जर्जर पुलिया ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की बदहाली का एक और गंभीर उदाहरण बनकर सामने आई है। पिछले लगभग छह महीनों से बीच से टूटी हुई यह पुलिया आज भी उसी हालत में पड़ी है, जिससे इस मार्ग से गुजरने वाले लोगों को हर पल दुर्घटना का डर बना रहता है। हैरानी की बात यह है कि लंबे समय से क्षतिग्रस्त रहने के बावजूद अब तक न तो इसकी मरम्मत कराई गई है और न ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था की गई है।
हुक पॉइंट : छह महीनों से टूटी पड़ी पुलिया प्रशासनिक अनदेखी की कहानी कह रही है, जहां खतरे के बीच लोगों की रोज़मर्रा की आवाजाही अब मजबूरी बन चुकी है।
आधा दर्जन से अधिक गांवों के लिए अहम मार्ग
यह जर्जर पुलिया जिस सड़क पर स्थित है, वह केवल एक सामान्य ग्रामीण रास्ता नहीं बल्कि आसपास के आधा दर्जन से अधिक गांवों के लिए मुख्य संपर्क मार्ग है। इसी रास्ते से ग्रामीण थाना, बाजार, चौराहा और अन्य आवश्यक स्थानों तक पहुंचते हैं। रोजमर्रा के कामकाज, दवाइयों की खरीद, सरकारी दफ्तरों तक पहुंच और सामाजिक गतिविधियों के लिए इसी मार्ग पर निर्भरता है।
स्कूली बच्चों के लिए बना सबसे बड़ा जोखिम
इस जर्जर पुलिया का सबसे बड़ा खामियाजा स्कूली बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। सैकड़ों छात्र-छात्राएं प्रतिदिन इसी रास्ते से अपने विद्यालय जाते और लौटते हैं। अभिभावकों का कहना है कि बच्चों को स्कूल भेजते समय मन में हमेशा अनहोनी की आशंका बनी रहती है। बरसात के दिनों में या अंधेरे में यह पुलिया और भी खतरनाक हो जाती है, जब टूटा हिस्सा साफ दिखाई नहीं देता।
ग्रामीणों की शिकायतें, लेकिन समाधान शून्य
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पुलिया टूटने के बाद से कई बार इसकी शिकायत की जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। मिश्रौली नवका टोला के कुंदन सिंह, राहुल यादव, पंकज सिंह, श्रीभगवान कुशवाहा और अशोक कुशवाहा ने बताया कि छह महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने मौके पर आकर स्थिति देखने तक की जरूरत नहीं समझी।
दूसरे टोले के लोगों ने भी जताई चिंता
टोला अहिवरन राय के डॉ. भागीरथी यादव, जनार्दन सिंह, सुशील सिंह, कृष्णाकांत सिंह, राजेश प्रसाद और लतीफ अंसारी ने भी पुलिया की बदहाली पर गहरी चिंता जताई। उनका कहना है कि यह पुलिया कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। खासकर रात के समय या बारिश में इस रास्ते से गुजरना बेहद जोखिम भरा हो जाता है।
दुर्घटना की आशंका, फिर भी चेतावनी का अभाव
सबसे चिंताजनक बात यह है कि पुलिया के क्षतिग्रस्त होने के बावजूद न तो यहां कोई चेतावनी बोर्ड लगाया गया है और न ही बैरिकेडिंग की गई है। ऐसे में पहली बार आने वाले राहगीरों को पुलिया की स्थिति का अंदाजा तक नहीं लग पाता। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते मरम्मत नहीं हुई, तो किसी बड़ी दुर्घटना से इंकार नहीं किया जा सकता।
प्रशासनिक लापरवाही पर उठते सवाल
जर्जर पुलिया का यह मामला ग्रामीण बुनियादी ढांचे को लेकर प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करता है। छह महीने तक किसी महत्वपूर्ण मार्ग की पुलिया का टूटा रहना यह दर्शाता है कि शिकायतों के बावजूद कार्रवाई की रफ्तार बेहद धीमी है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि यही समस्या किसी शहरी इलाके में होती, तो शायद अब तक समाधान निकल चुका होता।
ग्राम प्रधान का आश्वासन
इस संबंध में ग्राम प्रधान बिंदेश्वरी सिंह ने बताया कि पुलिया की मरम्मत के लिए ब्लॉक कार्यालय में लिखित आवेदन दिया जा चुका है। उन्होंने कहा कि जल्द ही मरम्मत कार्य शुरू कराने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें अब आश्वासन नहीं, बल्कि ज़मीनी कार्रवाई चाहिए।
कब होगा समाधान, ग्रामीणों की निगाहें टिकीं
अब सवाल यह है कि आखिर कब तक लोग इस जर्जर पुलिया से अपनी जान जोखिम में डालकर गुजरने को मजबूर रहेंगे। ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन तत्काल मरम्मत कार्य शुरू कराए या वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था करे, ताकि किसी अनहोनी से पहले समस्या का समाधान हो सके।
समाचार सार : छह महीनों से क्षतिग्रस्त पड़ी जर्जर पुलिया ग्रामीणों और स्कूली बच्चों के लिए गंभीर खतरा बनी हुई है। शिकायतों और आवेदन के बावजूद अब तक मरम्मत कार्य शुरू नहीं हो सका है, जिससे प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
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