लखनऊ

कभी “अजगर” तो अब “मजगर”… छोटे सियासी दल वाले बिगाड़ सकते हैं सियासत के दांव… पढिए पूरी खबर

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आत्माराम त्रिपाठी की रिपोर्ट

लखनऊ: 18वीं लोकसभा के लिए चुनाव की बिसात पूरे देश में बिछ चुकी है। यूपी की बात करें तो यहां बड़े दलों की सियासत में छोटे दलों का अहम रोल होता रहा है।

अपने मजबूत वोट बैंक के बल पर वह चुनावी शह और मात के खेल के उस्ताद माने जाते हैं। भाजपा के नेतृत्व में एनडीए जहां छोटे दलों के साथ नरेंद्र मोदी को तीसरी बार प्रधानमंत्री बनाने की कवायद में जुटी है तो कांग्रेस और सपा के नेतृत्व में I.N.D.I.A. भी छोटे दलों को साध एनडीए को मात देना चाहता है जबकि, कुछ छोटे दल आपसी गठबंधन की तैयारी में हैं तो कुछ अकेले ही मैदान में उतारने को ताल ठोक रहे हैं।

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कभी ‘अजगर’ (अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत) और फिर ‘मजगर’ (मुस्लिम, जाट, गुर्जर और राजपूत) समीकरण के तहत पश्चिमी यूपी में धाक जमाने वाली रालोद वर्तमान में जाटों की पार्टी मानी जाती है। 

बागपत, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, कैराना, नगीना, गाजियाबाद, मेरठ, नोएडा, अलीगढ़, आगरा, मथुरा और बुलंदशहर लोकसभा सीटों पर रालोद का मजबूत वोट बैंक माना जाता है। 

पिछले दो लोकसभा सभाओं के चुनावों में रालोद का खाता भी नहीं खुला था। लेकिन 16वीं लोकसभा के अंतिम दौर में कैराना लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में रालोद प्रत्याशी तबस्सुम हसन सपा के सहयोग से जीती थी। 

वर्तमान में रालोद एनडीए के साथ है। नए गठबंधन के तहत रालोद को आगामी लोकसभा चुनावों में बागपत और बिजनौर की सीटें भी मिली हैं।

अपना दल (सोनेलाल) गैर यादव पिछड़ा वर्ग की कई जातियों की राजनीति करता है। कुर्मियों में अपना दल एस की संयोजक अनुप्रिया पटेल की मजबूत पकड़ मानी जाती है। इस वोट बैंक के जरिए अपना दल(एस) का मीरजापुर, सोनभद्र और उसके आस-पास की कई लोकसभा सीटों पर दबदबा है। 

यूपी में पार्टी एनडीए सरकार का प्रमुख घटक है। पार्टी की संयोजक अनुप्रिया पटेल केंद्रीय मंत्री हैं। उनके पति आशीष सिंह पटेल यूपी सरकार में मंत्री हैं। 

एनडीए के गठबंधन में अपना दल एस 2014 और 2019 में दो-दो लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा और जीता है। हालांकि, इस बार अभी तक अपना दल एस की सीटें घोषित नहीं हुई हैं। लेकिन, माना जा रहा है कि भाजपा उन्हें दो ही सीटें देने की तैयारी में हैं।

अपना दल (के) : औवैसी का मिला साथ

कृष्णा पटेल के नेतृत्व वाले अपना दल (कमेरावादी) भी अपना दल से टूट कर अलग हुआ एक हिस्सा है। अपना दल (क) का कौशांबी, इलाहाबाद, प्रयागराज, प्रतापगढ़ क्षेत्रों की सीटों पर असर माना जाता है। विधानसभा चुनाव में अपना दल (क) सपा के साथ था। लेकिन, यह साथ अब टूट चुका है। 

अपना दल (क) ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के साथ गठवंधन किया है।

सुभासपा: एक बार फिर एनडीए के साथ

सुभासपा (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) के मुखिया और अति पिछड़ों की राजनीति करने वाले ओम प्रकाश राजभर पूर्वांचल की गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़, लालगंज, संत कबीर नगर, अंबेडकर नगर, जौनपुर, घोसी, चंदौली और मछलीशहर सीटों पर असर डालने की स्थिति में हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ मिल कर लड़ी सुभासपा ने छह सीटें जीती थी। लेकिन, चुनाव के तुरंत बाद राजभर ने सपा का साथ छोड़ दिया और एक बार फिर एनडीए के साथ आ गए। 

एनडीए में शामिल होने के साथ ही राजभर को योगी मंत्रिमंडल में जगह मिली और लोकसभा चुनाव में भी एनडीए ने सुभासपा को घोसी लोकसभा सीट दी है।

निषाद पार्टी : कमल के निशान पर अपना चेहरा

घाघरा के किनारों से लेकर गंगा और यमुना के कछार तक की करीब तीन दर्जन लोकसभा सीटों पर निषाद और उससे जुड़ी हुई जातियों का वोटबैंक नतीजों की दिशा तय करने में सक्षम है।।

गोरखपुर, बांसगांव, चंदौली, मीरजापुर, भदोही, इलाहाबाद, जालौन, बांदा, फैजाबाद, संतकबीर नगर जैसी सीटों पर इनकी संख्या प्रभावी है। 

इन वोटों की राजनीति करने वाली निषाद पार्टी एनडीए का हिस्सा है। 2019 की तरह भाजपा ने निषाद पार्टी के नेता प्रवीण निषाद संतकबीर नगर सीट से भाजपा के सिंबल पर उतारा है। हालांकि, निषाद पार्टी की अपेक्षा अधिक की थी।

प्रदेश के अन्य छोटे दल भी किसी न किसी के साथ चुनावी गठजोड़ की कवायद में जुटे हैं। प्रतापगढ़, कौशांबी में असर रखने वाले रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया को भाजपा का करीब माना जाता है। लेकिन, अभी तक उनकी पार्टी जनसत्ता दल लोकतांत्रिक ने चुनाव को लेकर अपने पत्ते नहीं खोले हैं। 

रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए) यूपी में गठबंधन के तहत टिकट न मिलने से चुनाव में एनडीए प्रत्याशियों का समर्थन करेगी। स्वामी प्रसाद मौर्य ने भी अपनी नवगठित पार्टी के बैनर तले अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। 

आजाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर भी नगीना से चुनाव लड़ रहे हैं। महान दल ने बसपा के समर्थन का ऐलान किया है तो जनवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय चौहान ने सपा प्रमुख पर वादा न निभाने का आरोप लगाते हुए पिछले दिनों अपने बल पर 11 लोकसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया है।

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"कलम हमेशा लिखती हैं इतिहास क्रांति के नारों का, कलमकार की कलम ख़रीदे सत्ता की औकात नहीं.."

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