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आखिर कब तक और क्यों उपेक्षाओं से दो चार होती रहेगी इतिहास की ये महत्वपूर्ण निशानियां…..

राजा बखानौं मैं गोंडा कै देवीबख्श महाराज रहे, असी चार चौरासी कोस मां जेहकै डंका बाजि रहे…

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की खास रिपोर्ट 

देश की स्वतंत्रता आन्दोलन में गोंडा जिला अग्रणी रहा है। गोंडा के राजा देवीबक्श सिंह एक वीर योद्धा व देशभक्त थे, जिन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते अपने जीवन को एवं अपने परिवार को न्योछावर कर दिया। राजा देवीबक्श का बनवाया हुआ सागर तालाब आज भी नगर की शोभा बड़ा रहा है। उन्होंने अंग्रेजों से सीधी लड़ाई लड़ी। ब्रिटिश हुकूमत के आगे न तो उन्होंने समर्पण किया न ही हार मानी। राजा से जुड़े स्थल आज भी उपेक्षा का शिकार है। 1857 वीं की क्रांति के महानायक महाराजा देवी बख्श सिंह की कोट बनकसिया, राजगढ़ व जिगना में थी। उनका पूरा परिवार जिगना कोट में ही रहता था। राजा को मल्लयुद्ध, घुड़सवारी, तैराकी में दक्षता हासिल थी। लखनऊ में नवाब वाजिद अली शाह के सामने राजा ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया था। ब्रिटिश हुकूमत ने राजा को कई प्रस्ताव भेजे लेकिन, उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया। नवाबगंज के पास लगती लोलपुर का ऐतिहासिक मैदान महाराजा देवी बख्श सिंह के आन-बान व शान का जीता जागता सबूत है। जब उन्होंने अंग्रेजों की गुलामी नही स्वीकारी तो अंग्रेज हुकूमत ने उन्हें कमजोर करने के लिए पड़ोसी राजाओं को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। उन्हीं के उकसाने पर राजा देवी बख्श सिंह के राज्य पर हमला भी किया गया। कानपुर से लेकर नेपाल सीमा तक कड़ी टक्कर देने वाली राजा की सेना ने इस बार भी उतनी ही वीरता से मुकाबला किया। बहादुर सेना को सात दिनों तक भूखे रहकर युद्ध करना पड़ा। गोंडा नरेश ने अंग्रेजों के सामने घुटने नही टेके और अपने वफादार सैनिकों को लेकर नेपाल चले गए। अवध का सबसे अंतिम जिला गोंड़ा ही है, जिस पर सबसे अंत में अंग्रेजों ने कब्जा पाया। धानेपुर से 20 किलोमीटर दूर मुजेहना ब्लाक में स्थित जिगना बाजार में उनका पैतृक महल खंडहर के रूप में आज भी है। 

बुजुर्ग बताते हैं कि महल में एक लाख ताख बने थे, जिस पर दीपावली के दिन दिये जलाये जाते थे। आज यह उपेक्षा का शिकार है। भवन जर्जर हो चुका है। दीवारों पर जंगली घासें उगी हैं। जिगना बाजार में मंदिर व महल अपनी पहचान खोते जा रहे हैं लेकिन, प्रशासन इस ओर ध्यान नही दे रहा है। राजा देवी बख्श से जुड़ी स्मृतियों को संजोने का प्रयास कर रहे धर्मवीर आर्य का कहना है कि कई बार अधिकारियों को पत्र लिखा गया लेकिन, हालात जस के तस बने हुए हैं।

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ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जब पूरे देश में विद्रोह की चिंगारी फूट रही थी, तभी गोंडा व उससे सटे लखनऊ में भी विद्रोह की ज्वाला धधकने लगी थी। लखनऊ की बेगम हजरत महल अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए अवध क्रांति का नेतृत्व कर रही थीं। उन्होंने मदद के लिए गोंडा के महाराजा देेवी बक्स सिंह को पत्र भेजा जिस पर गोंडा के महाराजा ने लखनऊ की बेगम की मदद करने घाघरा पार पहुुंचे थे।

5 जुलाई 1857 को बेगम की शाही सेना के कैप्टन गजाधर पांडेय अनुरोध पत्र लेकर राजा के पास आए थे। यह पत्र बहुत ही मार्मिक था। जिसमें उन्होंने अंग्रेजों द्वारा अन्याय पूर्वक छीने गए राज्य, अवध के अवयस्क उत्तराधिकारी व बेघर की गई एक महिला को उसका हक दिलाने के लिए अन्यायी के विरुद्ध कमान संभालने का आग्रह किया था। जिस पर यहां से गोंडा के राजा ने अपनी सेना के साथ पहुंचकर उनका साथ दिया।

राजा देवी बख्श सिंह गोंडा-बहराइच के प्रधान नाजिम तो थे ही उन्हें बस्ती और बाराबंकी के भी आठ रजवाड़ों को मिलाकर कुल 30 रजवाड़ों के नायक के रूप में क्रांति का संचालन संभालने की जिम्मेदारी दी गई थी। फरवरी 1856 में ब्रिटिश राज्य में अवध का विलय करने के बाद जब कर्नल ब्वायलू यहां पर तैनात होकर आए तो उन्होंने राजा देवी बख्श सिंह के पास मिलने के लिए बुलावा भेजा किंतु वे आने को तैयार नहीं हुए। ब्रिटिश अमलदारी में हुए सरसरी बंदोबस्त में गोंडा के राजा के 400 गांवों में से तीस गांव कम कर दिए गए थे।

बेगम हजरत महल के आमंत्रण पर गोंडा के राजा अपनी सेना के साथ लखनऊ गए थे। जिसमें करीब तीन हजार सैनिक थे। वहां पर पहुंचकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ जमकर लड़ाई लड़ी। यहां पर अंग्रेजों से हुए कई मुकाबलों के बाद 16 मार्च 1958 को बेगम ने चौलक्खी कोठी छोड़ दी। इसके बाद वह जहां भी ठहरीं, अंग्रेजों ने वहां पर उनका पीछा किया।

तब बलरामपुर का क्षेत्र भी गोंडा का हिस्सा था और इसका विस्तार नेपाल तक था। अंग्रेजी शासन के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले विसेन वंश के अंतिम शासक महाराजा देवी बख्श सिंह की शौर्य गाथा आज भी लोगों में देश भक्ति का जज्बा पैदा कर रही है। विसेन राजाओं द्वारा बनाए गए राधाकुंड, सागर तालाब, मथुरा वृंदावन के तर्ज पर गोर्वधन पर्वत आज भी इस वंश के वैभवशाली अतीत की गवाही दे रहे हैं।

अपने दुर्दिन पर आंसू बहा रहा है जिगना कोट,एक लाख दीपक वाला खण्डर सँजोये हैं स्मृतियाँ

पैतृक गांव जिगना कोट में पवित्र मनवर नदी के तट स्थित पंचमुखी शिवाला जहां उनकी रानी प्रतिदिन पूजा अर्चना हेतु आया करती थीं उस पंचमुखी शिवाला के इर्द-गिर्द के चारों तरफ बने मंदिर खंडहर में तब्दील हो चुके हैं।

गांव में उनका परिवार भी जिस कुएं का पानी पीता था आज गंदगी से पटा हुआ दिख रहा है ,और तो और उनकी प्रतिमा को लगाने के लिए जो स्तंभ बना था वह भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मूर्ति को स्थापित करने की बाट जोह रहा है। सत्तावनी क्रांति के महानायक महाराजा देवी बख्श सिंह के महल का एक हिस्सा लाख ताखे वाली वह दीवाल भी अपनी बेनूरी पर आंसू बहा रही है जिसमे कभी एक साथ एक लाख दीपों की पंक्तियां झिलमिलाती थीं।

सेना केे साथ भिड़ने निकल पड़ते थे पंचगांव के लड़ाके

महाराजा देवी बक्स सिंह के देशभक्ति के जुनून से प्रभावित होकर शहर से सटे पांच गांवों के युवा दुश्मन से लोहा लेने महाराजा की सेना के साथ निकल लेते थे। शहर से सटे केशवपुर पहड़वा, दत्तनगर विसेन, रुद्रपुरविसेन, जगदीशपुर तथा इमरती विसेन के लड़ाके युवा महाराजा देवी बक्स सिंह की सेना के साथ दुश्मन से लोहा लेने निकल पड़ते थे। माना जाता है कि बेगम हजरत महल की मदद के लिए जब महाराज लखनऊ कूच कर रहे थे तो उनके साथ इन पांच गांवों के सैकड़ों लड़ाके भी निकल पड़े थे।

इन रणबांकुरो ने भी आंदोलन में डाली थी आहुतियां

गोंडा के गांधी कहे जाने वाले बाबू ईश्वर शरण, लाल बिहारी टंडन, अयोध्या प्रसाद, अर्जुन प्रसाद, अवधराज सिंह, सोहरत सिंह, सकटू, हर प्रसाद श्रीवास्तव, अयोध्या हलवाई, ओम प्रकाश, काली प्रसाद, गया प्रसाद आजाद, गल्लू सिंह, गुरु प्रसाद, गोपीनाथ तिवारी, गौरी शंकर, चंद्रभान शरण सिंह, नंदलाल, नानक प्रसाद वर्मा, बद्री प्रसाद, बदली सिंह, बाबूराम तिवारी, वृक्षराज पांडेय, बृजनंदन ब्रह्मचारी, भगवती प्रसाद पांडेय, भभूति, महादेव मिश्र, माता प्रसाद, रखेले, रमाकांत शुक्ल, राजाराम सिंह, राम उजागर मिश्र, रामनरेश तिवारी, रामनिहोर तिवारी, राम प्यारे, रामफल, रामफेर मिश्र, राममिलन शुक्ल, यज्ञराम तिवारी, श्रीराम सिंह, श्रीराम, संत बहादुर, सूरज नारायण शुक्ल, सूरज सिंह सहित तमाम युवाओं ने देश की आजादी में अपना सक्रिय योगदान दिया।

गोंडा का प्राचीन इतिहास

पुरातन काल से अब तक चर्चित श्रावस्ती राज्य ही गोंडा का इतिहास है। इसके वर्तमान भूभाग पर प्राचीन काल में श्रावस्ती राज्य और कोशल महाजनपद फैला था। गौतम बुद्ध के समय इसे एक नयी पहचान मिली। जैन ग्रंथों के अनुसार श्रावस्ती उनके तीसरे तीर्थंकर सम्भवनाथ और आठवें तीर्थंकर चंद्र प्रभनाथ की जन्मस्थली भी है। वायु पुराण और रामायण के उत्तरकाण्ड के अनुसार श्रावस्ती उत्तरी कोशल की राजधानी थी।

1857 में गोंडा जिले में चार तहसीलें, गोंडा सदर, तरबगंज, बलरामपुर और उतरौला शामिल थी, लेकिन 1868 में प्रथम बंदोबस्त में बलरामपुर तहसील खत्म करके उसे उतरौला में शामिल किया गया। जिला बनने के 141 साल बाद 25 मई 1997 को गोंडा को दो भागों में विभाजित किया गया और नवसृजित बलरामपुर जनपद में तत्कालीन गोंडा की बलरामपुर, उतरौला और तुलसीपुर तहसील को शामिल किया गया। विभाजन के बाद वर्तमान गोंडा जनपद देवी पाटन मण्डल का मुख्यालय है। अब जनपद में गोंडा सदर, मनकापुर, कर्नलगंज एवं तरबगंज आदि चार तहसीलें हैं।

मध्य, ब्रिटिश काल और स्वतंत्रता के बाद

मध्यकाल में यह मुगल शासन के दौरान अवध सुबाह की बहराइच सरकार का एक हिस्सा था। फरवरी 1856 में अवध प्रान्त के नियंत्रण में आने के बाद बहराइच कमिश्नरी से गोंडा को अलग करके जिले का दर्जा प्रदान किया गया। सन 1857 की सशस़्त्र क्रान्ति विफल होने के बाद जब यह ब्रिटिश सरकार के अधीन हुआ तो गोंडा नगर में जनपद मुख्यालय और सकरौरा (कर्नलगंज) में सैन्य कमान बनाया गया।

विसेन राजा मान सिंह ने बसाया गोंडा नगर

विसेन वंश के प्रतापी राजा मान सिंह ने वर्तमान गोंडा शहर बसाया था। तब टेढ़ी (कुटिला) नदी के निकट स्थित कोडसा (खोरहंसा) से राज्य का संचालन होता था। सन 1540 ई. के प्रलयंकारी बाढ़ में जब कलहंस क्षत्रिय राजा अचल नरायन सिंह के वंशजों समेत राजमहल जलमग्न हुआ तो विसेन राजा प्रताप मल्ल ने बागडोर संभाली और खोरहंसा को राजधानी बनाया।

कहा जाता है कि राजा मान सिंह शिकार की तलाश में भ्रमण करते हुए उस स्थान पर पहुंचे जहां आज गोंडा शहर है। तब यह क्षेत्र बेल, बबूल के वृक्षों से आच्छादित घना जंगल में राजा को एक खरहा (खरगोश) दिखा, जिसे शिकारी कुत्तों ने दौड़ा लिया। लेकिन उस खरहे ने उलटे कुत्तों पर ही वार कर दिया, जिससे कुत्ते विचलित हुए और वह भागकर जान बचाने में सफल रहा। इससे प्रभावित राजा ने सोचा कि जहां के खरहे इतना निडर हों उस स्थान अवश्य कुछ खास है।

उन्होंने वहीं राजधानी बनाने का निश्चय किया। इसके बाद सन 1620 ई. में राजा मान सिंह ने अयोध्या के राजा दिलीप द्वारा काली भवानी मंदिर और राजा दशरथ द्वारा स्थापित दुःखहरण नाथ मंदिर के निकट गोंडा नगर की स्थापना कर उसे राजधानी बनाया।

राजवंश ने कराया 36 शिवालयों, मंदिरों का निर्माण

धर्म के प्रति पूर्ण आस्था और श्रद्धा से ओत प्रोत विसेन राजवंश के राजाओं ने समय समय पर अनेक मठ मंदिरों का निर्माण कराया और उनके प्रबंधन की भी व्यवस्था की। राजा गुमान सिंह ने ही पृथ्वीनाथ में भगवान शिव के सात खंडों वाले अद्वितीय शिवलिंग को भव्य मंदिर में स्थापित कराया। राजा देवी बख्श सिंह भगवान शिव और आदि माता के उपासक थे। उन्होंने तीन दर्जन भव्य शिव मंदिरों का निर्माण और जीर्णोंद्धार कराया था और उनके प्रबंध हेतु जमीन भी दिया था। जिगना कोट के करीब राजगढ़ में बनवाया गया विशाल पंचमुखी शिव मंदिर आज भी अपने भव्यता की गवाही दे रहा है।

गोंडा नगर के समीप खैर के जंगलों में मां भवानी के भव्य मंदिर का निर्माण, जिसे आज मां खैरा भवानी के नाम से जाना जाता है। बाराबंकी जिलेे के महादेवा गांव में भी उन्होंने एक विशाल शिव मंदिर बनवाया था। मशहूर लेखक अमृत लाल नागर ने ‘गदर के फूल‘ में लिखा है कि राजा देवी बख्श सिंह ने मंदिर के अंदर पत्थर लगवाकर भव्यता दी और मंदिर के नाम पर पांच सौ बीघा भूमि दान किया था।

मन मोहक था जगमोहन महल, वृंदावन

महाराजा दत्त सिंह द्वारा निर्मित जग मोहन महल अत्यंत विशाल और दर्शनीय था। इसी जग मोहन महल के एक भाग में आज महाराजा देवी बख्श सिंह स्मारक कांग्रेस भवन और उनकी प्रतिमा के साथ स्थापित स्मारक स्थित है। धार्मिक प्रवृत्ति के राजा उदवत सिंह की मथुरा के वृंदावन के प्रति आसक्तता को देखते हुए उनकी रानी ने सागर तालाब के बीचों बीच एक टापू पर वृंदावन के तर्ज पर गोर्वधन पर्वत, कृष्ण कुंज, बरसाना, श्याम सदन तथा नगर के बीच राधाकुंड सरोवर और कृष्ण कुंज मंदिर बनवाया।

यहां स्नान के बाद राज परिवार के लोग अंदर बनी सुरंग के रास्ते सगरा तालाब के बीच टापू पर बने गोवर्धन मंदिर में पूजन अर्चन के लिए जाया करते थे। समय के थपेड़ों के साथ तालाब का स्वरूप भी बदल गया और मंदिर झाड़ियों से घिर गया। राजा देवी बख्श सिंह ने गोंडा के पूर्व में जिगना में एक मजबूत किले का निर्माण किया, वहीं से राज्य सम्पत्ति में वृद्धि की और 80 कोस तक राज्य का विस्तार किया।

राम जन्मभूमि के प्रथम आन्दोलन का नेतृत्व

अयोध्या में भगवान श्रीराम के जन्मभूमि और राम मंदिर को लेकर प्रथम बार साल 1853 में सबसे बड़े संग्राम की अगुआई राजा महाराज देवी बख्श सिंह ने ही की थी। इसमें अवध के लगभग सभी हिन्दू राजा उनके साथ थे। जन्मभूमि के इतिहास का यह सबसे बड़ा और प्रथम साम्प्रदायिक युद्ध था और सात दिनों तक चले इस संग्राम में मुगलों को पीछे हटना पड़ा। जन्मभूमि वाला स्थान पुनः हिन्दुओं के कब्जे में आ गया और अस्थाई मंदिर बना दिया गया।

महाराजा को मिले सम्मान, यादगार हो सुरक्षित

विसेन वंशज और राजा देबी बख्श सिंह साहित्य एवं संस्कृति जागरण समिति के अध्यक्ष माधवराज सिंह कहते हैं कि महाराजा देवी बख्श सिंह ने देश की आजादी के लिए अपना साम्राज्य कुर्बान कर दिया। लेकिन आजाद भारत में उन्हें सम्मान नहीं मिला। माधवराज सिंह की मांग है कि आजादी के बाद 1957 में जारी चित्रमाला के अनुसार, स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम क्रान्ति के अग्रिम पंक्ति के आठ क्रान्तिकारियों मंगल पाण्डेय, बहादुर शाह जफर, नाना साहब, लक्ष्मीबाई, तात्याटोपे, कुंवर सिंह और बेगम हजरत महल के साथ महान सेनानी राजा देवी बख्श सिंह का भी नाम शामिल हो और विसेन राजवंश द्वारा स्थापित भवनों, वृंदावन, सागर तालाब और उनके जिगना कोट स्थित राजमहल के ध्वंशावशेष का संरक्षण हो ताकि आने वाली पीढ़ी महाराजा के त्याग, बलिदान, न्याय और जनप्रियता के बारे में जान सके।

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"कलम हमेशा लिखती हैं इतिहास क्रांति के नारों का, कलमकार की कलम ख़रीदे सत्ता की औकात नहीं.."

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