अंजनी कुमार त्रिपाठी की रिपोर्ट
महाकुंभ नगर में 70 वर्षीय वृद्धा रेखा की कहानी इंसानियत को झकझोर देने वाली है। पति ने वर्षों पहले छोड़ दिया, बेटों ने मुंह मोड़ लिया और बेटियां भी भूल गईं। अब बुढ़ापे में समय ने भी उनका साथ छोड़ दिया। किसी अपने की प्रतीक्षा में आंखें बार-बार दरवाजे की ओर उठती हैं, लेकिन कोई नहीं आता।
रेखा गुरुवार को महाकुंभ के उप केंद्रीय अस्पताल सेक्टर 20 में गंभीर हालत में भर्ती कराई गई थीं। उन्हें लाने वाली दो महिलाएं और एक पुरुष खुद को पड़ोसी और बेटी बता रहे थे। लेकिन अस्पताल में भर्ती कराकर तीनों वहां से गायब हो गए। जो फोन नंबर उन्होंने दर्ज कराए थे, वे कॉल करने पर भी नहीं उठ रहे।
अस्पताल प्रशासन ने महिला की स्थिति गंभीर देखकर उन्हें केंद्रीय अस्पताल में रेफर कर दिया, लेकिन वहां भी कोई तीमारदार नहीं आया। अब रेखा अकेली अस्पताल के बेड पर पड़ी अपने बीते दिनों को याद कर रही हैं।
रेखा की दर्दभरी दास्तान: पति ने छोड़ा, बेटे-बेटियां भी भूल गए
अस्पताल के बेड पर लेटी रेखा आंसुओं के साथ अपने जीवन की कहानी सुनाती हैं। उनका विवाह 1973 में एक अधिवक्ता से हुआ था। शादी के बाद पांच बेटे और दो बेटियों का जन्म हुआ। लेकिन जीवन खुशहाल नहीं रहा।
रेखा बताती हैं, “पति ने दूसरी शादी कर ली और मुझसे नाता तोड़ लिया। बेटे बड़े हुए, लेकिन उन्होंने भी मुझे ठुकरा दिया। बेटियों से भी अब कोई रिश्ता नहीं रहा।”
वह प्रयागराज के नारायणी आश्रम में रहती थीं, लेकिन अब वहां भी उनका कोई ठिकाना नहीं बचा। बुढ़ापे में घरवाले उन्हें बोझ समझने लगे। अस्पताल में भर्ती रेखा अपनी तकदीर को कोसते हुए कहती हैं – ‘क्या अपराध किया था मैंने जो ऐसी सजा मिली?’
रेखा से जब पूछा गया कि वह महाकुंभ में कैसे आईं, तो वह कुछ साफ-साफ नहीं बता पातीं। कभी कहती हैं कि बेटों ने लाकर छोड़ दिया, कभी कहती हैं कि खुद आईं, लेकिन अब रास्ता भूल गईं।
अस्पताल प्रशासन ने कहा – परिवार न आया तो वृद्धाश्रम भेजेंगे
केंद्रीय अस्पताल के सीएमएस डॉ. मनोज कुमार कौशिक ने कहा,
“रेखा को सेक्टर-9 के अस्पताल से लाकर बेहतर इलाज दिया जा रहा है। यदि परिवार से कोई नहीं आता, तो उन्हें स्वस्थ होने के बाद वृद्धाश्रम भेजने की व्यवस्था की जाएगी। इस उम्र में इस तरह से किसी को छोड़ देना बहुत कष्टदायक है।”
“मां, परेशान मत हो… हम हैं न बेटियां!”
अस्पताल में भर्ती रेखा जब खाने के लिए कुछ मांगते हुए रो पड़ीं, तो वहां की एक नर्स ने उन्हें दिलासा दिया। नर्स ने रेखा का हाथ थामकर प्यार से कहा –
“मां, परेशान क्यों होती हो? कोई नहीं आ रहा तो क्या हुआ, हम करेंगे सेवा। हम हैं न बेटियां!”
यह सुनकर रेखा कुछ पल के लिए शांत हो गईं। नर्स के इन चंद शब्दों में वह अपनापन था, जो शायद उन्हें अपने बच्चों से कभी नहीं मिला।
अब रेखा अस्पताल के बेड पर लेटी हर आहट पर उम्मीद से दरवाजे की ओर देखती हैं, शायद कोई उन्हें लेने आ जाए। लेकिन अब कोई नहीं आता, कोई नहीं पूछता।
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