सतुआ बाबा—यह नाम इन दिनों माघ मेले से लेकर राजनीतिक गलियारों तक लगातार चर्चा में है। जिस उम्र में बच्चे खेल-कूद और पढ़ाई में व्यस्त रहते हैं, उसी उम्र में घर छोड़कर संन्यास की राह पकड़ने वाले संतोष तिवारी आज सतुआ बाबा के नाम से पहचाने जाते हैं। करोड़ों की संपत्ति, लग्जरी गाड़ियों का काफिला, ब्रांडेड चश्मों का शौक और सत्ता के शीर्ष केंद्रों तक पहुंच—उनकी यात्रा जितनी आध्यात्मिक कही जाती है, उतनी ही विवादों से घिरी भी है।
11 साल की उम्र में घर छोड़ा, यहीं से शुरू हुई कहानी
उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में जन्मे सतुआ बाबा का प्रारंभिक नाम संतोष तिवारी था। शोभाराम तिवारी और राजा बेटी तिवारी के चार बच्चों में सबसे छोटे संतोष का मन पारंपरिक स्कूली शिक्षा में नहीं रमा। बताया जाता है कि 11 से 13 वर्ष की आयु के बीच उन्होंने सांसारिक जीवन त्यागने का फैसला कर लिया।
उनके बड़े भाई महेश तिवारी उन्हें वाराणसी के मणिकर्णिका घाट ले गए, जहां विष्णुस्वामी संप्रदाय के प्रमुख यमुनाचार्य महाराज के मार्गदर्शन में उन्हें सतुआ आश्रम में प्रवेश मिला। यहीं से संतोष तिवारी, संतोष दास बन गए।
साधना से सत्ता तक: 2012 में बने पीठाधीश्वर
करीब 2005 में संतोष दास ने औपचारिक रूप से संन्यास ग्रहण किया। उनके गुरु यमुनाचार्य महाराज ने अपने जीवनकाल में ही उन्हें उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। 2011 में गुरु के निधन के बाद संतोष दास ने विष्णुस्वामी संप्रदाय की कमान संभाली और 2012 में वे इसके 57वें आचार्य बने।
इसी दौर में उन्हें ‘सतुआ बाबा’ की उपाधि मिली। बताया जाता है कि जब आश्रम आर्थिक संकट से गुजर रहा था, तब साधु-संतों को पोषण के लिए सत्तू पर निर्भर रहना पड़ता था। वहीं से यह नाम परंपरा में बदल गया।
लग्जरी गाड़ियां और ब्रांडेड चश्मे: सादगी पर उठे सवाल
माघ मेले के दौरान सतुआ बाबा की लोकप्रियता अचानक कई गुना बढ़ गई, जब उनके शिविर के बाहर खड़ी पोर्श 911 टर्बो (अनुमानित कीमत 4.4 करोड़ रुपये) और लैंड रोवर डिफेंडर (करीब 3 करोड़ रुपये) की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं।
भगवा वस्त्रों के साथ महंगे धूप के चश्मे, हाई-प्रोफाइल मेहमान और भव्य आश्रम—इन सबने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि क्या यह नया आध्यात्मिक युग है या धर्म और वैभव का असहज मेल?
राजनीति के गलियारों में गूंजता नाम
सतुआ बाबा की पहचान अब केवल धार्मिक मंचों तक सीमित नहीं है। योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक मंचों से उनकी प्रशंसा की है और सनातन धर्म की एकता के प्रयासों को सराहा है। महाकुंभ 2025 के दौरान उन्हें जगद्गुरु की उपाधि भी प्रदान की गई।
इसी बीच केशव प्रसाद मौर्य से जुड़ा एक कथित बयान भी चर्चा में रहा, जब माघ मेला निरीक्षण के दौरान डीएम मनीष वर्मा द्वारा सतुआ बाबा के आश्रम में रोटियां बनाने की घटना पर राजनीतिक टिप्पणी सामने आई।
50 करोड़ का आश्रम और संपत्तियों का विस्तार
बताया जाता है कि बनारस स्थित सतुआ पीठ की अनुमानित कीमत लगभग 50 करोड़ रुपये है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश और गुजरात समेत कई राज्यों में संप्रदाय से जुड़ी संपत्तियां हैं। सतुआ बाबा का कहना है कि ये सभी संपत्तियां धार्मिक और सामाजिक उद्देश्यों के लिए उपयोग में लाई जाती हैं।
सतुआ बाबा की नेटवर्थ को लेकर क्या कहते हैं आंकड़े
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सतुआ बाबा की कुल संपत्ति सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं है। हालांकि केवल लग्जरी कारों की कीमत 10 करोड़ रुपये से अधिक बताई जाती है। यदि संप्रदाय की जमीन और अन्य परिसंपत्तियों को जोड़ा जाए, तो उनकी कुल संपत्ति 15 से 30 करोड़ रुपये या उससे अधिक आंकी जा रही है।
आस्था, प्रभाव और विवाद—तीनों का संगम
सतुआ बाबा की कहानी आधुनिक भारत के उस बदलते धार्मिक परिदृश्य को दर्शाती है, जहां आस्था, राजनीति और शक्ति एक-दूसरे से अलग नहीं रह गए हैं। समर्थकों के लिए वे सनातन परंपरा के प्रतीक हैं, तो आलोचकों के लिए वैभव और साधना का यह मेल कई सवाल खड़े करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
सतुआ बाबा का असली नाम क्या है?
सतुआ बाबा का जन्म नाम संतोष तिवारी था, संन्यास लेने के बाद वे संतोष दास कहलाए।
सतुआ बाबा को जगद्गुरु की उपाधि कब मिली?
महाकुंभ 2025 के दौरान वरिष्ठ संतों और राजनीतिक नेताओं की उपस्थिति में उन्हें यह उपाधि प्रदान की गई।
क्या सतुआ बाबा की संपत्ति सार्वजनिक है?
नहीं, उनकी कुल संपत्ति सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं है, केवल मीडिया अनुमानों के आधार पर आंकड़े सामने आए हैं।










