कल्कि संभल फिल्म पोस्टर विवाद

कल्कि संभल फिल्म का विवादित पोस्टर जिसमें 1978 के दंगे और 2024 जामा मस्जिद सर्वे की घटनाओं से जुड़े किरदार अब्बाजान और भाईजान दिखाए गए हैं

: 1978 के दंगों से लेकर 24 नवंबर 2024 के जामा मस्जिद सर्वे विवाद तक—एक फिल्म, दो कालखंड और समाज के भीतर छुपे कई असहज सवाल।

✍️अंजनी कुमार त्रिपाठी की रिपोर्ट
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कल्कि संभल फिल्म पोस्टर विवाद ने सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श तक एक नई बहस को जन्म दे दिया है। फिल्म निर्माता अमित जानी द्वारा अपनी आगामी फिल्म ‘कल्कि संभल’ का पोस्टर जारी किए जाने के बाद डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रतिक्रियाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। पोस्टर में दर्शाए गए किरदारों के नाम, उनकी प्रस्तुति और ऐतिहासिक संदर्भों को लेकर समर्थन और विरोध—दोनों ही स्वर तीखे रूप में सामने आए हैं। यह विवाद केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सिनेमा, समाज और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रिश्ते पर भी सवाल खड़े करने लगा है।

समाचार सार :
‘कल्कि संभल’ फिल्म का पोस्टर सामने आते ही सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई। फिल्म 1978 के संभल दंगों और 2024 की विवादित घटनाओं को जोड़ने का दावा करती है। किरदारों के नाम, कास्टिंग और कथानक को लेकर समाज दो हिस्सों में बंटा नजर आ रहा है।

पोस्टर रिलीज़ और सोशल मीडिया की पहली प्रतिक्रिया

फिल्म का पोस्टर सामने आते ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। कुछ यूजर्स ने इसे साहसिक प्रयास बताते हुए समर्थन जताया, तो वहीं कई लोगों ने इसे समाज में तनाव बढ़ाने वाला कदम करार दिया। पोस्टर में दो केंद्रीय किरदार—अब्बाजान और भाईजान—को प्रमुखता से दिखाया गया है, जिनके नाम और दृश्यात्मक प्रस्तुति को लेकर तीखी नोकझोंक देखने को मिली। ट्रेंडिंग हैशटैग्स, वायरल पोस्ट और लंबी थ्रेड्स के माध्यम से यह विषय देखते ही देखते राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया।

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1978 से 2024 तक की घटनाओं को जोड़ने का दावा

‘कल्कि संभल’ के कथानक को लेकर सामने आई जानकारी के अनुसार, फिल्म 1978 में संभल में हुए दंगों और 24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद सर्वे के दौरान हुए बवाल को एक सिनेमाई धागे में पिरोने का दावा करती है। निर्माता के अनुसार, ये दोनों घटनाएं अलग-अलग समय की जरूर हैं, लेकिन उनके सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों की कड़ियां आज भी समाज में महसूस की जा सकती हैं। यही वजह है कि फिल्म इन घटनाओं को केवल इतिहास के रूप में नहीं, बल्कि वर्तमान से जोड़कर प्रस्तुत करने की कोशिश करती है।

किरदारों की कास्टिंग और उससे जुड़ा विवाद

फिल्म में अब्बाजान के किरदार में महेश मांजरेकर और भाईजान की भूमिका में विजय राज को कास्ट किया गया है। बताया जा रहा है कि अब्बाजान का चरित्र 1978 की घटनाओं से जुड़ा होगा, जबकि भाईजान का पात्र 2024 के विवाद से संबंधित होगा। इन दोनों किरदारों की समानांतर कहानियों के जरिए फिल्म समाज में उभरे तनाव, राजनीति की भूमिका और प्रशासनिक प्रतिक्रियाओं को दर्शाने का प्रयास करेगी। हालांकि, कास्टिंग के ऐलान के साथ ही सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे कि क्या ये पात्र किसी विशेष समुदाय की छवि को प्रभावित कर सकते हैं।

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समर्थन बनाम विरोध : सोशल मीडिया की दो धाराएं

सोशल मीडिया पर इस फिल्म को लेकर दो स्पष्ट धाराएं उभरकर सामने आई हैं। एक वर्ग का मानना है कि ‘कल्कि संभल’ इतिहास के उन पन्नों को सामने लाने का प्रयास है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। वहीं, दूसरा वर्ग इसे संवेदनशील मुद्दों पर आधारित ‘उकसाने वाला कंटेंट’ मानते हुए विरोध जता रहा है। ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर लगातार पोस्ट, वीडियो और टिप्पणियों के जरिए यूजर्स अपनी-अपनी राय रख रहे हैं।

निर्माता अमित जानी का पक्ष

विवाद बढ़ने के बीच फिल्म निर्माता अमित जानी ने स्पष्ट किया है कि ‘कल्कि संभल’ का उद्देश्य किसी समुदाय को निशाना बनाना नहीं है। उनके अनुसार, फिल्म उन घटनाओं को सिनेमाई रूप में प्रस्तुत करती है, जिनका असर आज भी समाज पर महसूस किया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि 1978 के दंगों और 2024 की घटना के दौरान राजनीतिक व सामाजिक हस्तियों की भूमिका को इस तरह दिखाया जाएगा कि दर्शक स्वयं अपने निष्कर्ष तक पहुंच सकें।

सिनेमा, इतिहास और अभिव्यक्ति की आज़ादी

‘कल्कि संभल फिल्म पोस्टर विवाद’ ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सिनेमा का समाज पर कितना प्रभाव पड़ता है। क्या फिल्मों को ऐतिहासिक और संवेदनशील विषयों पर खुलकर बात करने की पूरी आज़ादी होनी चाहिए, या फिर सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए कुछ सीमाएं तय की जानी चाहिए? यह बहस नई नहीं है, लेकिन हर ऐसे विवाद के साथ और गहरी होती जाती है।

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फिल्म रिलीज़ से पहले ही बढ़ती चर्चा

फिल्म अभी रिलीज़ भी नहीं हुई है, लेकिन उससे पहले ही यह व्यापक चर्चा का विषय बन चुकी है। समर्थक इसे सामाजिक संवाद का मंच मान रहे हैं, जबकि आलोचक इसे संभावित तनाव का कारण बता रहे हैं। यही वजह है कि ‘कल्कि संभल’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक बहस बनकर उभर रही है—जिसमें इतिहास, राजनीति, समाज और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी शामिल हैं।

आगे क्या?

अब सवाल यह है कि फिल्म रिलीज़ के बाद यह विवाद किस दिशा में जाएगा। क्या यह फिल्म दर्शकों को सोचने पर मजबूर करेगी, या फिर विरोध के कारण और विवाद खड़े होंगे? फिलहाल इतना तय है कि ‘कल्कि संभल फिल्म पोस्टर विवाद’ ने सिनेमा और समाज के रिश्ते पर एक नई बहस छेड़ दी है, जो आने वाले समय में और गहराने वाली है।

कल्कि संभल फिल्म पोस्टर विवाद पर विस्तृत रिपोर्ट। 1978 के दंगे, 2024 जामा मस्जिद सर्वे, कास्टिंग, सोशल मीडिया बहस और निर्माता अमित जानी का पक्ष पढ़ें।

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