कठुआ : कश्मीर की वादियों में बसता आत्मा का लोक

✍️ लेखक — अनिल अनूप

1990 के होली का समय। मैं दिल्ली से अपने निजी काम से जम्मू गया था। जम्मू के पीर मिठ्ठा स्थित पहलवान मिठाई की दुकान से कार से कठुआ का यह सफर शुरू किया गया था।
गुझिया की सुगंध हवा में थी और दुकान के बाहर होली के रंगों की हल्की-हल्की आहटें, लेकिन मेरे भीतर एक अलग तरह की यात्रा का रंग भर रहा था—एक ऐसे स्थान की ओर जिसका नाम दिल में बरसों से सुन रखा था, पर आत्मा ने कभी करीब से महसूस नहीं किया था—कठुआ।

कार जैसे ही जम्मू की व्यस्त सड़कों से निकलकर पहाड़ी इलाकों की गोद में प्रवेश करती गई, आसपास की दुनिया बदलती चली गई। शहरों की आवाज़ों की जगह पक्षियों की पुकार ने ले ली, भीड़ की बेचैनी के बदले हवा की ठंडी थपकियाँ महसूस होने लगीं। लगता था जैसे प्रकृति धीरे-धीरे मुस्कुरा कर कह रही हो — “अब तुम मेरे घर में हो… दिल खोलकर अंदर आओ।”

पहाड़ों से पहली दोस्ती

कठुआ की सीमा का पहला दृश्य मेरे लिए अविस्मरणीय है। दूर तक फैली पहाड़ियाँ, चीड़ और देवदार की कतारें, और आसमान की ओर उठती वादियाँ — सब कुछ इतना आत्मीय कि यह यात्रा किसी भूगोल की नहीं, किसी हृदय की लगने लगी। कार की खिड़की से टकराती हवा अचानक बोल पड़ी — “सत श्री अकाल मेहमानां, कठुआ च तुम्हारा स्वागत ऐ!”

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लोग — कठुआ का असली रंग

सबसे पहले मुलाक़ात हुई एक ग्रामीण किसान, गोपाल सिंह से। पगड़ी बाँधे, चेहरे पर परिश्रम और दयालुता दोनों का तेज। उन्होंने मुस्कुराकर कहा —
“बाबूजी, कठुआ जित्थे धरती दा नां ऐ, उत्थे प्यार दा वी नां ऐ… इथे आदमी बदल सकदा ऐ, पर दिल नी बदलदे।”

दोपहर में एक बुज़ुर्ग दादी अम्मा चूल्हे के पास बैठी मिलीं। मैं पास जाकर नमस्ते किया तो फिर वही अपनापन —
“पुत्तर, चाय पीओ। पहाड़ दी थकावट मिट्टी दी खुशबू नाल उतरेगी।”

गाँव — जहाँ जीवन थका नहीं, सधा हुआ है

कठुआ के गाँवों में सुबहें किसी प्रार्थना की तरह खुलती हैं। पहाड़ी सूरज पहले घरों की छतों पर चमकता है, फिर खेतों पर और फिर दिल पर। औरतें खेतों में जाते हुए लोकगीतों की धुन गाती हैं —
“छल्ली ते पुट्टा घिना नी पराली दी, चन्न वे साडा, कदे मुड़ के वी आ ली…!”

कठुआ ने मुझे यह सिखाया — धरती अगर प्रेम से जोती जाए तो फसल भी प्रेम की होती है।

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संस्कृति — जहाँ हर परंपरा सांस लेती है

कठुआ का सांस्कृतिक ताना-बाना एक जीवित कविता जैसा है — बासो नृत्य, भोली माता का मेला, हेराथ पर्व की रौनक, विवाह पर बजते ढोल-नगाड़े — सब समय की धारा में भी अक्षुण्ण हैं। एक बुजुर्ग की बात अब भी कानों में गूंजती है — “पुत्तर, इथे शादी दे नाल दो तन नी, दो रूहां दा मेल हुंदा ऐ।”

खान-पान — सादगी में स्वाद और आत्मीयता

राजमा-चावल, सरसों का साग, मकई की रोटी, कलाड़ी, और ठंड में देसी घी के साथ गुड़ — यह भोजन नहीं, घर जैसा भरोसा देता है। कठुआ में थाली में स्वाद से पहले प्रेम परोसा जाता है।

प्रकृति — वह शांति जो शब्दों से परे है

कठुआ की शामें जलरंग चित्र सी लगती हैं। ढलता सूरज जब पहाड़ियों पर बैंगनी परतें छोड़ता है, हवा ठंडी होती है और जलधाराओं की आवाज़ गूंजती है — तब लगता है जैसे समय स्वयं ठहर गया हो। एक युवक रहमत ने कहा — “भैया, कठुआ च चुप्पी वी बोलदी ऐ — जिहड़े सुन्ने जाणदे ने, ओहाही सुनदे ने।”

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धर्म — दीवार नहीं, पुल

कठुआ में धर्म विभाजन नहीं करता — जोड़ता है। मंदिर की आरती, दरगाह की दुआ और गुरुद्वारे की शबद-कीर्तन — सब एक ही मिट्टी में फूले हैं। पंडित जी की बात कभी नहीं भूलूंगा —
“इथे धर्म दा मतलब ईश्वर नाल जुणा ऐ, इंसानां नू वखरा करना नी।”

वापसी — पर दिल यहीं रह गया

जब लौटा तो बच्चे दौड़कर बोले — “भैया, फिर आना… इथे मज़ा तां हुंदा ही हुंदा ऐ।”
दादी अम्मा ने कहा — “पुत्तर, जड़ां थांई रुख मोड़ लेण — कदे वी आ जाई।”
कार आगे बढ़ती रही, पर मेरा मन वहीं रह गया — क्योंकि कठुआ केवल देखा नहीं गया… महसूस किया गया।

कठुआ ने सिखाया कि सुंदरता प्रकृति में जितनी है, उतनी ही लोगों, भाषा, विश्वास, संस्कृति और प्रेम में भी होती है।
धरती चाहे बदल जाए — सभ्यताएँ तब तक जीवित रहती हैं जब तक उनमें अपनापन बचा है।
कठुआ ने प्रेम देकर विदा किया और उसी प्रेम ने मन में एक वादा गढ़ दिया — “मैं फिर आऊँगा।”

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