अपराध

पद, प्रतिष्ठा और पैसे के चलते जब दो डाक्टरों की हुई निर्मम हत्या तो दहल उठा इलाका.. पढ़िए खतरनाक मौत की खौफनाक कहानी 

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कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट

लखनऊ। 23 साल पहले वर्ष 2000 में उत्‍तर प्रदेश के डीजी हेल्‍थ डॉ बच्‍ची लाल और निदेशक नर्सिंंगके पद पर तैनात रहे डॉ राधेश्‍याम शर्मा की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्‍या कर दी गई थी। लगातार महकमे के दो बड़े डॉक्‍टर की हत्‍या होने से अफसरों और कर्मचारियों में हड़कंप मच गया था।

वह रविवार की सुबह थी। स्थान था हजरतगंज का पॉश इलाका गोखले मार्ग। सुबह के छह बजे सड़क पर सिर्फ मॉर्निंग वॉकर्स थे। एक शख्स तेज कदमों से बटलर पैलेस कॉलोनी की तरफ बढ़ रहा था। तभी पीछे से आई बाइक की पिछली सीट पर बैठे युवक ने पिस्टल निकालकर पूरी मैगजीन उस शख्स पर खाली कर दी। इसके बाद बाइक सवार अशोक मार्ग की तरफ भाग निकले हैं। हमलावरों के भागने के बाद कुछ लोग हिम्मत कर खून से लथपथ पड़े शख्स के पास पहुंचे। गोलियों की आवाज सुनकर चंद कदमों की दूरी पर स्थित सुलतानगंज चौकी के पुलिसकर्मी मौके पर पहुंचे। इसी बीच वहां से निकल रहे वरिष्ठ पत्रकार (जो स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्टिंग करते थे) बृजेश सिंह ने मृतक की पहचान डीजी हेल्थ यानी स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. बच्ची लाल के रूप में की।

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कोई रंजिश सामने नहीं आई

23 जुलाई 2000 को तत्काल सुलतानगंज पुलिस चौकी से घटना की जानकारी हजरतगंज थाने के साथ उच्चाधिकारियों को दी गई। कुछ ही देर में इंस्पेक्टर हजरतगंज से लेकर डीआईजी रेंज तक मौके पर पहुंच गए। प्राथमिक छानबीन के बाद पुलिस ने शव को परीक्षण के लिए भेजा और कुछ दूर स्थित पान और चाय की गुमटी वालों से पूछताछ शुरू की। हालांकि पुलिस को सिर्फ यहीं जानकारी मिली की हमलावर बाइक सवार दो युवक थे। घरवालों से पूछताछ में भी पुलिस को डॉ. बच्चीलाल की किसी से रंजिश का पता नहीं चला।

विभाग पर केंद्रित हुई जांच

किसी रंजिश की जानकारी नहीं मिलने पर पुलिस का ध्यान स्वास्थ्य भवन पर केंद्रित हुआ। स्वास्थ्य भवन में ही विभाग के सबसे बड़े अफसर यानी डीजी हेल्थ का ऑफिस है। पुलिस ने कई दिनों तक टेंडर, पेमेंट और तबादलों से जुड़े अनुभागों में छानबीन की, लेकिन कोई खास जानकारी हाथ नहीं लगी। इस मामले में जेल में बंद धनंजय सिंह सहित कई माफिया के नाम आए। पुलिस ने जेल में धनंजय से भी लंबी पूछताछ की। रिटायर्ड आईपीएस राजेश पाण्डेय बताते हैं कि पूछताछ के बाद यह तो पक्का हो गया कि हत्या में कहीं न कहीं धनंजय का हाथ है। लेकिन, पुलिस के पास न तो हत्या का मोटिव था और न ही घटना को अंजाम देने वाले हमलावर। इसी तरह करीब पांच महीने बीत गए, हत्याकांड में पुलिस की तफ्तीश किसी नतीजे तक नहीं पहुंच पा रही थी।

स्वास्थ्य निदेशक डॉ. शर्मा की हत्या

स्वास्थ्य विभाग में निदेशक नर्सिंग के पद पर तैनात डॉ. राधे श्याम शर्मा लखनऊ के ही निशातगंज में रहते थे। रोज की तरह 25 दिसंबर 2000 की शाम दफ्तर से लौटने के बाद डॉ. शर्मा घर में बने क्लीनिक में बैठे थे। इसी दौरान मरीज बनकर पहुंचे दो युवक डॉ. शर्मा को गोली मारकर फरार हो गए। डॉ. शर्मा को आनन-फानन में मेडिकल कॉलेज पहुंचाया गया। इलाज के कुछ देर बाद ही उनकी मौत हो गई। पुलिस अब तक डॉ. बच्ची लाल की हत्या का पर्दाफाश नहीं कर पाई थी कि लखनऊ में दूसरे बड़े डॉक्टर की हत्या हो गई। पूछताछ के दौरान डॉ. शर्मा की पत्नी ने पुलिस को बताया कि 31 दिसंबर को वे सेवानिवृत्त होने वाले थे। हालांकि कुछ देर पहले ही उन्हें सेवा विस्तार मिलने की जानकारी मिली थी। इससे डॉ. शर्मा काफी खुश थे। साथियों संग खुशी बांट ही रहे थे कि घटना हो गई।

नर्सों की भर्ती से मिला क्लू

परिवार वालों से पूछताछ में डॉ. शर्मा की भी किसी से कोई रंजिश होने का पता नहीं चला। ऐसे में पुलिस ने एक बार फिर स्वास्थ्य भवन में डेरा जमाया। काफी छानबीन के बाद पुलिस को एक महत्वपूर्ण जानकारी हाथ लगी। रिटायर्ड आईपीएस राजेश पाण्डेय बताते हैं कि छानबीन में पता चला कि हाल ही में यूपी में छह सौ नर्सों की भर्ती हुई थी, जिनकी ट्रेनिंग चल रही है। इसके बाद विभाग में सख्ती से पूछताछ में खुलासा हुआ कि भर्तियों में बड़े पैमाने पर पैसों का लेनदेन हुआ था। यह भी पता चला कि पैसे को बंटवारे को लेकर तत्कालीन डीजी हेल्थ डॉ. एचसी वैश्य और डॉ. शर्मा में तनाव था। दरअसल भर्तियों में हुए खेल से काफी रकम आई थी, जिसे डॉ. शर्मा दबा गए थे।

पत्नी ने भी किया खुलासा

डॉ. शर्मा की पत्नी रीता शर्मा ने पुलिस की पूछताछ में जानकारी दी कि घटना के कुछ दिन पहले एक पार्टी में डॉ. वैश्य ने उनके पति को धमकी देते हुए कहा था कि ज्यादा न उछलो, नहीं तो औंधे मुंह पड़े मिलोगे जैसे बच्ची लाल मिले थे। यह भी जानकारी पुलिस को मिली कि जब गोली लगने के बाद डॉ. शर्मा को मेडिकल कॉलेज में भर्ती करवाया गया तो डॉ. एचसी वैश्य भी उन्हें देखने गए थे। अस्पताल में भी उन्होंने डॉ. शर्मा से कुछ कहते हुए धमकाने की कोशिश की थी। हालांकि डॉ. शर्मा के परिवार के विरोध पर चले गए थे। साथ ही यह भी पता चला कि डॉ. बच्चीलाल की हत्या के पीछे की वजह उनका पद खाली करवाना था। हत्या के बाद डॉ. एचसी वैश्य को डीजी हेल्थ का पद मिला था। पुलिस को भर्ती में पैसे के लेनदेन के भी साक्ष्य मिले और एक-एक कड़ी जोड़ते हुए डॉ. बच्ची लाल और डॉ. राधेश्याम शर्मा हत्याकांड में महानिदेशक स्वास्थ्य डॉ. एचसी वैश्य और धनंजय सिंह को आरोपी बनाया। डॉ. वैश्य को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेजा, जबकि धनंजय सिंह पहले से ही जेल में था। पुलिस तफ्तीश में हमलावरों के रूप से शूटर राकेश शर्मा और बउवा तिवारी का नाम सामने आया। हालांकि दोनों पुलिस मुठभेड़ में मारे गए। उधर, लंबी सुनवाई के बाद साक्ष्यों के अभाव में कोर्ट ने डॉ. एचसी वैश्य और धनंजय सिंह को दोनों मामलों से बरी कर दिया।

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"कलम हमेशा लिखती हैं इतिहास क्रांति के नारों का, कलमकार की कलम ख़रीदे सत्ता की औकात नहीं.."

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