मीटर रीडर्स का संगठित संघर्ष: जब चुप्पी टूटने लगी, न्याय की दहलीज़ और सुशासन की परीक्षा

उत्तर प्रदेश में मीटर रीडर्स का भावुक प्रदर्शन, न्यायालय के सामने बच्चे के साथ बैठा मीटर रीडर, स्मार्ट मीटर नीति से प्रभावित श्रमिकों का संघर्ष
✍️ अब्दुल मोबीन सिद्दीकी की रिपोर्ट
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✍️- उत्तर प्रदेश के मीटर रीडर्स पर केंद्रित एक विस्तारित दस्तावेजी-पत्रकारीय रिपोर्ट।

अकेलेपन से संगठन तक

लंबे समय तक उत्तर प्रदेश के मीटर रीडर्स अकेले थे—अलग-अलग गाँवों में, अलग-अलग सबडिवीज़नों में, अलग-अलग ठेकेदारों के अधीन। उनकी पीड़ा व्यक्तिगत थी, इसलिए वह अदृश्य थी। कोई नौकरी गई तो वह “व्यक्तिगत मामला” कहलाया; किसी का मानदेय रुका तो “तकनीकी कारण” बता दिया गया। लेकिन जैसे-जैसे स्मार्ट मीटर का दायरा बढ़ा, वैसे-वैसे यह पीड़ा सामूहिक होने लगी। जब सैकड़ों नहीं, हजारों लोग एक साथ हाशिये पर पहुँचे, तब चुप्पी में दरार पड़ी।

यहीं से एक नया अध्याय शुरू हुआ—संगठन का। यह संगठन किसी बड़े मंच या राजनीतिक बैनर से नहीं, बल्कि व्हाट्सऐप ग्रुपों, स्थानीय बैठकों और चाय की दुकानों पर हुई बातचीत से जन्मा। मीटर रीडर्स ने पहली बार महसूस किया कि उनकी समस्या साझा है, और साझा समस्या का समाधान भी साझा संघर्ष से ही निकलेगा।

संगठन का स्वरूप: अनौपचारिक लेकिन जमीनी

मीटर रीडर्स का यह संगठन पारंपरिक ट्रेड यूनियन जैसा नहीं था। न इनके पास कार्यालय थे, न चंदे की नियमित व्यवस्था। फिर भी इनके पास था—अनुभव, आंकड़े और आक्रोश।

किसी जिले में 80% रीडर्स आउटसोर्स
किसी सर्किल में स्मार्ट मीटर लगते ही रीडिंग बंद, किसी कस्बे में छह महीने से भुगतान नहीं, इन तथ्यों ने संगठन को मजबूती दी। धीरे-धीरे प्रतिनिधि चुने गए, ज्ञापन का मसौदा बना, और यह तय हुआ कि अब व्यक्तिगत गुहार नहीं—सामूहिक मांग रखी जाएगी।

पहला कदम: विभाग से संवाद की कोशिश

संगठन बनने के बाद पहला कदम टकराव नहीं, संवाद था। मीटर रीडर्स ने जिलास्तरीय अधिकारियों, अधीक्षण अभियंताओं और वितरण खंड प्रमुखों को ज्ञापन सौंपे। ज्ञापन में भाषा आक्रामक नहीं थी—बल्कि संयमित, तथ्यात्मक और मानवीय।

मुख्य मांगें स्पष्ट थीं—
स्मार्ट मीटर के बाद प्रभावित रीडर्स की सूची, वैकल्पिक कार्य या समायोजन, बकाया मानदेय का भुगतान, भविष्य की स्पष्ट नीति, लेकिन अधिकांश जगहों पर जवाब वही मिला—“यह नीति का मामला है”, “ऊपर से निर्देश नहीं हैं”, या फिर पूर्ण मौन। यहीं से संवाद की उम्मीद टूटने लगी और संघर्ष की जमीन तैयार हुई।

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धरना और प्रदर्शन: जब मजबूरी ने सड़क का रास्ता दिखाया

जब कार्यालयों के दरवाज़े बंद रहे, तो मीटर रीडर्स सड़क पर आए। यह कोई अचानक उग्र आंदोलन नहीं था, बल्कि विवशता का परिणाम था।

कई जिलों में— सबडिवीजन कार्यालयों के बाहर शांत धरने, काली पट्टी बांधकर काम, सामूहिक अवकाश की चेतावनी। इन धरनों में न नारेबाज़ी थी, न राजनीतिक भाषण। थी तो सिर्फ एक बात—“हम भी इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं”।

धरने पर बैठे रीडर्स के साथ उनके बच्चे भी दिखे। यह दृश्य खुद में एक बयान था—यह संघर्ष सिर्फ नौकरी का नहीं, पीढ़ियों के भविष्य का है।

विभागीय प्रतिक्रिया: औपचारिकता बनाम समाधान

धरनों के बाद विभाग हरकत में तो आया, लेकिन समाधान के बजाय औपचारिकता के साथ। कहीं-कहीं आश्वासन दिए गए— “मामला विचाराधीन है”, “उच्च स्तर पर भेजा गया है”, लेकिन न तो कोई समय-सीमा तय हुई, न कोई लिखित आदेश जारी हुआ। स्मार्ट मीटर की परियोजना चलती रही, और मीटर रीडर्स का भविष्य अधर में लटका रहा।

यहाँ यह सवाल उठता है—क्या किसी भी नीति में प्रभावित मानव संसाधन के लिए पूर्व योजना नहीं होनी चाहिए? क्या तकनीकी सुधार का अर्थ मानवीय विस्थापन स्वीकार कर लेना है?

न्याय का दरवाज़ा: मजबूरी या लोकतांत्रिक अधिकार?

जब विभागीय स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं हुई, तब मीटर रीडर्स ने न्यायिक रास्ते पर विचार शुरू किया। यह निर्णय आसान नहीं था। कोर्ट जाना समय, पैसा और धैर्य मांगता है—जो इन रीडर्स के पास सबसे कम है। फिर भी उन्होंने यह रास्ता चुना, क्योंकि यही लोकतंत्र में अंतिम सहारा है।

श्रम विभाग में शिकायतें
अनुबंध उल्लंघन के आधार पर नोटिस, और कुछ जगह उच्च न्यायालय में याचिका की तैयारी। यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया—मीटर रीडर्स किसी अवैध मांग के लिए नहीं, बल्कि न्यूनतम न्याय के लिए दरवाज़ा खटखटा रहे हैं।

कानूनी बहस का केंद्र

काम स्थायी, नौकरी अस्थायी क्यों? न्यायालयों में जब ऐसे मामलों पर सुनवाई होती है, तो एक मूल प्रश्न उठता है— यदि काम स्थायी है, तो उसे करने वाला कर्मचारी अस्थायी क्यों?

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मीटर रीडिंग वर्षों से बिजली विभाग की अनिवार्य गतिविधि रही है। स्मार्ट मीटर आने से प्रक्रिया बदली है, आवश्यकता नहीं। डेटा मॉनिटरिंग, फील्ड सत्यापन, उपभोक्ता सहायता—ये सभी कार्य अभी भी मौजूद हैं। तो फिर वही लोग, जिन्होंने वर्षों तक यह काम किया, अचानक “अनावश्यक” कैसे हो गए?

आउटसोर्सिंग का सच: जिम्मेदारी से पलायन

आउटसोर्सिंग ने विभाग को एक सुविधा दी—जवाबदेही से मुक्ति। न नियुक्ति की जिम्मेदारी, न हटाने की नैतिक चिंता, न सामाजिक सुरक्षा की बाध्यता। मीटर रीडर ठेकेदार के भरोसे है, और ठेकेदार विभाग के इशारे पर। इस त्रिकोण में सबसे कमजोर कड़ी वही है, जो रोज़ धूप-बारिश में काम करता है।

यह मॉडल अल्पकालिक लाभ दे सकता है, लेकिन दीर्घकाल में सामाजिक असंतोष और न्यायिक हस्तक्षेप को जन्म देता है।

स्मार्ट मीटर बनाम स्मार्ट नीति

स्मार्ट मीटर को “स्मार्ट” तब कहा जाएगा, जब उसके साथ नीति भी स्मार्ट हो। क्या सरकार ने यह आकलन किया कि कितने रीडर्स प्रभावित होंगे? क्या पुनःप्रशिक्षण का कोई खाका था? क्या वैकल्पिक रोजगार की योजना बनी? इन सवालों का जवाब अधिकतर “नहीं” में मिलता है। यह तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि नीतिगत अधूरापन है।

मानवीय पक्ष: आंकड़ों से परे जीवन

एक मीटर रीडर का जीवन सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं। वह किसी का पिता है, किसी का बेटा, किसी का पति। जब नौकरी जाती है— आत्मसम्मान टूटता है, सामाजिक स्थिति गिरती है, मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है, इन पहलुओं का कोई कॉलम सरकारी फाइलों में नहीं होता, लेकिन यही समाज की वास्तविक कीमत है।

उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड की भूमिका और नैतिक जिम्मेदारी

राज्य की सबसे बड़ी बिजली संस्था होने के नाते यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह केवल राजस्व और तकनीक नहीं, बल्कि मानव संसाधन को भी प्राथमिकता दे। यदि वर्षों तक मीटर रीडर्स ने विभाग की आय सुनिश्चित की, तो क्या विभाग की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि परिवर्तन के दौर में उन्हें अकेला न छोड़े?

संघर्ष का सामाजिक अर्थ: यह सिर्फ मीटर रीडर्स का मामला नहीं

आज मीटर रीडर प्रभावित है, कल कोई और संविदा कर्मी। यदि तकनीक के नाम पर बिना संक्रमण नीति के नौकरियाँ समाप्त होती रहीं, तो यह मॉडल व्यापक असुरक्षा पैदा करेगा।

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यह रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह एक वर्ग की कहानी नहीं—पूरे श्रम ढांचे का आईना है।

आगे का रास्ता: समाधान की ठोस रूपरेखा

इस संघर्ष का अंत टकराव में नहीं, समाधान में होना चाहिए। इसके लिए— राज्यस्तरीय सर्वे, स्मार्ट मीटर से प्रभावित सभी मीटर रीडर्स का डेटा।

संक्रमण नीति (Transition Policy)
तकनीकी बदलाव से पहले मानव संसाधन का समायोजन। पुनःप्रशिक्षण और समायोजन। डेटा सपोर्ट, उपभोक्ता सेवा, फील्ड सत्यापन जैसे कार्यों में नियुक्ति। अंतरिम आर्थिक सहायता, जब तक नई व्यवस्था लागू न हो।

स्पष्ट संवाद
अनिश्चितता सबसे बड़ा संकट है—इसे खत्म करना पहला कदम होना चाहिए।

न्याय की रोशनी किस घर तक पहुँचेगी?

मीटर रीडर्स का संघर्ष कोई विद्रोह नहीं—यह लोकतांत्रिक आग्रह है। वे व्यवस्था को तोड़ना नहीं चाहते, उसमें सम्मानजनक स्थान चाहते हैं।

जो लोग वर्षों तक दूसरों के घरों की रोशनी का हिसाब रखते रहे, क्या उनके घर की रोशनी की जिम्मेदारी किसी की नहीं?

यदि सुशासन का अर्थ केवल योजनाओं की घोषणा है, तो यह अधूरा है। सुशासन तब पूरा होगा, जब परिवर्तन की कीमत सबसे कमजोर व्यक्ति न चुकाए। आज मीटर रीडर्स न्याय की दहलीज़ पर खड़े हैं।

यह केवल अदालत का नहीं, समाज और सरकार की संवेदना का भी इम्तिहान है।

❓ महत्वपूर्ण सवाल–जवाब

क्या मीटर रीडर्स का संघर्ष अवैध मांगों पर आधारित है?

नहीं, यह संघर्ष न्यूनतम न्याय, समायोजन और नीति स्पष्टता की मांग करता है।

क्या स्मार्ट मीटर से मीटर रीडर्स की आवश्यकता पूरी तरह समाप्त हो गई है?

नहीं, कार्य का स्वरूप बदला है, आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है।

क्या सरकार के पास संक्रमण नीति का विकल्प मौजूद है?

अब तक कोई स्पष्ट और लिखित संक्रमण नीति सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है।

यह संघर्ष भविष्य में किन वर्गों को प्रभावित कर सकता है?

यह मॉडल अन्य संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए भी असुरक्षा पैदा कर सकता है।

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  1. मान्य प्रधान संपादक जी,
    आपकी लेखन-शैली की सबसे बड़ी ताक़त
    आप “विषय” नहीं उठाते—आप “स्थिति” रचते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ आप साधारण पत्रकार या लेखक नहीं रहते। आप किसी घटना को ख़बर की तरह नहीं लिखते आप उसे परिस्थिति, पृष्ठभूमि, संरचना और परिणाम के साथ रखते हैं।
    पाठक को सिर्फ़ जानकारी नहीं मिलती—उसे स्थिति में खड़ा कर दिया जाता है।
    उदाहरण के तौर पर (बिना किसी लेख का नाम लिए):
    जब आप मीटर रीडर, माली, पीड़िता, या आदिवासी की बात करते हैं— तो वह “एक व्यक्ति” नहीं रहता, वह एक सिस्टम के भीतर फँसा हुआ मनुष्य बन जाता है।📌 यह ताक़त बहुत कम लेखकों में होती है।
    क्योंकि इसके लिए तीन चीज़ें एक साथ चाहिए: संवेदनशीलता, संरचनात्मक समझ, भाषा पर नियंत्रण, और आप तीनों को एक साथ साधते हैं।
    आपकी भाषा की असली शक्ति कहाँ है?
    आपकी भाषा “भावुक” नहीं, “गंभीर रूप से संवेदनशील” है। आप रोने-धोने वाली भावुकता से बचते हैं। आप करुणा पैदा करते हैं—लेकिन आँसू नहीं माँगते।
    आप उपमा कम लगाते हैं, लेकिन जहाँ लगाते हैं, वहीं चोट करती है, आप शब्दों को सजाने से ज़्यादा तौलने में विश्वास रखते हैं। इसलिए आपकी भाषा टिकती है, जल्दी बासी नहीं होती।
    यही कारण है कि आप बार-बार कहते हैं— बस सोच कर लिखो, क्योंकि आप जानते हैं: यह शब्द सजावट नहीं, संरचना का हिस्सा है।
    आपकी सबसे बड़ी वैचारिक क्षमता
    आप ‘सत्ता बनाम जनता’ को नहीं, ‘व्यवस्था बनाम मनुष्य’ को लिखते हैं। यह बहुत बड़ा फर्क है। आप किसी एक नेता, अफ़सर या पार्टी को खलनायक नहीं बनाते।
    आप दिखाते हैं कि— सिस्टम कैसे चुप कराता है? प्रक्रिया कैसे अपराध में बदलती है? नियम कैसे पीड़ा को वैध बना देते हैं? इसलिए आपके लेख समय के साथ भी प्रासंगिक रहते हैं।
    वह एक चीज़, जो अगर आप थोड़ी बदल दें—तो प्रभाव दोगुना हो सकता है
    आप हर लेख को “अंतिम बात” बना देना चाहते हैं। यह आपकी ताक़त भी है—और सीमा भी।
    आप अक्सर: हर लेख में पूरी लड़ाई लड़ लेना चाहते हैं, हर तथ्य, हर परत, हर आक्रोश उसी एक जगह उँडेल देते हैं। नतीजा, लेख बहुत गहरा हो जाता है, लेकिन कुछ पाठक डर भी जाते हैं।
    समस्या भाषा या विचार की नहीं है—
    समस्या घनत्व (density) की है। छोटा-सा बदलाव, बड़ा असर, अगर आप यह स्वीकार कर लें कि— हर लेख को “निर्णायक” नहीं, कुछ लेखों को “उत्तेजक” होना चाहिए तो:
    आपके लेख ज़्यादा दूर तक पहुँचेंगे, और ज़्यादा लोग पढ़ना शुरू करेंगे, और वही लोग अगली, गहरी रिपोर्ट के लिए तैयार होंगे।
    मतलब, आपको कम गहरा नहीं लिखना है— बस गहराई को चरणों में बाँटना है।
    आप दुर्लभ लेखक हैं, क्योंकि आप व्यवस्था को गाली नहीं देते— आप उसे नंगा खड़ा कर देते हैं। और अगर आप अपनी हर रचना को “अंतिम सत्य” बनाने की जगह “सत्य की अगली सीढ़ी” मान लें— तो आपका असर केवल मजबूत नहीं, अपरिहार्य हो जाएगा।
    क्योंकि सच यह है—
    आप सिर्फ़ लिख नहीं रहे, पाठक गढ़ रहे हैं।
    आपका एक नियमित और गुमनाम पाठक

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