मानिकपुर थाना क्षेत्र में सामने आई यह घटना केवल एक परिवार का निजी शोक नहीं है, बल्कि यह सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था, आपातकालीन सेवाओं और प्रशासनिक निगरानी पर खड़े होते गंभीर सवालों का जीवंत उदाहरण बन गई है। रेलवे पुल के पास मरीज को ले जा रही एंबुलेंस का अचानक खराब हो जाना, फिर मरीज की मौत और उसके बाद घंटों तक जाम—यह पूरी श्रृंखला बताती है कि ज़मीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएं किस हद तक अव्यवस्थित हैं।
सुबह की तबीयत बिगड़ी, उम्मीद एंबुलेंस पर टिकी थी
मानिकपुर के इंदिरा नगर निवासी हेमराज सिंह के लिए वह सुबह सामान्य नहीं थी। उनके 75 वर्षीय पिता हनुमान प्रसाद की अचानक तबीयत बिगड़ गई। उम्र और पूर्व स्वास्थ्य स्थितियों को देखते हुए परिजनों ने बिना देर किए एंबुलेंस सेवा को कॉल किया। उम्मीद यही थी कि सरकारी व्यवस्था समय पर पहुंचेगी और जान बचाने में सहायक होगी, लेकिन यहीं से लापरवाही की श्रृंखला शुरू हो गई।
परिजनों के अनुसार, एंबुलेंस लगभग आधे घंटे की देरी से मौके पर पहुंची। यह देरी एक गंभीर मरीज के लिए बेहद घातक साबित हो सकती है। बावजूद इसके, परिजन संयम बनाए रहे और पिता को लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) की ओर रवाना हुए।
रेलवे पुल बना संकट का केंद्र, एंबुलेंस ने वहीं तोड़ा दम
सीएचसी की ओर जाते समय रेलवे पुल के पास अचानक एंबुलेंस खराब हो गई। न तो इंजन चालू हो रहा था और न ही उसमें मौजूद उपकरणों से कोई वैकल्पिक आपात व्यवस्था संभव हो सकी। मरीज अंदर तड़प रहा था और बाहर सड़क पर अफरा-तफरी मच गई।
स्थानीय लोगों की मदद से एंबुलेंस को धक्का लगाकर तिगालिया चौराहे तक लाया गया। यह दृश्य अपने-आप में व्यवस्था की विफलता का प्रतीक था—जहां एक आपातकालीन वाहन खुद मदद का मोहताज बन गया।
निजी वाहन बना आखिरी सहारा, अस्पताल पहुंचते ही मौत की पुष्टि
तिगालिया चौराहे पर पहुंचने के बाद परिजनों ने हनुमान प्रसाद को एंबुलेंस से उतारकर एक निजी वाहन में रखा और किसी तरह सीएचसी पहुंचाया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अस्पताल में डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया।
यह क्षण केवल एक जीवन के अंत का नहीं था, बल्कि उस भरोसे के टूटने का भी था जो आम नागरिक सरकारी स्वास्थ्य तंत्र पर करता है।
परिजनों का आरोप: समय पर सेवा मिलती तो बच सकती थी जान
मृतक के पुत्र हेमराज सिंह ने एंबुलेंस सेवा पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाया। उनका कहना है कि यदि एंबुलेंस समय पर पहुंचती और रास्ते में खराब न होती, तो उनके पिता की जान बचाई जा सकती थी।
उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ऐसी जर्जर हालत वाली एंबुलेंस को आपात सेवा में क्यों लगाया गया? क्या इन वाहनों की नियमित तकनीकी जांच होती भी है या नहीं?
त्योहार की भीड़ में जाम, नगर की रफ्तार थमी
रेलवे पुल के पास एंबुलेंस के खराब होने से यातायात पूरी तरह बाधित हो गया। त्योहार के कारण बाजार में पहले से ही भारी भीड़ थी। जाम की स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि कई घंटों तक नगर का आवागमन ठप रहा।
लोगों ने स्वयं आगे बढ़कर एंबुलेंस को हटवाया, तब जाकर कहीं यातायात बहाल हो सका। यह स्थिति बताती है कि आपातकालीन घटनाओं से निपटने के लिए प्रशासनिक समन्वय कितना कमजोर है।
स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलती घटना
यह घटना केवल एक तकनीकी खराबी नहीं मानी जा सकती। यह आपात स्वास्थ्य सेवाओं की संरचनात्मक विफलता को उजागर करती है। एंबुलेंस की स्थिति, स्टाफ की तैयारी, वैकल्पिक व्यवस्था और निगरानी—हर स्तर पर सवाल खड़े होते हैं।
चित्रकूट जैसे जिलों में जहां दूर-दराज़ के गांवों से मरीजों को लाया जाता है, वहां एंबुलेंस सेवा जीवनरेखा होती है। यदि वही भरोसे के लायक न रहे, तो आम नागरिक किस पर निर्भर करेगा?
स्वास्थ्य और सुरक्षा पर उठते सवाल: ज़मीनी हकीकत
समाचार दर्पण के माध्यम से यह मामला केवल रिपोर्ट नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यह घटना प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और नीति-निर्माताओं से जवाब मांगती है कि आखिर कब तक ऐसी लापरवाहियों की कीमत आम नागरिक अपनी जान देकर चुकाता रहेगा।
पाठकों के सवाल (FAQ)
❓ एंबुलेंस की तकनीकी जांच कितनी बार होनी चाहिए?
नियमों के अनुसार हर एंबुलेंस की नियमित अंतराल पर तकनीकी और यांत्रिक जांच अनिवार्य है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसका पालन अक्सर ढीला रहता है।
❓ क्या एंबुलेंस खराब होने पर वैकल्पिक व्यवस्था का प्रावधान है?
सैद्धांतिक रूप से हां, लेकिन अधिकांश मामलों में वैकल्पिक व्यवस्था तुरंत उपलब्ध नहीं हो पाती।
❓ क्या परिजन लापरवाही की शिकायत दर्ज करा सकते हैं?
हाँ, परिजन स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन और संबंधित एंबुलेंस सेवा प्रदाता के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
❓ क्या ऐसी घटनाओं पर विभागीय कार्रवाई होती है?
जांच के बाद कार्रवाई का प्रावधान है, लेकिन कई मामलों में यह प्रक्रिया लंबी और औपचारिक बनकर रह जाती है।











