बस्तर

बाप के अंतिम संस्कार हेतु बेटे को हाईकोर्ट की लेनी पडी़ शरण…. बेहद चौंकाने वाला है मामला

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हरीश चन्द्र गुप्ता की रिपोर्ट

बस्तर: छत्तीसगढ़ के जगदलपुर के छिंदबाहर गांव में एक अनोखा मामला सामने आया है। यहां एक बेटे को अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटना पड़ा। यहां रहने वाले सार्थिक कोर्राम के परिवार को अंतिम संस्कार के लिए जमीन नहीं दी गई। जिसके बाद परिवार हाईकार्ट पहुंच गया। जिसके बाद कोर्ट ने निजी जमीन पर अंतिम संस्कार कराने का निर्देश दिया। खास बात यह है कि हाईकोर्ट ने इस पूरे फैसले में रामायण के श्लोकों का जिक्र किया है।

बीते 25 अप्रैल को जगदलपुर के छिंद बाहर में परिवार के बुजुर्ग की मौत हो गई थी। जिसके बाद गांव के लोगों ने गांव में ही अंतिम संस्कार करने से इनकार कर दिया। परिवार के लोगों ने अंतिम संस्कार के लिए जमीन नहीं मिलने का विरोध किया। इस पूरे मामले में बढ़ते विरोध को देखते हुए परिवार के लोगों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। जिसके बाद हाई कोर्ट के निर्देश पर पुलिस सुरक्षा की मौजूदगी में निजी जमीन पर मृतक का अंतिम संस्कार किया गया है।

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दरअसल, बस्तर में धर्मांतरण से जुड़े विवाद को लेकर स्थानीय आदिवासी समुदाय और धर्मांतरित परिवारों के बीच इस तरह के विवाद बार-बार सामने आते रहते हैं। जिससे कई बार कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मामले में हाई कोर्ट के निर्देश के बाद अब उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में इस तरह के विवादों के लिए पुलिस के पास एक बेहतर समाधान उपलब्ध होगा।

रामायण के श्लोक का जिक्र

इस फैसले में हाईकोर्ट ने रामायण के श्लोकों का भी जिक्र किया है। जिसमें ‘मित्राणि धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव, जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ अर्थात मित्र, धन, धान्य आदि का संसार में बहुत अधिक सम्मान है। किन्तु माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है। 

हाईकोर्ट ने कहा है कि ‘यह पहले से ही कानून का एक सुस्थापित सिद्धांत है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में किसी व्यक्ति को सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार का अधिकार शामिल है। जीवन का अधिकार का तात्पर्य है मानवीय गरिमा के साथ एक सार्थक जीवन, न कि केवल एक पशु का जीवन और यह अधिकार उस व्यक्ति तक भी विस्तारित है, जिसकी मृत्यु हो चुकी है। यह अधिकार किसी व्यक्ति की मृत्यु तक मौजूद रहता है, जिसमें मृत्यु तक सभ्य जीवन का अधिकार सहित, सभ्य मृत्यु संस्कार भी शामिल है।

अपना लिया था ईसाई धर्म

जगदलपुर के डिमरापाल अस्पताल में 54 साल के बुजुर्ग ईश्वर कोर्राम की मौत हो गई थी। परिवार ने ईसाई धर्म को अपना लिया था। जिसके बाद परिवार के सदस्य चाहते थे कि ईश्वर कोर्राम का अंतिम संस्कार ईसाई रीति रिवाजों से हो। शव को दफनाने की बात जैसे ही इलाके में फैली तो इस पर कई आदिवासी समुदाय ने विरोध शुरु कर दिया।’

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"कलम हमेशा लिखती हैं इतिहास क्रांति के नारों का, कलमकार की कलम ख़रीदे सत्ता की औकात नहीं.."

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