राजनीति

पश्चिम यूपी से पूर्वांचल और अवध से बुंदेलखंड तक इन जातियोें का है गजब दबदबा

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट

लखनऊ: भारतीय राजनीति के केंद्र बिंदु कहे जाने वाले राज्य ‘उत्तर प्रदेश’ के बिना सत्ता का रास्ता संभव नहीं है। ये कहना भी गलत नहीं होगा जिसने यूपी जीत लिया, मान लिया जाता है कि दिल्ली में भी वहीं सरकार बनाएगा। उत्तर प्रदेश में जीत का डंका बजाने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों ने दिन रात एक कर दिए हैं। 

इस बार मौका 2024 के लोकसभा चुनाव का है। ऐसे में जातीय समीकरण, बड़े सियासी चेहरे, राजनीतिक पार्टियों की रणनीति और वोट बैंक पर चुनावी विश्लेषण करना बहुत जरुरी है। आपको सरल शब्दों में यूपी का पूरा चुनावी समीकरण समझाने की कोशिश करेंगे। 

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चार भागों में बंटी है यूपी की सियासत

लोकसभा की कुल 543 सीटों में से 80 सीट उत्तर प्रदेश की हैं। यूपी की राजनीति को समझने के लिए राजनीतिक जानकार इसे चार हिस्सों में बांटकर देखते हैं। जो इस प्रकार है- पश्चिमी यूपी, पूर्वांचल, अवध और बुंदेलखंड। इन सभी क्षेत्रों के अपने-अपने मुद्दे। अपने अपने जातीय समीकरण हैं और अपनी अपनी राजनीति भी चलती रहती है।

प्रदेश में जातिगत आंकड़े

उत्तर प्रदेश में 40 फीसदी ओबीसी वोट है, जिसमें 10 फीसदी यादव, 10 अन्‍य ओबीसी जातियां और 20 फीसदी मौर्या, शाक्‍य, लोधी, काछी, कुशवाहा जैसी जातियां शामिल हैं। 21 सामान्‍य वर्ग के वोट हैं, जिसमें 10 से 11 ब्राह्मण, चार फीसदी ठाकुर, चार फीसदी वैश्‍य व दो फीसदी अन्‍य सवर्ण जातियां हैं। इसके अलावा 20 फीसदी दलित हैं, जिसमें 11 फीसदी जाटव और 9 फीसदी अन्‍य हैं। वहीं करीब 19 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। 

पश्चिमी यूपी 

राजधानी दिल्‍ली के करीब होने की वजह से पूर्वी उत्तर प्रदेश सभी चुनाव में खास रहता है। पश्चिमी यूपी की सियासत जाट, मुस्लिम और दलित समाज के जाटव समुदाय के इर्द-गिर्द घूमती है। पश्चिमी यूपी की खासियत ये है कि यहां पर इन जातियों का बोलबाला पूरे राज्य के लिहाज से सबसे ज्यादा है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि पूरे यूपी में मुस्लिम मतदादा 20 फीसदी के करीब हैं, लेकिन बात जब अकेले पश्चिमी यूपी की आती है तो यहां ये आंकड़ा बढ़कर 32 फीसदी पहुंच जाता है। इसी तरह पूरे यूपी में जाट समाज 4 प्रतिशत के करीब बैठता है, लेकिन पश्चिमी यूपी में इनकी संख्या 17 फीसदी हो जाती है। पूरे राज्य में दलित वर्ग 21 फीसदी है, लेकिन अकेले पश्चिम में ये 26 प्रतिशत पर है, यहां भी 80 फीसदी जाटव समुदाय वाले हैं।

पूर्वांचल

यूपी का पूर्वांचल इलाका भी अपनी एक अलग सियासत लेकर आता है। इस क्षेत्र से लोकसभा की कुल 26 सीटें निकलती हैं। पूरे यूपी की ही 32 फीसदी आबादी इस पूर्वांचल में रहती है। इसे यूपी का पिछड़ा इलाका भी माना जाता है और किसानों की यहां निर्णायक भूमिका रहती है। लेकिन पिछड़े होने के बावजूद देश को पांच प्रधानमंत्री देने वाला इलाका भी ये पूर्वांचल ही है। इस क्षेत्र में राजभर, निषाद और चौहान जाति का बोलबाला रहता है। 

पूर्वांचल में वाराणसी, जौनपुर, भदोही, मिर्जापुर, गोरखपुर, कुशीनगर, सोनभद्र, कुशीनगर, देवरिया, महाराजगंज, संतकबीरनगर, बस्ती, आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर, बलिया, सिद्धार्थनगर, चंदौली, अयोध्या, गोंडा जैसे जिले आते हैं।

अवध

पूर्वांचल के बाद अगर यूपी में किसी क्षेत्र को सबसे बड़ा माना जाता है तो वो अवध है। इसे जानकार मिनी यूपी भी कहते हैं। इस क्षेत्र में किसी भी पार्टी के लिए जीत का मतलब होता है कि पूर्वांचल में भी अच्छा प्रदर्शन होने वाला है। इस क्षेत्र ब्राह्माणों की आबादी 12 फीसदी के करीब रहती है, 7 फीसदी ठाकुर और 5 फीसदी बनिया समाज भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है। ओबीसी वर्ग का 43 फीसदी हिस्सा भी अवध में रहता है, यहां भी यादव समाज 7 प्रतिशत के करीब है। कुर्मी समुदाय भी 7 फीसदी ही चल रहा है। अवध से कुल लोकसभा की 18 सीटें निकलती हैं।

बुंदेलखंड

बुंदेलखड, यूपी का वो क्षेत्र जो कई बार जल संकट की वजह से सुर्खियों में बना रहता है। बुंदेलखंड इलाके से लोकसभा की पांच सीटें निकलती हैं और ये क्षेत्र ओबीसी और दलित वोटरों की वजह से निर्णायक माना जाता है। इस क्षेत्र में सामान्य वर्ग के कुल 22 फीसदी वोट हैं। समान्य वर्ग में ब्राह्मण, ठाकुर को शामिल किया जा सकता है। वैश्य समाज के भी अच्छी तादाद में यहां लोग रहते हैं। इसके अलावा ओबीसी की अहम जातियां जैसे कि कुर्मी, निषाद, कुशवाहा भी बुलंदेलखंड में ही सक्रिय हैं। इनकी कुल आबादी 43 प्रतिशत के करीब बैठती है। बुंदेलखंड में दलित वोटर की बात करें तो वो भी 26 फीसदी के आसपास है।

यूपी की सबसे निर्णायक जातियां

उत्तर प्रदेश फतेह करने के लिए जातियों की समझ ही सबकुछ है। यहां विकास के नाम पर वोट भी तभी मिलता है, जब जातियों को सही तरह से साधा जाए। यूपी की राजनीति समझने के लिए जातियों का थोड़ा बहुत ज्ञान होना बहुत जरूरी है। बात चाहे ओबीसी की हो, मुस्लिम की हो या सवर्ण समाज को साधने की, सभी का यूपी की सियासत में अहम योगदान रहता है।

मुस्लिम– मुस्लिम समाज का वोट किस तरफ जाएगा, यूपी की जब भी बात की जाती है, इस सवाल का आना लाजिमी है। यूपी मुस्लिम जनसंख्या के लिहाज से चौथा सबसे बड़ा राज्य है। यहां पर 20 फीसदी के करीब मुस्लिम रहते हैं। सपा-बसपा और कांग्रेस के बीच में इस वोटबैंक का वोट रहता है। बीते कुछ समय में बीजेपी ने भी मुस्लिमों के एक वर्ग को अपने पाले में करने की कोशिश की है। लोकसभा के लिहाज से बात करें तो 80 में से 36 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 20 फीसदी के करीब है। इसी तरह 6 सीटें ऐसी हैं जहां ये 50 प्रतिशत से भी ज्यादा बैठते हैं। अगर मुस्लिम बहुल सीटों की बात करें तो लिस्ट में बागपत, अमेठी, अलीगढ़, गोंडा, लखीमपुर खीरी, लखनऊ, मऊ, महाराजगंज, पीलीभीत, सीतापुर शामिल हैं।

OBC– उत्तर प्रदेश में ओबीसी पॉलिटिक्स कई बार काफी कन्फ्यूजिंग हो जाती है। इसका कारण ये है कि कई छोटी उप जातियां भी ओबीसी के अंदर आती हैं और उनकी अपनी अहमियत भी है। पूरे यूपी की बात करें तो ओबीसी वर्ग 52 फीसदी के आसपास बैठता है। वहां भी जो गैर यादव वाला वोटबैंक हैं, उसकी आबादी 43 प्रतिशत है। इसके अलावा पिछले कुछ समय में यूपी में बीजेपी का एक बड़ा वोटबैंक गैर यादव वोट है। इन गैर यादव में कुर्मी, कुशवाहा, शाक्य, सैनी, लोध, निषाद, कुम्हार, जायसवाल, राजभर, गुर्जर जैसी छोटी जातियां शामिल हैं। अब ये तो गैर यादव वोटर हुए, सपा का जो कोर वोटबैंक है, उसमें यादव को सबसे पहले रखा जाता है। आठ फीसदी के करीबी उनकी आबादी है और इटावा, एटा, फर्रुखाबाद, मैनपुरी, फिरोजाबाद, कन्नौज, बदायूं, आजमगढ़, फैजाबाद जैसे कई जिलों में निर्णायक भूमिका रहती है।

ब्राह्मण– उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण समाज भी राज्य की सियासत को काफी हद तक प्रभावित करता है। इनकी आबारी जरूर 8 से 10 फीसदी के करीब रहती है, लेकिन एक दर्जन से भी ज्यादा जिले ऐसे है जहां पर इनकी आबादी 20 प्रतिशत को भी क्रॉस कर जाती है। वाराणसी, महाराजगंज, गोरखपुर, जौनपुर, अमेठी, कानपुर, प्रयागराज, संत करीब नगर कुछ ऐसे जिले हैं जहां पर हार-जीत ब्राह्मण वोट तय कर जाते हैं। बहुजन समाज पार्टी और बीजेपी का सबसे ज्यादा फोकस इस वर्ग को अपने पाले करने का रहता है। अब तो अखिलेश यादव भी इस समाज को अपनी पार्टी के साथ जोड़ने की कवायद करते दिख जाते हैं।

यूपी के सबसे बड़े सियासी चेहरे

अब उत्तर प्रदेश की राजनीति जातीय समीकरणों के आधार पर तो चलती ही है, उन्हें चलाने वाले वो सियासी चेहरे रहते हैं जनता के बीच जाते हैं, सालों की मेहनत करते हैं और तब जाकर लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचते हैं। यूपी में सीएम योगी आदित्यनाथ से लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव तक कई अहम चेहरे हैं।

योगी आदित्यनाथ– मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बीजेपी के फायरब्रैंड नेता हैं। हिंदुत्व की राजनीति कर लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचे योगी वर्तमान में देश के सबसे चर्चित सीएम भी माने जाते हैं। वे वर्तमान में गोरखपुर से विधायक हैं। बीजेपी ने उनके चेहरे के दम पर दो बार यूपी में अपनी सरकार बना ली है और लोकसभा की 80 सीटें जीतने का टारगेट रखा है।

अखिलेश यादव– सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव इस समय करहल से विधायक हैं। समाजवादी के सबसे बड़े चेहरे होने के साथ-साथ सबसे युवा सीएम का तमगा भी अखिलेश यादव को जाता है। सपा में अब जिस तरह से आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल होने लगा है, जिस तरह से सोशल मीडिया पर सक्रियता बढ़ी है, उसका क्रेडिट भी अखिलेश को जाता है।

मायावती– यूपी की सियासत को बिना मायावती के पूरा नहीं किया जा सकता। चार बार की मुख्यमंत्री मायावती राज्य में दलित समाज का सबसे बड़ा चेहरा हैं। वे कैराना से लेकर बिजनौर और हरिद्वार तक से चुनाव लड़ चुकी हैं। 2001 से लगातारा मायवती बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष भी चल रही हैं। उन्होंने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी का उत्तराधिकारी भी घोषित कर दिया है।

ओपी राजभर– सुलेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओपी राजभर वर्तमान में बीजेपी के साथ गठबंधन किए हुए हैं। पिछड़ों की सियासत करने वाले ओपी राजभर समय-समय पर दोनों बीजेपी और सपा के साथ रह चुके हैं। यूपी की सियासत में उनकी अहमियत को इसी बात से समझा जा सकता है कि पूर्वांचल की लगभग हर सीट पर उनकी एक निर्णायक भूमिका है। वर्तमान में वे यूपी के जहूराबाद से विधायक है।

जयंत चौधरी– जाटों का जब भी जिक्र किया जाता है, जयंत चौधरी के नाम का आना भी लाजिमी है। इस समय उनकी पार्टी आरएलडी जरूर राज्य में हाशिए पर आ चुकी है, लेकिन वे लगातार जमीन पर संघर्ष कर रहे हैं। पश्चिमी यूपी में पूरी तरह सक्रिय जयंत इस बार अखिलेश के साथ हैं।

इन नेताओं के अलावा यूपी में समय-समय पर संजय निषाद, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, इमरान मसूद, राजा भैया, केशव प्रसाद मौर्य, शिवपाल, अनुप्रिया पटेल, आजम खान और संजीव बालियान जैसे नेताओं का भी जिक्र होता रहता है।

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"कलम हमेशा लिखती हैं इतिहास क्रांति के नारों का, कलमकार की कलम ख़रीदे सत्ता की औकात नहीं.."

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