अब्दुल मोबीन सिद्दीकी की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के अस्ता गांव में आज खुशी की लहर है। गांववालों के चेहरे पर मुस्कान है और चबूतरे पर घी के दीये जलाए जा रहे हैं। इसकी वजह है कुख्यात दस्यु सुंदरी कुसुमा नाइन की मौत, जिसने 41 साल पहले इस गांव में भयानक नरसंहार किया था।
1984 में अंजाम दिया था दिल दहला देने वाला नरसंहार
दरअसल, 1981 में हुए बेहमई कांड में दस्यु सुंदरी फूलन देवी ने 22 लोगों को लाइन में खड़ा कर गोली मार दी थी। इसी का बदला लेने के लिए कुसुमा नाइन ने 1984 में मल्लाहों के गांव अस्ता में खून की होली खेली थी।
गांव के बुजुर्गों के मुताबिक, कुसुमा ने अपने गिरोह के साथ गांव में दिनदहाड़े हमला किया। उसने 14 लोगों को लाइन में खड़ा कर गोलियों से भून दिया, जिसमें बच्चे, बूढ़े और जवान सभी शामिल थे। यही नहीं, उसने अपने साथियों से दो लोगों की आंखें भी निकलवा लीं और शवों के चारों ओर घूम-घूमकर ठहाके लगाए। जाते-जाते गांव में आग भी लगा दी, जिससे चारों ओर मातम पसर गया।
गांववालों की 41 साल पुरानी टीस अब हुई शांत
कुसुमा नाइन की मौत की खबर सुनते ही गांववालों में खुशी की लहर दौड़ गई। लोगों का कहना है कि 41 साल से वह इस दिन का इंतजार कर रहे थे। गांव की बुजुर्ग महिला रामकुमारी, जिनके पति बांकेलाल और ससुर रामेश्वर इस नरसंहार का शिकार हुए थे, आज भगवान का धन्यवाद कर रही हैं। उन्होंने कहा,
“उस समय मेरी शादी को सिर्फ 12 साल हुए थे, और कुसुमा ने मुझे विधवा बना दिया। उस दिन से मैं हर रोज उसकी मौत की दुआ कर रही थी। आखिरकार, भगवान ने मेरी सुन ली।”
धोखे से बुलाकर मारी थी गोली
गांव की ही एक अन्य महिला सोमवती ने बताया कि कुसुमा नाइन ने धोखे से लोगों को इकट्ठा किया। उसने गांववालों को समझौते का झांसा दिया और फिर एक-एक करके सभी को मौत के घाट उतार दिया। सोमवती ने कहा,
“इस नरसंहार में मेरे पिता, ताऊ और चाचा मारे गए थे। तब से मैं रोज भगवान से प्रार्थना करती थी कि कुसुमा को गंदी मौत मिले। आखिरकार, वह तिल-तिल कर मरी।”
गांव में जले घी के दीये, खुशी से झूमे लोग
कुसुमा नाइन की मौत टीबी की बीमारी की वजह से पीजीआई अस्पताल में हुई। जैसे ही यह खबर गांव में पहुंची, लोगों ने खुशी से झूमकर घी के दीये जलाए। गांववालों ने इसे ईश्वर का न्याय बताया और कहा कि अब जाकर उनकी आत्मा को शांति मिलेगी।
कुसुमा नाइन के अपराधों की यादें आज भी इस गांव के लोगों के दिलों में ताजा हैं। चार दशकों तक लोग इस घाव को लिए बैठे थे, लेकिन अब कुसुमा की मौत से उन्हें इंसाफ मिलने का एहसास हुआ है। इस खुशी को गांववालों ने दीयों की रोशनी से मनाया, जो यह साबित करता है कि अपराध और अन्याय का अंत निश्चित है।
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Author: samachardarpan24
जिद है दुनिया जीतने की