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लोकसभा चुनाव के परिणाम

उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से भाजपा ने 33 सीटें जीती हैं, जबकि उसकी सहयोगी आरएलडी ने 2 और अपना दल (सोनेलाल) ने 1 सीट जीती है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटों पर जीत हासिल की है।

उपचुनाव की ये 10 सीटें राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं और इन पर सभी प्रमुख दलों की नजरें टिकी हुई हैं।

  1. करहल:- करहल विधानसभा सीट से 2022 में अखिलेश यादव जीते थे। अब एसपी सिंह बघेल के सांसद बनने के बाद यह सीट खाली हुई है। करहल सपा का गढ़ है और सपा यहां लंबे समय से जीतती आ रही है। इस बार सपा अखिलेश यादव के परिवार के किसी सदस्य को उम्मीदवार बना सकती है।
  2. मिल्कीपुर:- यह सीट अयोध्या जिले में है और सपा विधायक अवधेश प्रसाद के सांसद चुने जाने से खाली हुई है। 2022 में उन्होंने भाजपा के बाबा गोरखनाथ को हराया था। अब इस सीट पर सपा और भाजपा के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई है।
  3. खैर:- खैर विधानसभा सीट अलीगढ़ जिले में है और यह अनूप प्रधान वाल्मीकि के सांसद चुने जाने के कारण खाली हुई है। भाजपा, आरएलडी और बीएसपी की इस सीट पर मजबूत पकड़ रही है।
  4. मीरापुर:- यह सीट मुजफ्फरनगर जिले में है और चंदन चौहान के सांसद चुने जाने से खाली हुई है। आरएलडी ने 2022 में यहां से जीत दर्ज की थी। अब कांग्रेस और सपा दोनों ही इस सीट पर दावा कर रही हैं।
  5. कुंदरकी:- कुंदरकी विधानसभा सीट मुरादाबाद जिले में है और जिया उर रहमान के सांसद चुने जाने से खाली हुई है। इस सीट पर अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं और सपा का गढ़ मानी जाती है।
  6. गाजियाबाद सदर:- यह सीट गाजियाबाद जिले में है और अतुल गर्ग के सांसद चुने जाने के कारण खाली हुई है। कांग्रेस यहां अपना उम्मीदवार उतारना चाहती है।
  7. फूलपुर:- यह सीट प्रयागराज जिले में है और प्रवीण पटेल के सांसद चुने जाने से खाली हुई है। सपा और भाजपा के बीच यहां कांटे की टक्कर होने की संभावना है।
  8. मझवां विधानसभा सीट:- मझवां विधानसभा सीट मिर्जापुर जिले में है। 2022 में निषाद पार्टी के विधायक विनोद कुमार बिंद ने यहां से जीत दर्ज की थी। विनोद कुमार बिंद इस बार भदोही लोकसभा सीट से बीजेपी के टिकट पर सांसद चुने गए हैं। 2017 में बीजेपी ने इस सीट पर जीत हासिल की थी। इस क्षेत्र में अति पिछड़ी जातियों का समर्थन सपा को मिला था, खासकर बिंद समुदाय का। मझवां विधानसभा सीट पर अति पिछड़ी जाति के मतदाताओं की संख्या महत्वपूर्ण है।
  1. कटेहरी विधानसभा सीट:- कटेहरी विधानसभा सीट अंबेडकर नगर जिले में स्थित है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के विधायक लालजी वर्मा ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी। इस बार लालजी वर्मा अंबेडकर नगर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए हैं। उन्होंने बीजेपी के रितेश पांडे को हराया है। 1990 के बाद से इस सीट पर बसपा और सपा का ही दबदबा रहा है। हालांकि, लोकसभा चुनाव में बसपा के उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहे। सपा को उम्मीद है कि कांग्रेस के समर्थन से वह दलित वोटों का एक बड़ा हिस्सा अपनी ओर आकर्षित कर सकती है।
  1. सीसामऊ विधानसभा सीट:- सीसामऊ विधानसभा सीट कानपुर जिले में स्थित है। 2022 के चुनाव में सपा के इरफान सोलंकी ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी, लेकिन उन्हें आगजनी के एक मामले में 7 साल की सजा सुनाई गई है, जिससे वे अयोग्य ठहराए गए हैं। 2022 के विधानसभा चुनावों के बाद उत्तर प्रदेश में 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं। इनमें से 9 सीटें विधायकों के सांसद चुने जाने के कारण खाली हुई हैं, जबकि एक सीट इरफान सोलंकी के अयोग्य ठहराए जाने की वजह से खाली हुई है। ये उपचुनाव राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं।

कानपुर लोकसभा सीट पर इस बार बीजेपी ने कांग्रेस से बेहद नजदीकी मुकाबले में जीत हासिल की थी। इससे कांग्रेस को नई ऊर्जा मिली है और वह सीसामऊ सीट पर अपना दावा ठोक सकती है। इरफान सोलंकी तीन बार सपा के टिकट पर विधायक रहे हैं, लेकिन उससे पहले कांग्रेस ने यहां दो बार चुनाव जीता था। बीजेपी की भी इस इलाके में अच्छी उपस्थिति है।

चुनावी समीकरण और रणनीति

इन उपचुनावों में सपा और बीजेपी दोनों ही अपनी पकड़ मजबूत करने और नई सीटें जीतने की कोशिश कर रही हैं। अति पिछड़ी जातियों, दलित मतदाताओं और अल्पसंख्यक वोटरों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। कांग्रेस भी कुछ सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारकर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में है।

इन उपचुनावों के परिणाम उत्तर प्रदेश की राजनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं और आगामी विधानसभा चुनावों की दिशा तय कर सकते हैं। प्रमुख राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतियों पर काम कर रहे हैं और आने वाले दिनों में इन सीटों पर सियासी गर्मी बढ़ने की संभावना है।

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"कलम हमेशा लिखती हैं इतिहास क्रांति के नारों का, कलमकार की कलम ख़रीदे सत्ता की औकात नहीं.."

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