एसआईआर और फ़ॉर्म 7 विवाद : उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची संशोधन की परीक्षा

उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान फ़ॉर्म 7 की जांच करते चुनाव कर्मी और मतदाता, दस्तावेज़ों की पड़ताल करते अधिकारी

✍️दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
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51 करोड़ मतदाता, लाखों नोटिस और सवालों में घिरी पुनरीक्षण प्रक्रिया

देश के नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया उत्तर प्रदेश में अपने अंतिम चरण में है।
लेकिन नाम जोड़ने से अधिक चर्चा नाम काटने वाले फ़ॉर्म 7 को लेकर हो रही है।
राजनीतिक आरोप, ज़मीनी शिकायतें, आयोग की सफ़ाई और आम मतदाता की बढ़ती परेशानी—
यह रिपोर्ट उसी टकराव की दस्तावेज़ी पड़ताल है।

देश के नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी प्रशासनिक कवायदों में गिनी जा रही है।
लगभग 51 करोड़ मतदाता इस प्रक्रिया के दायरे में हैं।
उद्देश्य साफ़ है—मतदाता सूची को अद्यतन, त्रुटिरहित और पारदर्शी बनाना।
लेकिन उत्तर प्रदेश में यह प्रक्रिया अब केवल प्रशासनिक अभ्यास नहीं रह गई, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक विवाद का केंद्र बन चुकी है।

एसआईआर का कानूनी ढांचा और फ़ॉर्म 6, 7, 8

मतदाता सूची से जुड़ी पूरी प्रक्रिया रिप्रेज़ेंटेशन ऑफ़ द पीपल्स एक्ट, 1950 और रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स के तहत संचालित होती है।
फ़ॉर्म 6 का उपयोग नया नाम जोड़ने के लिए, फ़ॉर्म 8 विवरण सुधार के लिए और फ़ॉर्म 7 मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए किया जाता है।
इन्हीं में फ़ॉर्म 7 सबसे अधिक विवाद का विषय बन गया है, क्योंकि यह सीधे मताधिकार से जुड़ा हुआ है।

चुनाव आयोग के अनुसार फ़ॉर्म 7 केवल तीन स्थितियों में स्वीकार्य है—मतदाता की मृत्यु, स्थायी स्थान परिवर्तन या एक ही व्यक्ति का नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज होना।
गलत जानकारी देने पर एक साल तक की सज़ा और जुर्माने का प्रावधान भी क़ानून में दर्ज है।

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विपक्ष का आरोप: योजनाबद्ध वोट कटौती

उत्तर प्रदेश में विवाद तब तेज़ हुआ जब समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि फ़ॉर्म 7 के ज़रिए पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर मुस्लिम मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है।
उनका दावा है कि पहले से तय कर लिया गया है कि किन इलाकों और किन समुदायों के वोट काटने हैं और उसी आधार पर प्रिंटेड फ़ॉर्म 7 जमा किए जा रहे हैं।

सिद्धार्थनगर: 86 फ़ॉर्म, 86 मुस्लिम नाम

सिद्धार्थनगर ज़िले के मिश्रौलिया थाना क्षेत्र से सामने आए मामले ने इस विवाद को ज़मीनी शक्ल दी।
यहां ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि 86 लोगों के नाम काटने के लिए फ़ॉर्म 7 जमा किए गए और सभी नाम मुस्लिम समुदाय से संबंधित हैं।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जिनके नाम कटने की आशंका है, वे गांव में रह रहे हैं और जीवित हैं।

स्थानीय बीएलओ ने स्वीकार किया कि फ़ॉर्म एक व्यक्ति द्वारा दिए गए थे, लेकिन वह यह स्पष्ट नहीं कर पाए कि वह व्यक्ति कौन है।
बीएलओ का यह भी कहना है कि सभी मामलों में वह अपनी रिपोर्ट में वास्तविक स्थिति दर्ज करेंगे।

गोंडा और कर्नलगंज: ऊपर से आई सूची?

गोंडा ज़िले के कर्नलगंज विधानसभा क्षेत्र से भी गंभीर आरोप सामने आए।
पूर्व मंत्री योगेश प्रताप सिंह का दावा है कि उनकी विधानसभा में छह हज़ार से अधिक वोट काटने की प्रक्रिया चल रही है।
उन्होंने ऐसे फ़ॉर्म 7 दिखाए जिनमें मतदाता का विवरण भरा था, लेकिन आवेदनकर्ता का नाम और हस्ताक्षर नहीं थे।

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इसके अलावा सभी फ़ॉर्मों में आपत्ति का कारण ‘पहले से नामांकित’ दर्शाया गया था, जिससे यह संकेत मिलता है कि मतदाता का नाम कहीं और दर्ज बताया जा रहा है।

कांग्रेस का आरोप और हस्ताक्षर विवाद

संत कबीर नगर से सामने आए एक वायरल वीडियो को लेकर कांग्रेस ने आरोप लगाया कि जिन व्यक्तियों के नाम से फ़ॉर्म 7 दाखिल किए गए, उन्होंने हस्ताक्षर करने से इनकार किया है।
कांग्रेस का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया असंवैधानिक है और वोट चोरी का नया तरीका बन चुकी है।

बीजेपी की स्थिति: बचाव भी, सवाल भी

बीजेपी ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि नाम काटने की प्रक्रिया लंबी और जांच आधारित होती है।
हालांकि पार्टी के ही एक मंत्री ने वाराणसी में हज़ारों फर्ज़ी मतदाताओं का आरोप लगाकर जांच की मांग की है, जिससे प्रक्रिया पर सवाल और गहरे हो गए।

चुनाव आयोग की सफ़ाई

राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने स्पष्ट किया है कि अभी तक किसी का नाम अंतिम रूप से नहीं काटा गया है।
हर फ़ॉर्म 7 की जांच होगी और एक राजनीतिक कार्यकर्ता एक दिन में दस से अधिक फ़ॉर्म जमा नहीं कर सकता।
यदि हस्ताक्षर फर्ज़ी पाए जाते हैं तो एफआईआर दर्ज कराने की सलाह दी गई है।

आंकड़े क्या कहते हैं?

चुनाव आयोग के अनुसार 5 फ़रवरी तक नाम जोड़ने के लिए लगभग 37.8 लाख फ़ॉर्म 6 और नाम हटाने के लिए 82 हज़ार से अधिक फ़ॉर्म 7 जमा किए गए हैं।
2003 के बाद मैपिंग न होने के कारण एक करोड़ से अधिक मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए हैं और करोड़ों मामलों में दस्तावेज़ी जांच चल रही है।

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आम मतदाता की जद्दोजहद

लखनऊ पश्चिम विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं का कहना है कि एक ही परिवार के कई सदस्यों को बार-बार नोटिस मिल रहे हैं।
2003 की मतदाता सूची देने के बावजूद उन्हें बार-बार सुनवाई के लिए बुलाया जा रहा है, जिससे रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित हो रही है।

निष्कर्ष: प्रक्रिया बनाम भरोसा

एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है, लेकिन उत्तर प्रदेश में यह प्रक्रिया अब भरोसे की कसौटी पर है।
सवाल यह नहीं कि कितने वोट जुड़ेंगे या कटेंगे, सवाल यह है कि क्या यह प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी दिख भी रही है।
अब सबकी निगाहें 10 अप्रैल पर टिकी हैं, जब अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होगी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

फ़ॉर्म 7 क्या है?

फ़ॉर्म 7 मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए उपयोग किया जाने वाला आवेदन फ़ॉर्म है।

क्या फ़ॉर्म 7 से तुरंत वोट कट जाता है?

नहीं, फ़ॉर्म 7 पर जांच, सुनवाई और सत्यापन के बाद ही कोई निर्णय लिया जाता है।

गलत जानकारी देने पर क्या सज़ा है?

गलत जानकारी देने पर एक साल तक की सज़ा और जुर्माने का प्रावधान है।

एसआईआर और फ़ॉर्म 7 विवाद पर आधारित विस्तृत दस्तावेज़ी रिपोर्ट।उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची संशोधन, नोटिस, राजनीतिक आरोप और चुनाव आयोग की स्थिति की पूरी पड़ताल।


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