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प्रमोद दीक्षित मलय भाषा गौरव सम्मान से विभूषित

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट 

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अतर्रा (बांदा)। शिक्षक साहित्यकार प्रमोद दीक्षित मलय को मातृभाषा के उत्थान हेतु अप्रतिम योगदान के लिए गत दिवस हिंदी महोत्सव संस्था द्वारा आयोजित अखिल भारतीय साहित्यकार सम्मेलन, दतिया (मध्यप्रदेश) में भाषा गौरव सम्मान से विभूषित किया गया गया। जनपद के शिक्षक-साहित्यकारों, परिवार एवं परिचितों ने बधाई देते हुए नित नवल उपलब्धियां प्राप्ति हेतु शुभकामनाएं दी हैं।

हिंदी भाषा के उत्थान के लिए कार्य कर रही साहित्यिक संस्था हिंदी महोत्सव (दतिया) द्वारा 17-18 सितम्बर, 2022 को दतिया के एक होटल में आयोजित दो दिवसीय अखिल भारतीय साहित्यकार सम्मेलन में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित जनपद बांदा के शिक्षक एवं हिंदी सेवी साहित्यकार प्रमोद दीक्षित मलय को उनके मातृभाषा हिंदी के उत्थान हेतु किए जा रहे अप्रतिम योगदान के लिए 16 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के साहित्यकारों की उपस्थिति में संस्था द्वारा ‘भाषा गौरव सम्मान’ से विभूषित किया है।

सम्मेलन में ही प्रमोद मलय द्वारा संपादित बेसिक शिक्षा के 104 शिक्षक-शिक्षिकाओं की रचनाओं पर आधारित ‘प्रकृति के आंगन में’ पुस्तक का लोकार्पण बाबा कल्पनेश हरिद्वार, डॉ. आनंद मिश्रा जी (पूर्व कुलसचिव, जिवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर), ओज कवि अतुल बाजपेयी लखनऊ, श्रीमन्नारायण हैदराबाद, डॉ. कमलेश शर्मा इटावा, संस्था प्रमुख जगत शर्मा, भानु शर्मा आदि साहित्य मनीषियों के कर कमलों द्वारा समपन्न हुआ।

उल्लेखनीय है कि प्राथमिक विद्यालय पचोखर-2, क्षेत्र महुआ में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत प्रमोद दीक्षित मलय बाल्यकाल से ही साहित्यिक अभिरुचि सम्पन्न हैं। परिवार के साहित्यिक परिवेश का प्रभाव पड़ा है। पिता श्री बाबूलाल दीक्षित (प्राचार्य, श्रीमन्नूलाल संस्कृत महाविद्यालय अतर्रा) एवं माता श्रीमती रामबाई दीक्षित के संस्कारक्षम पालन-पोषण एवं मार्गदर्शन का ही परिणाम है कि आज प्रमोद दीक्षित मलय साहित्य के क्षेत्र में अनवरत साधनारत हैं। देश-विदेश की प्रमुख-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होते हैं।

साथी शिक्षकों को “शैक्षिक संवाद मंच” से जोड़कर शिक्षा एवं साहित्य के क्षेत्र में कुछ नया मौलिक रचने हेतु प्रोत्साहन देते हुए कार्यशालाएं आयोजित करते हैं। अभी तक प्रमोद मलय के संपादन में पहला दिन, महकते गीत, हाशिए पर धूप, कोरोना काल में कविता तथा प्रकृति के आंगन में पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। राष्ट्र साधना के पथिक तथा स्मृतियों की धूप-छाँव मुद्रण की प्रक्रिया में हैं। शिक्षा के क्षेत्र में बच्चों के रचनात्मक विकास के लिए भी लेखन कार्यशाला का आयोजन कर नयी पीढ़ी को सजा-संवार रहे हैं।

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"ज़िद है दुनिया जीतने की" "हटो व्योम के मेघ पंथ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं"
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