घर के अपने ही परिजन जब यह पूछ बैठें—”आपकी किताब का क्या हुआ?”—तो भीतर कहीं कुछ टूट सा जाता है। केवल यही नहीं, अनील जी सर, जो कभी हर विषय पर रात-दिन संवाद किया करते थे, इस मामले में मौन साध लेते हैं। ऐसे में मित्रों के तंज—”तुम्हारी किताबें तो दो साल से कोरियर वाले के पास पड़ी हैं, चलो, खुद ही ले आते हैं”—किसी नश्तर से कम नहीं लगते।
झूठ, फरेब और मेहनत का मखौल
वास्तव में, जिन विद्वानों ने मेरी पुस्तक पर शुभकामनाएं दी थीं, उनके समक्ष जाने का साहस तक नहीं जुटा पाता। क्या करूं? दोष समाचार दर्पण की है, पर कटघरे में मुझे खड़ा कर दिया गया। लोग मुझे झूठा और फरेबी कहने लगे हैं। मेरी ईमानदार मेहनत को नकारा जा रहा है।
हालाँकि, यह सर्वविदित है कि साहित्य का एक बड़ा भाग कल्पना पर आधारित होता है। परंतु मेरा यह अनुभव शत-प्रतिशत सत्य है।
केवल एक दर्पण नहीं, कई हैं
यह विडंबना है कि केवल ‘समाचार दर्पण 24’ ही नहीं, बल्कि कई ऐसे ‘दर्पण’ हैं जिन्हें आज आइना दिखाने की आवश्यकता है। उन व्यवस्थाओं को उनके गिरेबान में झाँकने के लिए शब्दों की शक्ति का प्रयोग अनिवार्य है। लेखनी के माध्यम से हमें न केवल दूसरों को नसीहत देनी चाहिए, बल्कि अपनी भी एक छुपी हुई तस्वीर सामने लानी चाहिए—जिसे आम लोग नहीं, पर जागरूक लेखक और संवेदनशील प्रकाशक अवश्य समझ सकें।
दिया तले अंधेरा और विश्वास का प्रश्न
हम दूसरों को तो लेखनी से रास्ता दिखाते हैं, परंतु कई बार स्वयं हमारे पाँव अंधकार में उलझे होते हैं। आपने एक घटना का जिक्र किया था—एक लेखक ने जब उसकी किताब नहीं छापी गई, तो उसने पैसे वापस मांगे और आपने लौटा भी दिए। लेकिन, क्या आपने उसके दर्द को लौटाया?
यह केवल पैसे लौटाने का मामला नहीं था। उसने अपनी रचना में भावनाएं झोंकी थीं, समय दिया था, समाज में उम्मीदें बनाई थीं। जब उसके सपनों का महल अंतहीन प्रतीक्षा में बिखर गया, तो वह केवल “धनवापसी” नहीं चाहता था, वह अपने आत्म-सम्मान की भी रक्षा कर रहा था।
लेखक की पीड़ा और मिडिया की जिम्मेदारी
कभी-कभी छोटी सी घटना, यदि सार्वजनिक मंच पर आ जाए, तो वह समाज के हर उस तंत्र को जागरूक कर सकती है जो लेखक और प्रकाशक के बीच की अदृश्य डोर को समझ नहीं पाता। यही वह पल होता है जब मानव और मशीन, दोनों अपने दायित्व बोध का एहसास कर सकते हैं।
विश्वास बनाए रखने की जरूरत
लेखन केवल शब्दों का खेल नहीं, यह विश्वास का पुल है। जब वह पुल टूटता है, तो सिर्फ एक लेखक नहीं, पूरा साहित्यिक समाज डगमगाता है। इसीलिए, आवश्यक है कि हम अपनी वचनबद्धता को केवल वाचिक न रखें, उसे कर्म में बदलें। ताकि किसी लेखक को न अपने सपनों से भागना पड़े, न ही समाज के सामने शर्मिंदा होना पड़े।
➡️वल्लभ भाई लखेश्री

Author: samachardarpan24
जिद है दुनिया जीतने की
1 thought on “वचनबद्धता बनाम उपेक्षा: जब लेखक की मेहनत सवालों में घिर जाए”
लेकिन आर्थिक सामाजिक मानसिक और पारिवारिक झलक लेकिन आर्थिक सामाजिक मानसिक और पारिवारिक वेदना भोगने के लिए किसी को मजबूर करना कोनसी साहित्यिक परम्परा हैं। यह तो प्रकाशक के कार्य पर ही प्रश्न खड़ा हो रहा है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है, लगभग 2 वर्ष, कोई तो जवाब देही निश्चित होनी चाहिए, यह ऐसे ही पोल में ढोल बजाते रहेंगे🤔