कामां के स्थानीय बाजार में गुटखा और सिगरेट जैसे तंबाकू उत्पाद तय एमआरपी से अधिक दामों पर बेचे जाने के आरोप सामने आए हैं। उपभोक्ताओं का कहना है कि पुराने रेट छपे पैकेट पर मनमानी कीमत वसूली जा रही है, जिससे न केवल नियमों पर सवाल उठते हैं बल्कि प्रशासनिक निगरानी की कमी भी उजागर होती है।
कामां—स्थानीय बाजार में तंबाकू उत्पादों की बिक्री को लेकर इन दिनों असंतोष का माहौल है। गुटखा, सिगरेट और खैनी जैसे उत्पादों पर जीएसटी दरों में संभावित बढ़ोतरी की चर्चाओं के बीच उपभोक्ताओं ने आरोप लगाया है कि दुकानदार पुराने एमआरपी वाले पैकेट तय कीमत से अधिक दामों पर बेच रहे हैं। इससे आम ग्राहकों में नाराजगी है और उपभोक्ता अधिकारों को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
एमआरपी से अधिक वसूली का आरोप
ग्राहकों का कहना है कि बाजार में 5 रुपये एमआरपी वाला गुटखा 7 रुपये में, 10 रुपये की सिगरेट 12 रुपये तक में और 10 रुपये प्रिंट वाली कुबेर खैनी 15 रुपये तक में बेची जा रही है। उपभोक्ताओं के अनुसार पैकेट पर छपी अधिकतम खुदरा कीमत स्पष्ट रूप से अंकित होने के बावजूद दुकानदार मनमाने दाम वसूल रहे हैं, जो सीधे तौर पर नियमों का उल्लंघन है।
क्या कहते हैं नियम और कानून
उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत किसी भी उत्पाद की बिक्री एमआरपी से अधिक कीमत पर नहीं की जा सकती। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी उत्पाद पर टैक्स दरों में वृद्धि होती है, तो कंपनियों को नया एमआरपी निर्धारित कर पैकेट पर छापना अनिवार्य होता है। जब तक नया एमआरपी लागू न हो, तब तक पुराने रेट वाले पैकेट को उसी छपी कीमत पर बेचना कानूनी बाध्यता है।
जानकारों के अनुसार तंबाकू उत्पादों पर पहले से ही कर की दरें अधिक हैं। यदि भविष्य में जीएसटी या अन्य करों में बदलाव होता है, तो उसका असर केवल नए बैच पर ही लागू किया जा सकता है। पुराने स्टॉक को महंगे दाम पर बेचना न केवल उपभोक्ता नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह व्यापारिक नैतिकता पर भी सवाल खड़े करता है।
दुकानदारों का पक्ष
वहीं कुछ दुकानदारों का कहना है कि थोक बाजार में लागत बढ़ गई है और सप्लाई चेन में भी परेशानी आ रही है। उनका तर्क है कि वितरकों से उन्हें उत्पाद महंगे दाम पर मिल रहे हैं, जिससे मजबूरी में खुदरा कीमत बढ़ानी पड़ रही है। हालांकि, उपभोक्ता विशेषज्ञ इस दलील को स्वीकार्य नहीं मानते।
विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि लागत बढ़ने या सप्लाई की समस्या का समाधान उपभोक्ताओं से अधिक कीमत वसूल कर नहीं किया जा सकता। इसके लिए कंपनियों और वितरकों को नियमानुसार नया एमआरपी तय करना चाहिए।
प्रशासनिक निगरानी पर उठते सवाल
इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल प्रशासनिक निगरानी को लेकर उठ रहा है। स्थानीय बाजारों में नियमित जांच के अभाव में इस तरह की मनमानी को बढ़ावा मिलता है। उपभोक्ताओं का कहना है कि यदि समय-समय पर निरीक्षण हो और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई की जाए, तो ऐसी स्थिति पैदा ही न हो।
हालांकि इस संबंध में अब तक किसी भी विभाग—जैसे खाद्य एवं औषधि विभाग, वाणिज्य कर विभाग या उपभोक्ता संरक्षण कार्यालय—की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। प्रशासन की यह चुप्पी भी सवालों के घेरे में है।
जनहित का मुद्दा क्यों है यह मामला
यह मामला केवल गुटखा या सिगरेट की कीमतों तक सीमित नहीं है, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों और बाजार की पारदर्शिता से जुड़ा है। यदि आज तंबाकू उत्पादों पर एमआरपी से अधिक वसूली को नजरअंदाज किया गया, तो कल अन्य आवश्यक वस्तुओं में भी इसी तरह की मनमानी देखने को मिल सकती है।
उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई न केवल गलत प्रथाओं पर रोक लगाएगी, बल्कि बाजार में विश्वास भी कायम करेगी।
अब सवाल यह है…
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है। क्या बाजारों में जांच अभियान चलाए जाएंगे? क्या दोषी पाए जाने वाले दुकानदारों पर कार्रवाई होगी? या फिर यह मामला भी अन्य स्थानीय समस्याओं की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
क्या एमआरपी से ज्यादा कीमत वसूलना कानूनी है?
नहीं। किसी भी उत्पाद को एमआरपी से अधिक कीमत पर बेचना उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत अवैध है।
अगर टैक्स बढ़ता है तो कीमत कैसे बदलेगी?
टैक्स बढ़ने की स्थिति में कंपनियों को नया एमआरपी तय कर पैकेट पर छापना होता है। पुराने पैकेट पुराने रेट पर ही बिकेंगे।
उपभोक्ता शिकायत कहां कर सकते हैं?
उपभोक्ता जिला उपभोक्ता संरक्षण कार्यालय, टोल-फ्री हेल्पलाइन या संबंधित विभाग में शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
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