सर्दियों में प्रतिवर्ष तापमान में गिरावट दर्ज होती है, लेकिन दिसंबर 2025 के मध्य से उत्तर प्रदेश के विविध इलाकों में अत्यंत कड़ाके की ठंड और शीतलहर का प्रभाव इतना गंभीर हो गया कि जनजीवन स्वाभाविक रूप से अस्त-व्यस्त हो गया। तराई, पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिलों में लोगों को घने कोहरे, न्यूनतम तापमान में असामान्य गिरावट और शारीरिक असहजता का सामना करना पड़ा। इन परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव सामाजिक, आर्थिक और यातायात गतिविधियों पर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
सड़कों और चौराहों पर लोग अलाव जलाकर ठंड से राहत पाने की कोशिश करते दिखाई दिए, वहीं कई जिलों में कोहरे के कारण दृश्यता बेहद कम हो गई, जिससे सड़क दुर्घटनाओं का खतरा कई गुना बढ़ गया। यह रिपोर्ट उत्तर प्रदेश में ठंड से जुड़ी मौतों के आंकड़े, सरकारी राहत व्यवस्था, जिलेवार स्थिति, कमजोर वर्गों पर प्रभाव और प्रशासनिक तैयारियों की समग्र पड़ताल प्रस्तुत करती है।
मौतों के आंकड़े: कहां, कितनी, कब और कैसे?
उपलब्ध समाचार रिपोर्टों और स्थानीय स्रोतों के आधार पर उत्तर प्रदेश में शीतलहर और कोहरे से जुड़ी घटनाओं में अब तक 100 से अधिक मौतें होने के संकेत मिले हैं। इन मौतों में कुछ सीधे ठंड से जुड़ी स्वास्थ्य जटिलताओं के कारण हुईं, जबकि कई घटनाएं घने कोहरे की वजह से सड़क दुर्घटनाओं में सामने आईं।
राज्य स्तर पर अब तक कोई आधिकारिक, समेकित जिलेवार मृत्यु-सूची सार्वजनिक नहीं की गई है। इसलिए यहां दिए गए आंकड़े प्राथमिक समाचार रिपोर्टों, स्थानीय प्रशासन की सूचनाओं और मीडिया संकलन पर आधारित हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ठंड से उत्पन्न हृदय, श्वसन और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के कारण आने वाले दिनों में अप्रत्यक्ष मौतों की संख्या और बढ़ सकती है।
प्रमुख घटनाओं में पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर सुलतानपुर के पास कोहरे के कारण हुई भीषण टक्कर में तीन लोगों की मौत, अमेठी में छह वाहनों की भिड़ंत में दो मौतें और आगरा एक्सप्रेसवे क्षेत्र में एक मोटरसाइकिल सवार की जान जाने की घटना शामिल है। इसके अलावा विभिन्न जिलों से बुजुर्गों, गरीबों और बेघर लोगों की मौत के संकेत भी सामने आए हैं, जिनकी आधिकारिक पुष्टि अभी शेष है।
सरकारी व्यवस्थाएँ: अलाव, कंबल, रैन बसेरा और राहत प्रयास
उत्तर प्रदेश सरकार ने ठंड के प्रकोप को देखते हुए रैन बसेरों और रात्रि आश्रय स्थलों की संख्या बढ़ाने के निर्देश दिए। उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों के अनुसार राज्य भर में 1250 से अधिक रैन बसेरों को चिन्हित कर सक्रिय किया गया है, जिनमें शहरी क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई।
इन रैन बसेरों में कंबल, रजाई, अलाव, गर्म पानी, चाय और कई स्थानों पर हीटर की सुविधा उपलब्ध कराई गई। शहरी निकायों और तहसील प्रशासन के सहयोग से स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से ऊनी वस्त्रों का वितरण भी किया गया।
अलाव और कंबल वितरण की जमीनी स्थिति
शहरी स्थानीय निकायों द्वारा कई जिलों में कंबल, स्वेटर, टोपी और मफलर का वितरण किया गया। चंदौली जिले में 1080 से अधिक जरूरतमंदों को कंबल और 1500 बच्चों को ऊनी कपड़े वितरित किए जाने की पुष्टि हुई। हालांकि इसके समानांतर ग्रामीण और दूरदराज़ इलाकों से अलाव और कंबल न पहुंचने की शिकायतें भी सामने आईं, जहां ग्राम स्तर पर व्यवस्था कमजोर दिखाई दी।
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
ठंड और कोहरे के चलते कई जिलों में स्कूलों की समय-सारिणी बदली गई। सड़क और रेल यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ। स्टेशन परिसरों पर यात्री ठंड से कांपते दिखाई दिए और कई ट्रेनें देरी से चलीं।
सबसे अधिक प्रभाव गरीबों, बुजुर्गों, बेघर लोगों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों पर पड़ा। कई लोग रैन बसेरों तक पहुंचने में असमर्थ रहे। दमा, ब्रोंकाइटिस और हृदय रोग से पीड़ित मरीजों की स्थिति ठंड के कारण और जटिल हो गई।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया और आगे की चुनौती
राज्य सरकार और आपदा प्रबंधन विभाग ने अलर्ट जारी किए, राहत व्यवस्था सक्रिय की और नागरिकों से कमजोर वर्गों की मदद करने की अपील की। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में कवरेज की असमानता और वास्तविक जरूरतमंदों तक राहत न पहुंच पाने की चुनौती सामने आई।
यह ठंड केवल मौसम की घटना नहीं, बल्कि शासन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक संवेदनशीलता की एक कठिन परीक्षा बनकर उभरी है।
सवाल–जवाब
क्या उत्तर प्रदेश में ठंड से 100 से अधिक मौतें हो चुकी हैं?
उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों और स्थानीय सूचनाओं के आधार पर यह संख्या 100 के पार मानी जा रही है, हालांकि आधिकारिक समेकित सूची अभी जारी नहीं हुई है।
सरकार द्वारा कितने रैन बसेरे संचालित किए जा रहे हैं?
राज्य भर में 1250 से अधिक रैन बसेरों को सक्रिय किए जाने की जानकारी सामने आई है।
किस वजह से सबसे ज्यादा मौतें हो रही हैं?
घने कोहरे से हुई सड़क दुर्घटनाएं और ठंड से जुड़ी स्वास्थ्य जटिलताएं मौतों का प्रमुख कारण हैं।
क्या ग्रामीण इलाकों में राहत व्यवस्था कमजोर है?
कई ग्रामीण क्षेत्रों से अलाव और कंबल न पहुंचने की शिकायतें सामने आई हैं, जिससे राहत कवरेज असमान दिखता है।
