संजय कुमार वर्मा की रिपोर्ट
लगभग पच्चीस साल पहले का पूर्वांचल। शाम होते ही गोरखपुर की सड़कों पर भीड़ तो रहती थी, मगर शहर के डॉक्टरों के चेहरे कुछ और ही कहानी कहते थे। मोबाइल फोन अभी सबके हाथ में नहीं आए थे, पीसीओ बूथों पर कतारें लगती थीं, लेकिन एक वर्ग ऐसा भी था जो अनजान नंबर से आती घंटी सुनते ही सिहर उठता—डॉक्टर। वजह थी एक नाम, जिसके बारे में फुसफुसाकर बात होती थी: अमित मोहन वर्मा।
कहा जाता है कि 1998 में कुख्यात गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला के एनकाउंटर के बाद पूर्वांचल के माफिया जगत में जो पावर वैक्यूम पैदा हुआ, उसने इलाके को नए तरह के अपराधियों के लिए खोल दिया। राजनीतिक संरक्षण पाने की होड़ में नए-नए ‘स्थानीय डॉन’ उभरने लगे। गोरखपुर में इस खाली जगह को भरने वालों में सबसे ख़ौफनाक नामों में एक था — अमित मोहन वर्मा, जिसके साथ अक्सर एक और नाम जुड़कर आता है: रामायण उपाध्याय।
पूर्वांचल का बदला माफिया-मानचित्र
1990 के दशक में पूर्वांचल की पहचान बड़े गैंगवार, गैंगस्टर से राजनेता बने चेहरों और पुलिस-माफिया गठजोड़ की कहानियों से बन चुकी थी। गोरखपुर, देवरिया, गाजियाबाद से लेकर लखनऊ तक फैले तंत्र में श्रीप्रकाश शुक्ला जैसे नाम सत्ता और आतंक दोनों का प्रतीक थे। उनकी हत्या और बाद में एसटीएफ के अभियान ने बड़े गिरोहों की कमर तोड़ी, लेकिन माफिया-संस्कृति ख़त्म नहीं हुई।
यही वह दौर था जब अपराध का चरित्र बदला। अब फोकस बड़े राजनीतिक ‘कॉन्ट्रैक्ट किलिंग’ से हटकर स्थानीय, संगठित रंगदारी की ओर आया। बिल्डर, ट्रांसपोर्टर, कारोबारी—और फिर डॉक्टर। पुलिस की नज़र बड़े नामों पर थी, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह थी कि छोटे-छोटे गिरोह उन लोगों पर टूट पड़े, जिनके पास पैसा था—पर सुरक्षा और राजनीतिक पहुँच नहीं।
‘डॉक्टर सिर्फ इलाज़ नहीं, एटीएम हैं’ – अपराध की नई सोच
गोरखपुर के स्थानीय अखबारों और वरिष्ठ पत्रकारों की रिपोर्टिंग बताती है कि डॉक्टरों से संगठित रंगदारी वसूली का सिलसिला अमित मोहन वर्मा और उसके साथी रामायण उपाध्याय ने शुरू किया।
डॉक्टर क्यों?
- निजी क्लिनिक और नर्सिंग होम में हर दिन नकद लेन-देन होता था।
- डॉक्टर राजनीति से दूर, सीधे-सादे और इज्ज़तदार पेशे से जुड़े माने जाते — मुकदमे और संघर्षों से दूर रहना पसंद करते।
- डॉक्टर पर हमला या धमकी से शहर में तत्काल दहशत फैलती — और गिरोह की ‘ब्रांड वैल्यू’ चरम पर पहुँचती।
यही सोच लेकर अमित मोहन ने अपना नेटवर्क खड़ा किया। कहा जाता है कि गोरखपुर के दर्जनों डॉक्टरों को कॉल कर “इतना पैसा दे दो, वरना…” जैसी धमकियाँ दी गईं।
अनजान नंबर से आती घंटी… और कांपते हाथ
उस दौर में पीसीओ से आने वाली कॉलें डॉक्टरों में दहशत का कारण बन चुकी थीं। क्लिनिकों में रिसेप्शन पर आदेश था —
“अनजान नंबर या संदिग्ध कॉल सीधे डॉक्टर तक मत जोड़ो।”
कई डॉक्टर शाम के बाद ओपीडी बंद रखने लगे। कुछ ने निजी प्रैक्टिस ही रोक दी। शहर में एक असहनीय ख़ामोशी और तनाव फैल चुका था।
डॉ. जे.पी. सिंह की हत्या – भय का चरम बिंदु
कथित रंगदारी से इनकार करने पर 2004 में सुप्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. जे.पी. सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह हत्या संदेश थी —
“जो नहीं मानेगा, उसके साथ यही होगा।”
भय तब और बढ़ गया जब डॉ. सिंह के अंतिम संस्कार के दौरान ही अमित मोहन ने दो अन्य डॉक्टरों को कॉल कर धमकी दी — “अगर पैसे नहीं दिए तो तुम्हारी शवयात्रा भी इसी तरह निकलेगी।”
नार्मल मैदान का एनकाउंटर – जब दहशत का अंत हुआ
एसएसपी बी.बी. बक्शी से डॉक्टरों की सीधी शिकायत के बाद पुलिस सक्रिय हुई। कई दिनों की घेराबंदी के बाद नार्मल मैदान में एनकाउंटर हुआ और अमित मोहन वर्मा तथा रामायण उपाध्याय मारे गए।
उसके बाद डॉक्टरों का भय धीरे-धीरे कम हुआ और शहर को राहत मिली — भले ही यह बहस आज भी जारी है कि एनकाउंटर कितना न्यायिक था।
डॉक्टर ‘सॉफ्ट टारगेट’ क्यों बने रहे?
- स्वास्थ्य सेवा अब भी नकद आधारित — अपराधियों के लिए आसान कमाई।
- डॉक्टरों में सामूहिक सुरक्षा लॉबिंग या संगठनात्मक ताकत की कमी।
- ‘सेवा’ की छवि के कारण खुलकर सुरक्षा मांगने पर आलोचना की आशंका।
- अतीत की दहशत नए अपराधियों के लिए भी “वैलिडेशन टूल”।
क्या बदला, क्या नहीं?
मोबाइल, कॉल डीटेल रिकॉर्ड और CCTV ने अपराध रोकथाम को मजबूत किया है, लेकिन डॉक्टरों पर हमले की खबर आज भी मेडिकल जगत में भय ला देती है।
भय की विरासत और व्यवस्था की जिम्मेदारी
पूर्वांचल के डॉक्टरों ने इलाज़ से पहले अपनी सुरक्षा के लिए संघर्ष किया है। सवाल आज भी वही है —
“क्या व्यवस्था इतनी मजबूत हो चुकी है कि किसी नए अमित मोहन को जन्म लेने से रोक सके?”
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गोरखपुर के डॉक्टर सबसे पहले किस वजह से निशाना बने?
क्योंकि निजी क्लिनिकों में नकद लेनदेन होता था और डॉक्टर मुकदमे या टकराव से बचना चाहते थे — अपराधियों के लिए यह आसान और सुरक्षित वसूली था।
क्या सिर्फ रंगदारी खत्म होने से समस्या पूरी तरह समाप्त हो गई?
नहीं। संगठित अपराध अस्थायी रूप से कम हुआ, लेकिन वर्षों बाद नए गैंग फिर रंगदारी के लिए डॉक्टरों को निशाना बनाते दिखे।
क्या आज डॉक्टर सुरक्षित हैं?
तकनीकी निगरानी और पुलिस तंत्र मजबूत हुए हैं, लेकिन डॉक्टरों पर हमला अभी भी संवेदनशील और हाई-रिस्क श्रेणी की घटना मानी जाती है।
अमित मोहन वर्मा का दौर आज भी क्यों याद किया जाता है?
क्योंकि पहली बार डॉक्टरों को संगठित रूप से माफिया ने टारगेट किया था — और उसकी दहशत पूरे पूर्वांचल की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन गई।









