लखनऊ

प्रदेश में साइकिल की रफ़्तार हुई धीमी, कम हुई सीटें घटा वोटों का शेयर

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट

अक्टूबर 1992 में गठन के बाद समाजवादी पार्टी (सपा) ने 1996 के आम चुनाव में पहली बार अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। अपने पहले संसदीय चुनाव में उत्तर प्रदेश में 16 सीटें जीतकर उसने अपनी पारी का शानदार आगाज किया था।

इस चुनाव के बाद हुए छह आम चुनावों में साइकिल कभी रफ्तार से दौड़ नहीं पाई। सपा के लिए सबसे बुरा साल 2019 का आम चुनाव रहा, जब वह बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ गठबंधन में रही और उसका वोट प्रतिशत पहली बार 20 फीसदी से भी कम हो गया। फिलवक्त, सपा के पांच सांसद हैं। 

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1996 के चुनाव में साइकिल ने ली इंट्री

उप्र के संसदीय इतिहास में सपा ने पहली बार 1996 का आम चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में सपा ने 64 सीटों पर उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था और 16 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस चुनाव में सपा को 20.84 फीसदी वोट मिले थे।

1998 के आम चुनाव में सपा ने 81 सीटों पर प्रत्याशी खड़े किये। सपा ने 20 सीटों पर जीत हासिल की। उसके खाते में 16020745 (28.7 फीसदी) वोट आए। इस चुनाव में उसके नौ प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई थी। 

साल 1999 के आम चुनाव में 84 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली सपा को 26 सीटें मिलीं और 24.06 फीसदी वोट मिला। इस चुनाव में सपा के 26 उम्मीदवार अपनी जमानत बचाने में असफल रहे। इसके बाद साल 2004 के चुनाव में सपा 68 सीटों पर लड़ी और 35 सीटें जीती। इस चुनाव में सपा को 14243280 (26.74) फीसदी वोट मिले थे। ये अब तक का सपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था।

चुनाव दर चुनाव घटता गया जनाधार

सपा का दबदबा 2009 के चुनाव में कम हुआ। इस चुनाव में सपा ने 75 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। सपा को सिर्फ 23 सीटें मिलीं और उसका मत प्रतिशत घटकर 23.25 प्रतिशत रह गया और उसके 19 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई।

अखिलेश के मुख्यमंत्री रहते लचर प्रदर्शन

16वीं लोकसभा के लिए 2014 के आम चुनाव में सपा का प्रदर्शन वोट शेयरिग और सीटों के लिहाज से खराब रहा। इस चुनाव में सपा ने 78 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। सपा को सिर्फ पांच सीटों पर जीत हासिल हुई। ये सीट भी यादव परिवार की गढ़ माने जाने वाली सीटें थी। इस चुनाव में सपा को 22.18 फीसदी वोट मिले थे। इस दौरान राज्य में अखिलेश यादव की अगुवाई में सपा की पूर्ण बहुमत की सरकार भी थी। इस प्रदर्शन से सपा सरकार की कार्यप्रणाली पर तो सवाल उठे ही, वहीं उसका राजनीतिक रसूख भी प्रभावित हुआ। 

2019 के चुनाव में गठबंधन के बाद भी हालत खराब 

2019 के आम चुनाव में सपा-बसपा-रालोद का गठबंधन था। गठबंधन में सपा के हिस्से में 37 सीटें आई थी। इस चुनाव में सपा 5 सीटें ही जीत सकी। गठबंधन के बावजूद उसका वोट प्रतिशत सिर्फ 17.96 फीसदी ही रहा। गठबंधन का फायदा बसपा को मिला। उसकी सीटें शून्य से दस पर पहुंच गई। बसपा का वोट शेयर 19.26 फीसदी रहा। रालोद का तो इस चुनाव में खाता ही नहीं खुला। 

2024 के चुनाव में पीडीए और कांग्रेस से गठबंधन

इस बार सपा-कांग्रेस का गठबंधन है। इंडिया गठबंधन में हुए सीटों के बंटवारे में सपा 63 और कांग्रेस 17 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के फार्मूले से चुनाव जीतने के दावे कर रहे हैं। लेकिन जिस तरह सपा कई-कई बार प्रत्याशी बदल रही है, उससे पार्टी में कंफ्यूजन का माहौल है। कई प्रत्याशियों को लेकर स्थानीय नेताओं ओर कार्यकर्ताओं में नाराजगी भी देखने को मिल रही है। 

वहीं कांग्रेस का उप्र में सियासी वजूद और हैसियत जगजाहिर है। कांग्रेस का हाथ साइकिल को कितनी रफ्तार दे पाता है यह तो चुनाव के नतीजे ही बताएंगे। हालांकि बीते सात लोकसभा चुनावों में सपा के प्रदर्शन के आधार पर यह माना जा रहा है कि सपा के लिए यह चुनाव आसान नहीं है। 

उप्र लोकसभा चुनाव में सपा का प्रदर्शन

चुनाव वर्ष – सीटें – वोट प्रतिशत

1996 – 16 – 20.84

1998 – 20 – 28.70

1999 – 26- 24.06

2004 – 35 – 26.74

2009 – 23 – 23.26 

2014 – 05 – 22.18

2019 – 05 – 17.96

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"कलम हमेशा लिखती हैं इतिहास क्रांति के नारों का, कलमकार की कलम ख़रीदे सत्ता की औकात नहीं.."

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