अपराध

बुलडोजर तले जांच ; साजिश, हमला और कत्ल…आठवें दिन भी खाली हैं पुलिस के हाथ 

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट 

यूपी के प्रयागराज में हर तरफ से देख लीजिए। हर एंगल से बुलडोजर साफ दिखाई दे जाएगा। पिछले तीन दिनों में तीसरी बार प्रयागराज में बुलडोजर चला है। सबसे ताजा बुलडोजर जिस घर को जमीदोज कर रहा है, उस घर के मालिक के बारे में दावा किया जा रहा है कि उसके खिलाफ 16 केस दर्ज हैं. बताया जा रहा है ये घर माशुकुद्दीन का है।

बुलडोजर के पहियों तले कुचलते सवाल

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सच्चाई ये है कि ये घर उसका नहीं बल्कि उसकी टीचर बहू का है। वो भी घर लोन पर लिया हुआ है। अब अगर पिछले तीन दिनों में इन तीन बुलडोजरों की तस्वीर आप गौर से देखेंगे, तो सिर्फ ढहते घर ही नजर आएंगे। उमेश पाल मर्डर केस की जांच का क्या हुआ? उमेश पाल के कातिल शूटर कहां छुपे हैं? उमेश पाल का कत्ल क्यों किया गया? इन सवालों के जवाब अभी पूरी तरह से नहीं मिले हैं। ऐसे में इस केस में फिलहाल की सच्चाई यही है कि उमेश पाल मर्डर केस की जांच बुलडोजर तले है।

सवालों से बच रही है पुलिस

उमेश पाल का कत्ल 24 फरवरी को हुआ था. यानी कत्ल को आठ दिन हो गए। अब इन आठ दिनों में इस बुलडोजर वाली जांच को किनारे रख दें, तो यूपी पुलिस ने कत्ल की जांच कैसे की? जांच अभी कहां तक पहुंची? उमेश पाल के कातिलों का क्या हुआ? कत्ल का मकसद क्या था? इनमें से एक का भी जवाब अभी तक नहीं मिल सका है। पुलिस भी ऐसे सवालों से बचती हुई नजर आ रही है।

पुलिस की हर कहानी अतीक तक

सच्चाई ये है कि पिछले आठ दिनों में उमेश पाल पर गोली और बमों से हमला करनेवाले एक भी शूटर पुलिस के हाथ नहीं लगे हैं। यानी अब तक एक भी गिरफ्तारी नहीं हुई है। सिवाय पहले दिन पकड़े गए एक वकील सदाकत के और अगले दिन हुए एक एनकाउंटर में मारे गए अरबाज के शूटरों को छोड़िए कत्ल की असली वजह यूपी पुलिस से पूछ लीजिए तो वो बगले झांकते हुए नजर आते हैं। ऐसे में वजह बताने की बजाय एक नाम पर सारा किस्सा तमाम कर देते हैं। और वो नाम है अतीक अहमद। अब जब यूपी पुलिस की जांच ही अभी बेनतीजा है, तो इस नाम पर क्या बात की जाए? लिहाजा, उसी पर बात करते हैं, जो कम से कम सामने दिखाई दे रहा है। यानी बुल्डोजर।

तीन दिन तीन तस्वीरें

तीन अलग-अलग दिनों में तीन तस्वीरें सामने आई हैं और इन तीन दिनों में शासन-प्रशासन ने प्रयागराज में तीन अलग-अलग मकानों को धराशाई कर दिया गया। वैसे बताया तो ये गया कि ये मकान नियम कानूनों का उल्लंघन कर बनाए गए थे। लेकिन सच्चाई यही है कि इन तीनों ही मकानों पर चले बुलडोजरों का कनेक्शन उमेश पाल मर्डर केस से जरूर है। वरना ऐसी क्या बात थी कि पीडीए को कानून तोड़ कर बनाए जाने वाले इन मकानों की याद एकाएक आ गई और ये कार्रवाई शुरू हो गई।

पीडीए यानी प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी ने शुक्रवार को जिस मकान को माशुकुद्दीन का बता कर जमीदोज कर डाला, उसके लिए दलील दी गई कि ये मकान एयरफोर्स की जमीन पर बना है। सवाल ये कि जब ये मकान बन रहा था, तब पीडीए कहां था? हां, ये जरूर है कि माशुकुद्दीन पर सोलह, उसके बेटे शाहजमन और शाह फतेह पर 40 और भतीजे असलूब पर दस क्रिमिनल केसेज दर्ज हैं।

पत्रकार जफर खान का दावा

अब बात उस जफर अहमद खान की जिसकी कोठी को जमींदोज करने के साथ ही माफिया को मिट्टी में मिला देने वाली कार्रवाई की शुरुआत हुई। बांदा के रहनेवाले जफर अहमद खान ने खुद के पत्रकार होने का दावा करते हुए ये कहा है कि उसका ना तो उमेश पाल के कत्ल से कोई लेना-देना है और ना ही अतीक अहमद से। यहां तक कि जफर का कहना है कि उसकी आजतक कभी अतीक अहमद या उसके घरवालों से मुलाकात तक नहीं हुई। इसके बावजूद पीडीए की ओर से प्रयागराज के चकिया इलाके में मौजूद उसकी कोठी को धराशाई कर दिया गया।

जफर ने वीडियो किया जारी

जफर ने अपनी सफाई में एक वीडियो जारी किया है. उसने कहा है कि उसने प्रयागराज की वो कोठी अपनी मेहनत के पैसों से खरीदी थी और उसे अपने बहनोई और एडवोकेट खान सौलत हनीफ के जरिए शाइस्ता परवीन को किराये पर दिया था। असल में खान सौलत हनीफ ने जब कुछ दिनों के लिए जब उससे अपनी कोठी शाइस्ता को किराये पर देने की पेशकश की थी, तो बहनोई होने के नाते वो मना नहीं कर सका और शाइस्ता अपने बच्चों के साथ उस कोठी में रहने लगी। जफर के मुताबिक कोठी का किराया 20 हजार रुपये महीने का तय हुआ था। ऐसे में बगैर किसी पूर्व सूचना के सिर्फ इस बात पर कि उसकी कोठी में अतीक का परिवार रहता था, उसे गिरा दिया गया।

कातिलों का प्लान

वैसे तो तफ्तीश के नाम पर अब तक यूपी पुलिस के हाथ खास कुछ नहीं लगा है. शूटरों का कोई अता-पता नहीं है। लेकिन पुलिस के सूत्र कुछ सुरागों का दावा जरूर कर रहे हैं। सूत्रों की मानें तो 24 फरवरी को उमेश पाल पर गोलियां बरसाने के बाद शूटरों ने गाड़ियां बदल-बदल कर अपने ठिकानों तक भागने का प्लान बनाया था, ताकि पुलिस के लिए उन्हें लोकेट करना मुश्किल हो जाए।

फॉर्च्यूनर कार में सवार होकर निकले शूटर

सूत्रों के मुताबिक शूटरों ने हर जिले में गाड़ी बदली, ताकि अगर एक जिले की पुलिस को उनके बारे में खबर भी हो जाए, तो जब तक वो दूसरे जिले में पहुंचे, तब तक गाड़ी बदल लिए जाने की वजह से उनकी पहचान मुमकिन ना हो। सिर्फ इसी मॉडस ऑपरेंडी को देख कर ये समझा जा सकता है कि उमेश पाल के कत्ल की तैयारी कितनी खतरनाक थी। मामले की तफ्तीश में जुटी प्रयागराज पुलिस और एसटीएफ को शूटरों के मूवमेंट के बारे में कई अहम इनपुट मिले हैं। पता चला है कि वारदात को अंजाम देने बाद तय प्लान के मुताबिक शूटरों ने जहां अपनी सफेद रंग की क्रेटा कार प्रयागराज में ही छोड़ दी थी, वहीं उन्हें पिक करने के लिए लखनऊ से दो फॉर्च्यूनर गाड़ियां भेजी गई थीं। जिनमें बैठ कर शूटर जिले से बाहर निकल गए।

पहले भी 3 बार की गई कत्ल की कोशिश

छानबीन में पुलिस को उमेश पाल हत्याकांड से जुड़ी एक और चौंकाने वाली बात पता चली है। पुलिस सूत्रों की मानें तो उमेश का कत्ल बेशक 24 फरवरी को हुआ, लेकिन इससे पहले तीन बार उमेश की हत्या की कोशिश की गई थी। लेकिन अलग-अलग वजहों से वो मुमकिन नहीं हो सका। सूत्रों के मुताबिक फरवरी में ही 14, 18 और 21 तारीख को उमेश पर हमले के लिए उमेश के घर के पास ही घात लगाया गया था। लेकिन वो बच निकला। प्रयागराज पुलिस ने कुछ संदिग्ध मोबाइल नंबर और सीसीटीवी फुटेज की स्कैनिंग के बाद इस बात का खुलासा किया है। पुलिस का कहना कि शूटर पहले कम से कम तीन बार उसके घर तक पहुंचे थे।

शूटरों के लिए पहले से तय था हमले का प्लान

उमेश पाल के कत्ल की साजिश कितनी शातिराना तरीके से बुनी गई, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वारदात को अंजाम देने के लिए हर शूटर का रोल पहले से ही तय था। मसलन कौन गाड़ी से जाएगा, कोई हवाई फायर करेगा, कौन कवर फायर देगा, कौन बम चलाएगा और कौन पहले ही किसी खरीददार के भेष में उमेश के घर के बाहर दुकान में मौजूद रहेगा। इतना ही नहीं प्लानिंग किसी भी सूरत में लीक ना हो जाए, इस बात का ख्याल रखते हुए मास्टरमाइंड ने ना सिर्फ हर किसी को उसके हिस्से का काम बांट दिया था, बल्कि शूटआउट के चंद मिनट पहले तक शूटरों को इस वारदात में शामिल होनेवाले दूसरे शूटरों के बारे में ज्यादा जानकारी भी नहीं दी गई थी।

हर शूटर ने किया अलग काम

सीसीटीवी कैमरों की तस्वीरों को देखकर भी साफ है कि सारे शूटर एक साथ उमेश पाल या उसके गनर पर नहीं टूट पड़ते हैं, बल्कि कोई राइफल लेकर हवाई फायर करता है, कोई घूम-घूम कर बम फेंकता है, कोई अचानक ही उमेश पाल पर हमला करता है, कोई उसे कवर फायर देता है, तो कोई उमेश पाल किसी भी सूरत में बच पाए, इस बात का ख्याल रखते हुए गोली लगने के बावजूद पीछा कर उस पर और गोलियां दागता है।

गुलाम ने कराई थी सदाकत और अली की मुलाकात

पुलिस की मानें तो उमेश के घर के पड़ोस में मौजूद इलेक्ट्रॉनिक की दुकान में ग्राहक बन कर घात लगानेवाले मोहम्मद गुलाम ने इस शूटआउट में एक अहम कड़ी का रोल अदा किया। ये मोहम्मद गुलाम ही था, जिसने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के मुस्लिम हॉस्टल में रहनेवाले वकील सदाकत से संपर्क साधा था और शूटआउट की प्लानिंग के लिए हॉस्टल के रूम में बैठक करवाने की बात कही थी। बदले में उसने सदाकत को अतीक से जुड़े तमाम जमीन विवाद के मामलों की वकालत दिलाने का भरोसा दिया था। गुलाम ने ही उसे अतीक अहमद के बेटे अली से भी मिलवाया था। जिसके बाद उसकी अली से दोस्ती हो गई थी।

गुलाम की करतूत, भाई को सजा

फिलहाल इस वारदात को अंजाम देने के बाद मोहम्मद गुलाम तो फरार है, लेकिन उसकी करतूत की कीमत अब उसके भाई राहिल हसन को चुकानी पड़ी है। राहिल हसन बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा का महानगर अध्यक्ष था, लेकिन इस वारदात में उसके भाई गुलाम का नाम सामने आने के बाद बीजेपी ने अब राहिल हसन को पद से हटा दिया है।

अली अहमद की जमानत खारिज

दूसरी ओर प्रयागराज जेल में बंद अली अहमद की जमानत भी हाई कोर्ट ने गुरुवार को खारिज कर दी। उसने कत्ल की कोशिश और 5 करोड की रंगदारी मांगने के एक मामले में जमानत की अर्जी दी थी। हालांकि कोर्ट ने कहा कि उमेश पाल हत्याकांड में अली अहमद का नाम आया है, लिहाजा उसे जमानत नहीं दी जा सकती है। अगर जमानत दी गई तो गवाहों और समाज के लिए यह सुरक्षित नहीं होगा।

कई माफियाओं के साथ काम कर चुका है गुड्डू बमबाज

वैसे तो उमेश पाल के कत्ल की वारदात के बाद अतीक का पूरा का पूरा गैंग ही पुलिस की रडार पर है, लेकिन सीसीटीवी कैमरे में नजर आ रहा गोल-मटोल सा बमबाज गुड्डू मुस्लिम अचानक से सुर्खियों में आ गया है। अतीक का ये पुराना गुर्गा गुड्डू मुस्लिम कभी यूपी के धनंजय सिंह, अभय सिंह और मुख्तार अंसारी जैसे दूसरे बाहुबलियों के लिए भी काम कर चुका है।

गुड्डू के बारे में बताया जाता है कि वो कत्ल और जानलेवा हमलों की वारदातों में तो शामिल रहा है, लेकिन वो गोली नहीं, बल्कि बम चलाने पर ज्यादा यकीन रखता है। वो खुद ही बम बनाता है और चलाता भी है। कुछ इसी वजह से उसका नाम गुड्डू बमबाज पड़ गया।

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"कलम हमेशा लिखती हैं इतिहास क्रांति के नारों का, कलमकार की कलम ख़रीदे सत्ता की औकात नहीं.."

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