शराब, ज़मीन और विस्मरण के बीच फँसी ज़िंदगी — बुंदेलखंड के कोल आदिवासियों का यथार्थ

बुंदेलखंड के चित्रकूट जिले में कोल आदिवासी समुदाय की ज़िंदगी, जहां शराब की लत, गरीबी और ज़मीन हड़पने की समस्या ने सामाजिक संकट पैदा किया है

संजय सिंह राणा की खास रिपोर्ट
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बुंदेलखंड की धरती इतिहास, आस्था और संघर्ष—तीनों की साक्षी रही है। इसी भूभाग में स्थित चित्रकूट अपने धार्मिक वैभव के साथ-साथ सामाजिक अंतर्विरोधों के लिए भी जाना जाता है। इन्हीं अंतर्विरोधों के बीच, जंगलों और पथरीली पहाड़ियों की छाया में, कोल आदिवासी समुदाय की ज़िंदगी दशकों से एक ऐसे चक्र में फँसी है जहाँ परंपरा, अभाव, नशा और शोषण—सब एक-दूसरे में उलझ गए हैं। बाहर से देखने पर यह जीवन रहस्यमय लगता है, पर भीतर उतरते ही इसकी त्रासदी साफ़ दिखाई देती है।

परंपरा, श्रम और विस्थापन की स्मृतियाँ

कोल आदिवासी मूलतः जंगल, जमीन और श्रम से जुड़े लोग रहे हैं। पीढ़ियों तक उनकी पहचान जंगल से मिलने वाले कंद-मूल, शिकार, लकड़ी और सीमित खेती से बनी रही। लेकिन औपनिवेशिक दौर, वन कानूनों और बाद के विकास मॉडल ने उनके पारंपरिक अधिकारों को धीरे-धीरे सीमित किया। जंगल से दूरी बढ़ी तो रोज़गार की अनिश्चितता आई; अनिश्चितता के साथ आया तनाव—और तनाव के साथ नशे का सहारा। यह कहना गलत होगा कि शराब कोल समाज में बाहरी तत्व है। कुछ हद तक यह उनकी सांस्कृतिक स्मृतियों में मौजूद रही है। पर कालांतर में जो बदलाव आया, उसने शराब को रस्म से आदत और आदत से लत में बदल दिया। यहीं से पतन की वह राह खुली जिसने आज पूरे समुदाय को अपनी गिरफ्त में ले लिया है।

रस्म से लत तक का खतरनाक सफ़र

शराब कभी सामूहिक मेलों या खास अवसरों तक सीमित थी। अब यह सुबह से रात तक की दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी है। पुरुष ही नहीं, महिलाएँ भी इसकी चपेट में हैं। नशा यहाँ केवल एक व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि सामूहिक संकट बन चुका है। परिवारों की आय का बड़ा हिस्सा शराब पर खर्च हो जाता है। बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है। घरेलू हिंसा, झगड़े और अस्थिर रिश्ते आम हो गए हैं। सबसे दुखद यह कि नशे ने निर्णय लेने की क्षमता छीन ली है। यही वह बिंदु है जहाँ शराब माफिया अपनी चालें चलते हैं।

शराब माफिया और शोषण की नई व्यवस्था

चित्रकूट और आसपास के इलाकों में अवैध शराब का कारोबार कोई छिपी बात नहीं। यह कारोबार केवल शराब बेचने तक सीमित नहीं है; यह कर्ज़, डर और निर्भरता की पूरी व्यवस्था खड़ी करता है। पहले उधार पर शराब दी जाती है। फिर उधार ब्याज बनता है। अंततः ब्याज चुकाने के नाम पर ज़मीन के काग़ज़, अंगूठे के निशान और पट्टे माँगे जाते हैं। यह सब उस समुदाय के साथ हो रहा है जिसकी साक्षरता सीमित है, जो क़ानूनी प्रक्रियाओं से अनजान है और जिसकी आवाज़ दूर-दराज़ तक नहीं पहुँचती।

पट्टे की ज़मीन: उम्मीद से हाथ से फिसलती विरासत

एक दौर था जब सरकारी नीतियों के तहत—खासतौर पर कांग्रेस शासन के समय—कोल आदिवासियों को पट्टे की ज़मीन दी गई। सोच यह थी कि स्थायी ज़मीन से उनकी ज़िंदगी में स्थिरता आएगी, खेती बढ़ेगी, आत्मनिर्भरता पैदा होगी। लेकिन ज़मीन मिलने के साथ संरक्षण और मार्गदर्शन नहीं मिला। नतीजा यह हुआ कि शराब की लत ने उस उम्मीद को खोखला कर दिया। कहीं ज़मीन गिरवी रख दी गई। कहीं फर्जी दस्तावेज़ों से हड़प ली गई। कहीं दबाव और डर से नाम बदलवा लिए गए। आज स्थिति यह है कि जिन हाथों में कभी पट्टे के काग़ज़ थे, वे हाथ फिर से मज़दूरी के लिए फैलने लगे हैं।

महिलाएँ दोहरी मार की शिकार

कोल समाज की महिलाएँ इस संकट की सबसे बड़ी पीड़ित हैं। एक ओर वे स्वयं नशे की गिरफ्त में हैं। दूसरी ओर नशे में डूबे पुरुषों की हिंसा झेलती हैं। घर की जिम्मेदारी, बच्चों की परवरिश और सामाजिक तिरस्कार—सब कुछ उनके कंधों पर आ पड़ा है। कई मामलों में महिलाएँ ज़मीन बचाने की आख़िरी कोशिश करती हैं, लेकिन क़ानूनी जानकारी के अभाव में उनकी लड़ाई अक्सर हार में बदल जाती है।

बच्चों का भविष्य: शिक्षा से दूर, चक्र में कैद

जब परिवार का बड़ा हिस्सा शराब और कर्ज़ में डूबा हो, तो बच्चों की शिक्षा सबसे पहले कुर्बान होती है। स्कूल छोड़कर बच्चे या तो मजदूरी करते हैं या फिर उसी जीवन शैली को अपनाने लगते हैं जिसे वे रोज़ देखते हैं। इस तरह गरीबी–नशा–शोषण का चक्र अगली पीढ़ी तक पहुँच जाता है।

प्रशासन, समाज और चुप्पी

प्रशासनिक योजनाएँ काग़ज़ों में मौजूद हैं—नशा मुक्ति अभियान, आदिवासी कल्याण योजनाएँ, भूमि सुरक्षा कानून। लेकिन ज़मीनी हकीकत में इनका असर सीमित है। कहीं निगरानी की कमी है। कहीं राजनीतिक इच्छाशक्ति कमजोर पड़ जाती है। और कहीं समाज की उदासीनता रास्ता रोक लेती है। शराब माफिया का नेटवर्क अक्सर स्थानीय स्तर पर इतना मजबूत होता है कि उसके खिलाफ आवाज़ उठाना जोखिम भरा हो जाता है।

क्या रास्ता है इस अंधेरे से बाहर?

समाधान एकतरफ़ा नहीं हो सकता। नशा मुक्ति को केवल अभियान नहीं, सतत प्रक्रिया बनाना होगा। भूमि अधिकारों की सख़्त निगरानी और कानूनी सहायता ज़रूरी है। महिलाओं के स्वयं सहायता समूह इस समुदाय को नई दिशा दे सकते हैं। शिक्षा और जागरूकता ही उस चक्र को तोड़ सकती है जो पीढ़ियों से चलता आ रहा है।

समापन: रहस्य नहीं, जिम्मेदारी का सवाल

कोल आदिवासियों की ज़िंदगी कोई रहस्य नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक विफलता का आईना है। शराब ने उनके जीवन को नर्क बनाया है, यह सच है—लेकिन उससे बड़ा सच यह है कि इस नर्क को बनाए रखने वाली व्यवस्थाएँ आज भी सक्रिय हैं। यदि ज़मीन, शिक्षा और नशा मुक्ति को एक साथ, ईमानदारी से लागू किया जाए, तो वही समुदाय जो आज हाशिए पर है, कल आत्मनिर्भरता की मिसाल बन सकता है। यह लेख केवल पीड़ा का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक चेतावनी और आह्वान है—कि अगर अब भी नहीं चेते, तो चित्रकूट की पहाड़ियों में बसने वाली यह सभ्यता केवल आँकड़ों में सिमट कर रह जाएगी।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कोल आदिवासी समुदाय सबसे अधिक किन समस्याओं से जूझ रहा है?

नशे की लत, भूमि हड़प, गरीबी, शिक्षा की कमी और सामाजिक शोषण उनकी प्रमुख समस्याएँ हैं।

शराब माफिया किस तरह आदिवासियों की जमीन पर कब्जा कर लेते हैं?

उधार शराब, कर्ज़ और डर के जरिए पट्टों और दस्तावेज़ों पर कब्जा किया जाता है।

क्या नशा मुक्ति से स्थिति बदली जा सकती है?

हाँ, लेकिन इसके लिए दीर्घकालिक, सतत और सामुदायिक प्रयास आवश्यक हैं।

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