इतिहास

एक दाग और आडवाणी के अरमानों पर फिरा पानी… तब देश को मिले ‘अटल’

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आत्माराम त्रिपाठी की रिपोर्ट

1993 की बात है, देश में नरसिम्हा राव की सरकार चल रही थी, सुब्रमण्यन स्वामी भी उस सरकार में शामिल थे। उन्होंने अचानक से एक बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का ऐलान कर दिया। 

कहा गया कि स्वामी के पास कोई विस्फोटक खबर आ गई है, वे कोई बड़ा खुलासा करने वाले हैं। सुब्रमण्यन स्वामी मीडिया के सामने आए और उन्होंने एक नाम लिया- लाल कृष्ण आडवाणी, आरोप लगाया- हवाला कारोबारी एसके जैन से दो करोड़ रुपये लिए।

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आडवाणी और हवाला कांड

आडवाणी उस जमाने में बीजेपी के बड़े चेहरे थे, अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उनकी सियासी जुगलबंदी ही भाजपा को 2 सीटों से आगे बढ़ा पाई थी। लेकिन स्वामी के आरोप ने आडवाणी को अंदर तक हिलाकर रख दिया, खुद को बेकसूर साबित करने की उनकी आग हर बीतते दिन के साथ बढ़ती जा रही थी। दूसरी तरफ हवाला कांड में एक चार्जशीट दायर हुई, आडवाणी का नाम भी उसमें सामने आ गया और बस नैतिकता दिखाते हुए बीजेपी नेता तब अपना इस्तीफा दे दिया।

एक ऐलान और आडवाणी का बदल गया करियर

उन्होंने कभी भी खुद को दोषी नहीं माना था, लेकिन क्योंकि आरोप लगे तो उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी का हवाला देकर अपनी लोकसभा की सदस्यता छोड़ना ही सही समझा। तारीख थी 16 जनवरी, 1996, आडवाणी ने मीडिया के सामने ऐलान कर दिया- जब तक हवाला कांड से मुक्ति नहीं मिल जाएगी, जब भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्ति नहीं मिल जाएगी, मैं इस सदन में कदम नहीं रखूंगा।

जब आडवाणी ने बीजेपी का ऑफर ठुकरा दिया

सब टाइमिंग का खेल था, जिस समय भावुक अंदाज में आडवाणी ने ये ऐलान किया, देश लोकसभा चुनाव के बिल्कुल दहलीज पर खड़ा था। बीजेपी कार्यकर्ताओं की नजर में आडवाणी उनके पीएम दावेदार थे। उस समय सबसे बड़े नायक बन चुके आडवाणी बीजेपी को सत्ता में लाने का दमखम रखते थे। लेकिन नीयति को कुछ और ही मंजूर था। खुद आडवाणी ने अपनी किताब ‘‘माय कंट्री माय लाइफ’’ में बताया है कि उन्हें चुनाव लड़ने का ऑफर संसदीय बोर्ड द्वारा दिया गया था। लेकिन हवाला कांड में लगे आरोपों की वजह से उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया।

आडवाणी को था ‘अटल विश्वास’

शायद आडवाणी को भी तब नहीं पता था कि उस दौर उनके प्रधानमंत्री बनने की सबसे ज्यादा संभावना थी। खैर बीजेपी के सामने एक बड़ा संकट आ खड़ा हुआ था, चुनाव सिर पर थे, किसी भी हालत में कांग्रेस को हराना था, पहली बार गैर कांग्रेसी पीएम बनाना था। इसी प्रश्न का जवाब खोजने के लिए बीजेपी की बैठक हुई और लाल कृष्ण आडवाणी ने अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आगे कर दिया। वो वाजपेयी जो उस समय बीजेपी की हिंदुत्व वाली पिच से बहुत ज्यादा सहज नहीं थे, जो बाबरी विध्वंस के बाद से कुछ खामोश हो गए थे। लेकिन आडवाणी ने सभी को चौकाते हुए अटल विश्वास के साथ अपने साथी का नाम आगे कर दिया। नारा दिया गया- सबको देखा बारी-बारी, अबकी बार अटल बिहारी।

13 दिन वाली सरकार की पटकथा

एक प्रखर वक्ता और विदेश नीति के जानकार के रूप में तब तक अटल बिहारी वाजपेयी की पहचान हो चुकी थी। लेकिन अब उनके सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी थी। केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार बनानी थी, बीजेपी को सत्ता में लाना था। जोरदार प्रचार शुरू हुआ, बहुमत तक पहुंचने का लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया। नतीजे आए और किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। कोई इतना करीब भी नहीं पहुंचा कि आसानी से सरकार बना सके। लेकिन उस चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी जरूर बनी थी। बीजेपी ने जीती 161 सीटें और कांग्रेस सिमट गई 140 पर। उस समय देश के राष्ट्रपति हुआ करते थे शंकर दयाल शर्मा।

बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी, ऐसे में राष्ट्रपति ने सरकार बनाने का न्योता भी उन्हें दे दिया। लेफ्ट और दूसरे दलों ने जमकर विरोध किया, वे जानते थे कि बीजेपी के पास बहुमत नहीं है। लेकिन शब्दों के धनी वाजपेयी को अटल विश्वास था कि वे बहुमत साबित कर देंगे। उस समय एक बयान में वाजपेयी ने कहा था कि अगर संसद अपने विवेक से सोचे और ये समझ जाए कि इस बार बीजेपी को जनादेश मिला है और उसे सेवा करने का मौका मिलना चाहिए तो बहुमत साबित करने में कोई कठिनाई नहीं होगी।

अस्थिरता का दौर, वाजपेयी की वापसी

अब 13 दिन तक अटल सरकार चलाते रहे, अंदरखाने बहुमत हासिल करने की कोशिश होती रही, लेकिन अंत में उस सरकार की विदाई ही देश की जनता को देखने को मिली। आजाद भारत की सबसे छोटे अंतराल वाली सरकार गिर चुकी थी। अटल बिहारी वाजपेयी इस्तीफा दे चुके थे और कांग्रेस ने अपने समर्थन देवगौड़ा को पीएम बना दिया। फिर केसरी ने दांव चलते हुए देवगौड़ा की सरकार भी गिरवा दी और तब इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने। लेकिन यहां भी सिर्फ 11 महीने तक सरकार चलाने का मौका मिला और एक बार फिर गुजराल की सरकार भी गिर गई।

अब देश 12वीं लोकसभा में प्रवेश कर रहा था। बीजेपी ने पुरानी गलतियों से सीखते हुए चुनावी नतीजों के बाद 13 पार्टियों का एक गठबंधन तैयार किया, नाम दिया गया एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन)। बीजेपी को उस चुनाव में 182 सीटें मिली थीं, लेकिन सहयोगियों के समर्थन से बहुमत हाथ आ गया और वाजपेयी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने। लेकिन 13 महीनों बाद मात्र एक वोट से वो सरकार भी गिर गई, जयललिता ने खेल कर दिया और एक वोट ने देश को फिर अस्थिरता के दौर में ला दिया।

अब उसी अस्थिरता से बाहर निकलने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने लोकसभा भंग करने का ऐलान कर दिया और देश 13वें लोकसभा चुनाव के लिए अग्रसर हो गया। करगिल का युद्ध कुछ दिन पहले ही खत्म हुआ था, देशभक्ति का माहौल पूरे देश में था, बीजेपी ने उसका पूरा फायदा उठाया और एनडीए ने बहुमत हासिल कर लिया। प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ने तीसरी बार शपथ ली और पूरे पांच साल तक इस बार सरकार चलाई।

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"कलम हमेशा लिखती हैं इतिहास क्रांति के नारों का, कलमकार की कलम ख़रीदे सत्ता की औकात नहीं.."

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