RSS के 100 वर्ष पूर्ण होने पर शाहाबाद–हरदोई क्षेत्र के रामवाटिका प्रांगण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा एक भव्य हिन्दू सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह सम्मेलन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि सनातन संस्कृति, सामाजिक एकता, पर्यावरण चेतना और राष्ट्रबोध को लेकर एक वैचारिक संगम के रूप में सामने आया। बड़ी संख्या में संघ कार्यकर्ता, मातृशक्ति, संतजन और स्थानीय नागरिक इस अवसर पर उपस्थित रहे।
RSS के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित इस हिन्दू सम्मेलन में सनातन धर्म, जल-संरक्षण, सामाजिक समरसता, पर्यावरण, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक चेतना जैसे विषयों पर वक्ताओं ने विस्तार से विचार रखे।
सनातन चेतना का मंच बना रामवाटिका प्रांगण
सम्मेलन का आयोजन रामवाटिका प्रांगण में किया गया, जहां सुबह से ही उत्साह का माहौल देखने को मिला। कार्यक्रम स्थल को सादगीपूर्ण लेकिन अर्थपूर्ण ढंग से सजाया गया था। भगवा ध्वज, राष्ट्रभक्ति से जुड़े संदेश और अनुशासित स्वयंसेवकों की उपस्थिति ने वातावरण को विशेष गरिमा प्रदान की। RSS के 100 वर्ष पूर्ण होने पर यह आयोजन संगठन की वैचारिक यात्रा और सामाजिक योगदान को स्मरण करने का अवसर भी बना।
लवली दीदी ॐ शांति का संबोधन: सनातन की रक्षा पर बल
सम्मेलन में प्रथम प्रमुख वक्ता के रूप में लवली दीदी ॐ शांति ने अपने विचार रखे। उन्होंने सनातन धर्म, देवी-देवताओं और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पूर्ण व्यवस्था है। लवली दीदी ने संघ कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वे हिन्दू समाज को उसके मूल्यों, परंपराओं और गौरवशाली इतिहास से अवगत कराएं तथा समाज को एकजुट रखने का सतत प्रयास करें।
जल ही जीवन है: सत्यनंद गिरी जी महाराज का भावपूर्ण संदेश
कात्यायनी शक्तिपीठ के महंत सत्यनंद गिरी जी महाराज ने “जल ही जीवन है” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने अत्यंत भावुक उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार मां अपने शिशु को दूध पिलाकर उसका पालन करती है, उसी प्रकार भारत माता अपने बच्चों को निर्मल जल प्रदान करती है। उन्होंने जल-संरक्षण को राष्ट्रधर्म बताते हुए कहा कि यदि हम आज जल को नहीं बचाएंगे तो आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय होगा।
सनातन की वैश्विक अवधारणा: सुधीर श्रीवास्तव
सहनगर कार्यवाह सुधीर श्रीवास्तव ने अपने विचारों में सनातन धर्म की वैश्विक अवधारणा पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि विश्व में जब भी कोई बच्चा जन्म लेता है, उसका पहला संस्कार सनातन मूल्यों से ही जुड़ा होता है, बाद में विभिन्न मत-पंथों का प्रभाव पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि हमारे देवी-देवता शस्त्र और शास्त्र दोनों से सुसज्जित हैं, लेकिन आज समाज शास्त्र को तो जानता है, शस्त्र के महत्व को भूलता जा रहा है। उनके संबोधन का समापन “जय हिन्द, जय भारत” के उद्घोष के साथ हुआ।
डॉ. भीमराव अंबेडकर, राम-रावण प्रसंग और पर्यावरण
आयोजक विशाल द्विवेदी ने अपने विस्तृत वक्तव्य में डॉ. भीमराव अंबेडकर के जीवन, संघर्ष और सामाजिक योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने श्रीराम और रावण की लीला के माध्यम से भाईचारे और धर्म की विजय का संदेश दिया। साथ ही पर्यावरण संरक्षण पर जोर देते हुए फास्ट फूड के दुष्परिणामों को रेखांकित किया। उन्होंने पाकिस्तान पर हुए सिंदूर ऑपरेशन का उल्लेख करते हुए विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों पर चिंता भी व्यक्त की।
मंच संचालन और संगठनात्मक योगदान
कार्यक्रम का कुशल मंच संचालन एडवोकेट अमितेश मिश्रा द्वारा किया गया। वहीं सतेन्द्र श्रीवास्तव ने सम्मेलन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिला प्रचारक अनिल जी, श्याम जी गुप्ता (सह नगर कार्यवाहक), शरद जी (पर्यावरण प्रमुख), रामजी वर्मा (कुटुंब प्रबोधन), सुबीन जी (वस्ती प्रमुख) सहित अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ता उपस्थित रहे। मातृशक्ति की सक्रिय भागीदारी ने कार्यक्रम को और अधिक सशक्त बनाया।
RSS के 100 वर्ष: सामाजिक समरसता की यात्रा
RSS के 100 वर्ष पूर्ण होना केवल संगठन की आयु का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह समाज निर्माण की एक सतत प्रक्रिया का प्रतीक है। इस शताब्दी यात्रा में संघ ने राष्ट्रभक्ति, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सेवा कार्यों के माध्यम से समाज में गहरी पैठ बनाई है। हिन्दू सम्मेलन इसी विचारधारा का प्रत्यक्ष उदाहरण रहा, जहां विचार, संस्कार और संगठन की त्रिवेणी देखने को मिली।
स्थानीय समाज पर सम्मेलन का प्रभाव
शाहाबाद–हरदोई क्षेत्र में आयोजित इस सम्मेलन ने स्थानीय समाज को नई वैचारिक ऊर्जा दी। युवाओं, महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों ने वक्ताओं के विचारों को गंभीरता से सुना और आत्मसात किया। कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश स्पष्ट रूप से उभरा कि सांस्कृतिक पहचान, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक एकता आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
निष्कर्ष: विचार से व्यवहार तक
RSS के 100 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित यह हिन्दू सम्मेलन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि विचार से व्यवहार तक की यात्रा का संदेश था। सनातन धर्म की रक्षा, जल और पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और राष्ट्रप्रेम—इन सभी विषयों पर मंथन करते हुए सम्मेलन ने समाज को आत्मचिंतन का अवसर दिया। ऐसे आयोजन भविष्य में भी सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।








