राष्ट्रीयसंपादकीय

भूल गए, 25 जून, 1975… न्यायपालिका और मीडिया तक को ‘बंधक’ बना लिया गया था… . 

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-अनिल अनूप

यह तारीख भारतीय इतिहास में कभी भूली नहीं जा सकती। यह वही दिन है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया था, जो संविधान और लोकतंत्र विरोधी था। न्यायपालिका और मीडिया को बंधक बना लिया गया था, प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई थी और स्वायत्त संस्थानों की स्वतंत्रता छीन ली गई थी। केवल वही अखबार छप पाते थे जिनकी एक-एक खबर को सूचना मंत्रालय द्वारा अनुमति दी जाती थी। 

एक लाख से अधिक विपक्षी नेताओं, पत्रकारों और अन्य व्यक्तियों को बिना किसी आरोप के जेल में डाल दिया गया था। जमानत का कोई प्रावधान नहीं था। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को एक अदालत ने ‘अवैध’ करार दिया था, और उन्हें चुनाव लड़ने के लिए छह साल के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था। इसके बाद तत्कालीन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने सुझाव दिया कि अनुच्छेद 352 के तहत देश में आपातकाल लागू कर दिया जाए।

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तत्पश्चात, इंदिरा गांधी और सिद्धार्थ शंकर रे तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के पास गए और रात्रि करीब 11.30 बजे राष्ट्रपति ने अध्यादेश पर हस्ताक्षर किए। इसे इतना गोपनीय रखा गया कि किसी भी कैबिनेट मंत्री को इसकी जानकारी नहीं थी। अगले दिन, 26 जून की सुबह, इंदिरा गांधी ने कैबिनेट बैठक बुलाई और मंत्रियों को आपातकाल के बारे में बताया। यह खबर सुनकर सभी मंत्री स्तब्ध थे, लेकिन कुछ नहीं कर सकते थे क्योंकि वे सत्ता के कांग्रेसी गुलाम थे।

सुबह सात बजे, इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी पर आपातकाल की घोषणा की, जिससे संविधान और लोकतंत्र पर ‘काला धब्बा’ लग गया। स्वतंत्र भारत के उस काले दिन का इतिहास कभी भूला नहीं जा सकता। 

आज, 50 साल बाद, संसद भवन में इंदिरा गांधी की बहू सोनिया गांधी और पौत्र राहुल गांधी ने विपक्षी नेताओं के साथ मिलकर संविधान की प्रति लहराते हुए प्रदर्शन किया। उन्होंने खुद को ‘संविधान का रक्षक’ और प्रधानमंत्री मोदी को ‘तानाशाह’ करार दिया। 

कांग्रेस और ‘इंडिया’ गठबंधन ने इस छद्म नेरेटिव पर पूरा चुनाव लड़ा था कि अगर मोदी सरकार वापस आई, तो संविधान बदल दिया जाएगा और लोकतंत्र खत्म हो जाएगा। 

हालांकि, चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं और देश ने विभाजित जनादेश दिया है, लेकिन गठबंधन के बहुमत के आधार पर मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन चुके हैं। उनके सभी प्रमुख मंत्री जीत कर दोबारा मंत्री भी बन चुके हैं। संसद में 18वीं लोकसभा का पहला दिन, पहला सत्र शुरू हुआ। 

नवनिर्वाचित सांसदों ने शपथ ली, लेकिन कांग्रेस समेत विपक्षी सांसद संविधान की प्रति लेकर संसद परिसर में आए।

राहुल गांधी ने कहा कि कोई भी ताकत संविधान को छू नहीं सकती। सदन के भीतर जब प्रधानमंत्री सांसद के तौर पर शपथ लेने जा रहे थे, तो विपक्षी सीटों से संविधान की प्रति लहराई जा रही थी। मकसद और संकेत स्पष्ट थे। यह भी साफ हो गया कि विपक्ष आक्रामक रहेगा और सदन में हंगामा, अवरोध, नारेबाजी का माहौल रहेगा। 

विपक्ष सार्थक, सकारात्मक, जिम्मेदार भूमिका निभाने को बिल्कुल भी तैयार नहीं लगता। कमोबेश अब चुनाव के मुद्दे और मुद्रा छोड़ देने चाहिए। अब जनता ने ठोस और राष्ट्रहित कामों के लिए जनादेश दिया है, लिहाजा संसद के भीतर वही भूमिका होनी चाहिए, लेकिन विपक्ष अब भी झूठे नेरेटिव पर राजनीति करना चाहता है। 

हालांकि प्रधानमंत्री ने कुछ ऐसे शब्द कहे हैं, जिनसे वह कमजोर प्रतीत नहीं होते। प्रधानमंत्री के तेवर वही हैं और वह अपने विवेक के मुताबिक काम करने, फैसले लेने को तैयार दिखते हैं। उन्हें गठबंधन की चिंता नहीं है, लेकिन सवाल है कि यदि संविधान को खत्म किया जाना था अथवा लोकतंत्र समाप्त हो सकता था, तो मोदी सरकार को 10 लंबे साल हासिल थे।

उन्होंने संविधान पर कौनसे हमले किए? यदि चुनाव हुए हैं, नई संसद आकार ले रही है, तो संविधान की स्थिति स्पष्ट है। क्या कांग्रेस आपातकाल का दौर भूल चुकी है? आपातकाल पर किसने माफी मांगी है? देश को यह स्पष्ट होना चाहिए।क

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"कलम हमेशा लिखती हैं इतिहास क्रांति के नारों का, कलमकार की कलम ख़रीदे सत्ता की औकात नहीं.."

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