राधे राधे के जयकारों के साथ कार्तिक पूर्णिमा पर धूमधाम से लगाई गई कामवन की 36वीं सत्कोसी परिक्रमा


📰 हिमांशु मोदी की रिपोर्ट

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कामाँ (भरतपुर)। कार्तिक पूर्णिमा के पावन अवसर पर बुधवार को कामवन धाम में श्रद्धा, भक्ति और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला। राधे-राधे के जयकारों और भजन कीर्तन के बीच कामवन की सुप्रसिद्ध 36वीं सत्कोसी परिक्रमा का आयोजन अत्यंत धूमधाम से किया गया। यह परिक्रमा श्री राधाबल्लभ मंदिर से प्रातः 8 बजे शुरू हुई और शाम तक हजारों श्रद्धालुओं के साथ दिव्य यात्रा का रूप ले लिया।

सेवायत अधिकारी आशुतोष कौशिक उर्फ नूनू पंडित ने बताया कि कामवन धाम भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य क्रीड़ा स्थली और आदि वृंदावन है। उन्होंने कहा कि “हर महीने की पूर्णिमा पर परिक्रमा लगाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है, और यह प्रयास कामवन को अपने मूल वृंदावन स्वरूप में वापस लाने का है।”

🌸 कामवन सत्कोसी परिक्रमा का ऐतिहासिक महत्व

कामवन सत्कोसी परिक्रमा का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह परिक्रमा न केवल एक धार्मिक यात्रा है बल्कि भक्ति, सेवा और एकता का प्रतीक भी मानी जाती है। श्रद्धालु मानते हैं कि इस परिक्रमा को करने से जीवन के सभी दुख दूर होते हैं और भक्त को ईश्वरीय शांति प्राप्त होती है।

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हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के दिन आयोजित होने वाली यह परिक्रमा लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। इस बार की परिक्रमा में सैकड़ों की संख्या में पदयात्री शामिल हुए जिन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के नाम का संकीर्तन करते हुए सम्पूर्ण मार्ग तय किया।

🚩 परिक्रमा मार्ग और विशेष आकर्षण

यह कामवन की 36वीं सत्कोसी परिक्रमा राधाबल्लभ मंदिर से आरंभ होकर मदन मोहन जी मंदिर, बाऊजी मोहल्ला, गोविंद देव मंदिर, वृंदा रानी मंदिर, लाल दरवाजा, नगर पालिका, करतार कॉलोनी, पथवारी मंदिर, मां कालका जी मंदिर और बालाजी मंदिर से होकर गुजरी।

इसके बाद यात्रा ने तीर्थराज विमल कुण्ड, यशोदा कुण्ड, पंचवटी, सेतुबंध, रामेश्वर महादेव, चकलेश्वर महादेव, लुक लुक कुण्ड, चरण पहाड़ी, बावन भैरव, धेरेवाली चामुंडा माता, खिसलनी शिला, कलावटा मंदिर और भोजन बिहारी मंदिर की यात्रा की।

वापसी मार्ग में टायरा रोड, अनाज मंडी और कोसी चौराहा होते हुए यात्रा का समापन राधाबल्लभ मंदिर में हुआ। पूरे मार्ग पर भक्तों ने फूलों की वर्षा कर स्वागत किया और जगह-जगह प्रसाद वितरण किया गया।

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🙏 भक्ति, अनुशासन और सेवा का अद्भुत संगम

कामवन की यह परिक्रमा भक्ति के साथ-साथ अनुशासन और सेवा का भी उदाहरण है। पूरे मार्ग में श्रद्धालु जय श्री राधे और जय श्री कृष्ण के उद्घोष करते हुए आगे बढ़ते रहे। अनेक धार्मिक संगठनों और स्थानीय समितियों ने यात्रियों के लिए भोजन, पानी और विश्राम की व्यवस्था की।

कार्यक्रम में स्थानीय प्रशासन, पुलिस और स्वयंसेवक दलों ने सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने में सराहनीय योगदान दिया। इस दौरान पूरा कामवन धाम घंटा-घड़ियाल, शंखनाद और कीर्तन की गूंज से भक्तिमय बन गया।

🌺 कार्तिक पूर्णिमा और कामवन धाम की महिमा

कार्तिक पूर्णिमा का दिन हिंदू धर्म में विशेष माना जाता है। इस दिन भगवान श्री हरि विष्णु की आराधना का फल सहस्रगुना अधिक प्राप्त होता है। कामवन धाम को आदि वृंदावन कहा जाता है, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अनेक लिलाओं का प्रदर्शन किया।

इस पावन अवसर पर भक्तों ने कहा कि कामवन सत्कोसी परिक्रमा न केवल आत्मिक शांति देती है, बल्कि यह जीवन को नई दिशा और ऊर्जा प्रदान करती है। यह यात्रा भक्त को अपने आध्यात्मिक उद्देश्य से जोड़ती है।

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कामवन सत्कोसी परिक्रमा 2025 श्रद्धा, सेवा और संस्कृति का एक अद्भुत संगम रही। हजारों श्रद्धालु जब “राधे राधे” के जयकारों के साथ आगे बढ़े, तो ऐसा लगा मानो पूरा ब्रजमंडल भगवान की भक्ति में डूब गया हो।


❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

👉 कामवन सत्कोसी परिक्रमा कब लगाई जाती है?

कामवन सत्कोसी परिक्रमा हर महीने की पूर्णिमा (पूर्णमासी) के दिन आयोजित की जाती है।

👉 कामवन धाम को आदि वृंदावन क्यों कहा जाता है?

कामवन धाम को आदि वृंदावन इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह भगवान श्रीकृष्ण की प्रारंभिक क्रीड़ा स्थली मानी जाती है।

👉 कार्तिक पूर्णिमा पर परिक्रमा करने का क्या महत्व है?

कार्तिक पूर्णिमा पर परिक्रमा करने से जीवन के सभी दुःख दूर होते हैं और भक्त को ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त होता है।

👉 इस वर्ष की परिक्रमा में कितने श्रद्धालु शामिल हुए?

इस वर्ष की 36वीं कामवन सत्कोसी परिक्रमा में सैकड़ों की संख्या में पदयात्री और हजारों भक्त शामिल हुए।

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