हरदोई पंचायत विकास 2025 को लेकर राजधानी लखनऊ से सटे इस जिले की तस्वीर अक्सर आँकड़ों की औसत पंक्तियों में दब जाती है। वर्ष 2025 में पंचायत स्तर पर सड़कों, पानी, स्वच्छता और रोज़गार से जुड़े अनेक कार्य हुए—कुछ ने गाँव की शक्ल बदली, तो कुछ केवल फाइलों में पूरे दिखे। यही विरोधाभास इस दस्तावेजी रिपोर्ट की नींव है। आगे पढ़ते हुए पाठक स्वयं तय कर सकेंगे कि हरदोई में विकास कहाँ पहुँचा और कहाँ ठहर गया।
पंचायत संरचना, निधि और नियोजन की वास्तविकता
हरदोई जिले में लगभग 1,200 ग्राम पंचायतें और 19 विकासखंड हैं। वर्ष 2025 में अधिकांश पंचायतों को 15वें वित्त आयोग, राज्य वित्त आयोग और मनरेगा सहित अन्य योजनाओं से औसतन 18 से 25 लाख रुपये तक की विकास निधि प्राप्त हुई।
काग़ज़ों में यह राशि पर्याप्त लगती है, लेकिन अहिरोरी, सुरसा और टड़ियावां जैसे ब्लॉकों में कई पंचायतें तकनीकी समझ और प्रशासनिक मार्गदर्शन के अभाव में वर्षांत तक भी पूरी राशि खर्च नहीं कर सकीं। इससे स्पष्ट होता है कि समस्या केवल धन की नहीं, बल्कि योजना-क्षमता की भी रही।
सड़क, पानी, स्वच्छता और मनरेगा: ज़मीनी कार्यों की स्थिति
सड़क निर्माण: बिलग्राम और कछौना क्षेत्र की पंचायतों में इंटरलॉकिंग और सीसी सड़कें बनीं, लेकिन अधिकांश स्थानों पर नालियों के बिना। नतीजा यह रहा कि बरसात में सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं। इसके विपरीत माधोगंज ब्लॉक की कुछ पंचायतों में सीमित बजट के बावजूद सड़क–नाली का संयुक्त कार्य देखने को मिला।
पेयजल (जल जीवन मिशन): संडीला में पाइपलाइन तो बिछी, पर कई टंकियाँ अधूरी रहीं। वहीं हरियावां में कनेक्शन कम होने के बावजूद जलापूर्ति अपेक्षाकृत नियमित रही। पूरे जिले में केवल 40–45 प्रतिशत घरों तक ही वास्तविक रूप से नल से पानी पहुँच सका।
स्वच्छता: कछौना में सामुदायिक शौचालय बने, लेकिन रख-रखाव लगभग शून्य रहा। टड़ियावां में कचरा निस्तारण केंद्र काग़ज़ों में पूरे दिखे। ठोस कचरा प्रबंधन केवल 15–20 प्रतिशत पंचायतों तक सीमित रहा।
मनरेगा: भरावन में तालाब खुदाई जैसे कार्य अधूरे रहे, जबकि शाहाबाद में मानव-दिवस अधिक सृजित हुए, लेकिन स्थायी परिसंपत्तियाँ सीमित रहीं। मनरेगा ने रोज़गार दिया, पर दीर्घकालिक विकास कम दिखा।
प्रशासनिक असमानता और विकास का विरोधाभास
एक ही विकासखंड की पंचायतों के बीच भारी अंतर दिखाई दिया। जहाँ प्रधान सक्रिय और सचिव उत्तरदायी रहे, वहाँ कार्य ज़मीन पर दिखे। जहाँ यह भूमिका कमजोर रही, वहाँ विकास केवल फाइलों और माप पुस्तिकाओं तक सीमित रहा।
विशेष रूप से सुरसा और अहिरोरी ब्लॉकों में यह अंतर साफ दिखा—एक पंचायत में पंचायत भवन सक्रिय, दूसरी में बंद और उपेक्षित।
वर्ष 2025 में हरदोई की पंचायतों में विकास हुआ, यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन यह विकास समान नहीं था, गुणवत्ता में असंतुलित था और मानव भूमिका पर अत्यधिक निर्भर रहा।
यह रिपोर्ट संकेत देती है कि अब चुनौती नई योजना लाने की नहीं, बल्कि एक ही योजना को हर पंचायत में समान ईमानदारी, निगरानी और जवाबदेही के साथ लागू करने की है।
पाठकों के सवाल | पंचायत विकास 2025
हरदोई और लखनऊ में पंचायत विकास 2025 का सबसे बड़ा अंतर क्या रहा?
हरदोई में विकास की गति प्रशासनिक सक्रियता पर निर्भर रही, जबकि लखनऊ में योजनाओं की उपलब्धता अधिक होने के बावजूद शहरी प्राथमिकताओं के कारण पंचायतें अपेक्षाकृत पीछे रहीं।
क्या पंचायतों को 2025 में पर्याप्त विकास निधि मिली?
अधिकांश पंचायतों को 15वें वित्त आयोग, राज्य वित्त आयोग और मनरेगा से पर्याप्त राशि मिली, लेकिन तकनीकी समझ और निगरानी की कमी के कारण पूरी निधि का उपयोग हर जगह नहीं हो सका।
जल जीवन मिशन का वास्तविक लाभ कितने घरों तक पहुँचा?
हरदोई में लगभग 40–45 प्रतिशत और लखनऊ में 55–60 प्रतिशत ग्रामीण घरों तक ही नियमित रूप से नल से जलापूर्ति संभव हो सकी।
मनरेगा से स्थायी विकास क्यों नहीं दिख पाया?
मनरेगा ने रोजगार तो दिया, लेकिन कई स्थानों पर कार्य अधूरे रहे या ऐसी परिसंपत्तियाँ बनीं जो दीर्घकालिक उपयोग में नहीं आ सकीं।
पंचायत विकास में सबसे बड़ी बाधा क्या सामने आई?
सबसे बड़ी बाधा योजनाओं की कमी नहीं, बल्कि समान निगरानी, गुणवत्ता नियंत्रण और स्थानीय जवाबदेही का अभाव रहा।








