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आध्यात्म

आत्मा को परमात्मा से मिलाने की यात्रा पर जो निकल जाएँ वही “सूफी” है ; सूफी रंग की कुछ खास बातें…

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 अनिल अनूप का तहकीकी जायज़ा

जिस प्रकार मध्यकालीन भारत में हिन्दुओं में भक्ति-आन्दोलन प्रारम्भ हुआ, उसी प्रकार मुसलमानों में प्रेम-भक्ति के आधार पर सूफीवाद का उदय हुआ। सूफी शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई, इस विषय पर विद्वानों में विभिन्न मत है। कुछ विद्वानों का विचार है कि इस शब्द की उत्पत्ति सफा शब्द से हुई। सफा का अर्थ पवित्र है। मुसलमानों में जो सन्त पवित्रता और त्याग का जीवन बिताते थे, वे सूफी कहलाये। एक विचार यह भी है कि सूफी शब्द की उत्पत्ति सूफा से हुई, जिसका अर्थ है ऊन। मुहम्मद साहब के पश्चात् जो सन्त ऊनी कपड़े पहनकर अपने मत का प्रचार करते थे, वे सूफी कहलाये। कुछ विद्वानों का विचार है कि सूफी शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द सोफिया से हुई, जिसका अर्थ ज्ञान है।

इस काल के प्रसिद्ध सूफी सन्तों में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती, ख्वाजा कुतुबुद्दीन, सन्त फरीद और निजामुद्दीन औलिया प्रमुख थे। ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती मुहम्मद गोरी के साथ भारत आये और अजमेर को उन्होंने अपना निवास-स्थान बनाया। हिन्दू और मुसलमान, दोनों पर इनके सिद्धान्तों का गहरा प्रभाव पड़ा। आज भी अजमेर में इनकी समाधि पर हजारों श्रद्धालु भक्त देश के विभिन्न भागों से आते हैं।

माना जाता है कि सूफ़ीवाद ईराक़ के बसरा नगर में क़रीब एक हज़ार साल पहले जन्मा। राबिया, अल अदहम, मंसूर हल्लाज जैसे शख़्सियतों को इनका प्रणेता कहा जाता है। ये अपने समकालीनों के आदर्श थे लेकिन इनको अपने जीवनकाल में आम जनता की अवहेलना और तिरस्कार झेलनी पड़ी। सूफ़ियों को पहचान अल ग़ज़ाली के समय (सन् ११००) से ही मिली। बाद में अत्तार, रूमी और हाफ़िज़ जैसे कवि इस श्रेणी में गिने जाते हैं, इन सबों ने शायरी को तसव्वुफ़ का माध्यम बनाया। भारत में इसके पहुंचने की सही-सही समयावधि के बारे में आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में ख़्वाजा मुईनुद्दीन बाक़ायदा सूफ़ीवाद के प्रचार-प्रसार में जुट गए थे।

सूफी लोगो सुन्नी को कहा जाता हैं और सुन्नी इस्लाम में हर फिरके से अलग और असल क़ुरान हदीस पर चलने वाले मोमिन होते हैं इस्लाम को अगर समझना हैं तो क़ुरान हदीस से समझा जा सकता हैं और क़ुरान हदीस को जो समझे वो असल मोमीन होता है।  सूफी वो होता है जो ज़िंदा रहते ही लोगों के बड़े काम आता है। 

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कुछ विद्वानों के अनुसार मदीना में मुहम्मद साहब द्वारा बनवाई गई मस्जिद के बाहर सफ्फ अर्थात् चबूतरे पर जिन गृहहीन व्यक्तियों ने शरण ली थी तथा जो पवित्र जीवन बिताते हुए ईश्वर की आराधना में लगे रहते थे, वे ‘सूफी’ कहलाये।

कुछ विद्वानों ने इसका उद्गम ‘सफ’ (पंक्ति) से माना है। उनके अनुसार वे लोग सूफी कहलाये जो निर्णय के दिन पवित्र एवं ईश्वरभक्त होने के कारण अन्य व्यक्तियों से पृथक् पंक्ति में खड़े किये जायेंगे।

अयूनसर अल सिराज का कथन है कि, ‘सूफी’ शब्द अरबी भाषा के ‘सूफ’ शब्द से निकला है जिसका अर्थ है ऊन। मुहम्मद साहब के पश्चात् अरब देश में जो सन्त ऊनी कम्बल ओढ़कर घूमते थे तथा अपने मत का प्रचार करते थे, वे सूफी कहलाये। 

पाश्चात्य विद्वान् ब्राउन ने इस मत को स्वीकार करते हुए लिखा है कि ईरान में इन रहस्यवादी साधनों को ऊन पहनने वाला कहा जाता था। ईरान में ये सन्त ऊनी वस्त्र को जीवन की सादगी तथा विलासिता से दूर रहने का प्रतीक मानकर एकान्त जीवन व्यतीत करने पर बल देते थे।

अधिकांश विद्वानों का कहना है कि इस धर्म का नाम ‘सूफी’ इसलिए पड़ा क्योंकि इस धर्म के अनुयायी बहुत निर्धनता की दशा में रहते थे। सूफी सन्त मोटा वस्त्र धारण करते थे, जमीन पर शयन करते थे। पैगम्बर की बनवाई गई मस्जिद में रहते थे तथा वाद-विवाद करते थे।

डॉ. अवध बिहारी पाण्डेय के अनुसार, “सूफी उन मुसलमान सन्तों को कहते हैं जो दीनता का जीवन बिताने के उद्देश्य से ऊन के मामूली कपड़े पहनते हैं तथा जो कुरान के शाब्दिक बाप्लार्थ को प्रधानता न देकर उसमें निहित रहस्य को विशेष महत्त्व देते हैं।”

गजाली के अनुसार, “सूफी होने का तात्पर्य यह है कि निरन्तर शान्ति से रहता हुआ मनुष्य ईश्वर की उपासना में लीन रहे।”

अतः स्पष्ट है कि सूफी सम्प्रदाय के सन्तों का जीवन बड़ा सरल, सादा तथा स्नेह से भरा हुआ था। ये सन्त सांसारिक भोग-विलास से दूर रहकर पवित्र तथा संयमी जीवन व्यतीत करते थे। ये सन्त पवित्र आचरण तथा उच्च आदर्शों के कारण बहुत लोकप्रिय थे।

सूफी मत का आविर्भाव– सूफी मत के आविर्भाव के संबंध में विद्वानों में बहुत मतभेद है। डॉ. यूसुफ हुसैन के अनुसार सूफीवाद की उत्पत्ति इस्लाम धर्म से हुई है। परम सत्ता की उपलब्धि से संबंधित रहस्यवाद को सूफी सन्तों ने इस्लाम धर्म से ग्रहण किया है। रोजा, पाँच बार नमाज पढ़ना, हज आदि धार्मिक कार्य तथा आचार का इस्लाम धर्म में बड़ा महत्त्व है। इस्लाम में आध्यात्मवाद और रहस्यवाद की भी प्रवृत्तियाँ हैं।

प्रो. निजामी ने सूफी मत के आविर्भाव पर अन्य धर्मों के प्रभावों को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट कहा है कि सूफी मत का मूल स्रोत कुरान तथा पैगम्बर की जीवनी है। परन्तु यह पूर्ण रूप से स्वीकार करना तर्कसंगत नहीं है कि सूफी मत का स्रोत केवल इस्लाम है। इस मत पर अन्य धर्म तथा दर्शनों का प्रभाव पड़ा है।

एडलबर्ट मार्क्स के अनुसार सूफी मत का आविर्भाव यूनानी दर्शन से हुआ है। ब्राउन के अनुसार इस प्रभाव के कारण इस्लाम के संन्यासी जीवन में रहस्यवादी प्रवृत्तियों का प्रवेश हुआ।

निकोल्सन के अनुसार सूफी मत के आविर्भाव में यूनानी प्रभाव का प्रमुख स्थान है।

कुछ विद्वानों के अनुसार सूफी मत का उदय आर्य जाति के धार्मिक विकास के परिणामस्वरूप हुआ। ब्राउन ने सूफी मत पर बौद्ध तथा जैन धर्म के प्रभाव को भी स्वीकार किया है। सूफी मत संबंधी शांति तथा अहिंसा पूर्ण रूप से जैन तथा बौद्ध धर्म से संबंधित है। अनेक बौद्ध भिक्षु धर्म के प्रचार के लिये पश्चिम एशिया के देशों में गये अत: सूफी साधकों के ऊपर प्रभाव पड़ना स्वभाविक था। सूफी मत पर ईसाई धर्म का भी प्रभाव पड़ा।

ईसाई विचारधारा से प्रभावित होकर सूफी साधक को व्यक्तिगत स्वार्थ में कोई रुचि नहीं थी। उनके हृदय में मानव सेवा का भाव ईसाई धर्म के प्रभाव की ही देन है। ईश्वर पर पूर्ण रूप से आश्रित, भौतिक पदार्थों के प्रति अरुचि भी ईसाई धर्म के प्रभाव के कारण ही है।

अबू अब्दुल्ला अल मुहासिबी नामक सूफी सन्त ने अपने संदेश में बाइबिल के कुछ विषयों का उल्लेख किया है। सूफियों की यौगिक क्रियाओं में हिन्दू संन्यासियों के क्रियाकलापों को ढूँढा जा सकता है।

राईट्स का मत है कि सूफियों में भावाविष्टावस्था को उत्पन्न करने वाली कुछ क्रियायें तथा प्राणायाम जैसी विधियाँ हिन्दू धर्म की ही देन हैं। अधिकांश विद्वान यह स्वीकार करते हैं कि सूफी मत के विकास में भारतीय विचारधारा का प्रभाव पड़ा है।

परंपरा एवं सिद्धांत

सूफी शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम कब और किसके लिए हुआ यह विवादास्पद है। मौलाना जामी के अनुसार सर्वप्रथम सूफी शब्द का प्रयोग कूफा के शेख अबू हाशिम कूफी के लिए प्रयुक्त हुआ। आ0 परशु राम चतुर्वेदी ने भी ‘सूफी काव्य संग्रह’ प्रथम सूफी शेख हाशिम का ही नाम उल्लेखत किया है। इनका मोसल नगर में हुआ था, किंतु वे शाम देश के कूफा नगर में निवास करते थे और मेसोपोटामिया के रमला नामक स्थान में इन्होंने एक खानकाह (मठ) कि स्थापना की थी।

मासिओं ने अबू हाशिम के साथ कूफा में एक कीमियागर ज़ाबिर इब्न हेयान का भी उल्लेख किया है। परन्तु अधिकांश विद्वान जामी के मत से सहमत है शेख अबूर हाशिम यहॉ पर विक्रम की 9वी शताब्दी के आंरभ काल तक वर्तमान रहे। परन्तु; उनके विषय में इससे अधिक कुछ भी ज्ञात नहीं होता, अपितु इतना ही पता चलता है कि तब से लगभग 50 वर्षों के भीतर इस नाम का पूरा प्रचार हो गया और बहुत से व्यक्ति इसके द्वारा अभिहित किये जाने लगे।

सूफी संन्तों में सन्यास जीवन और रहस्यवादी प्रवृति का समन्वय उमैय्या वंश के खलीफाओं के शासन के अन्तिम दिनों दिखायी देता है। अब्बास-वंश के शासन काल का आंरभ हो चुका था। सूफी मत के इतिहास का यह प्रथम युग था, जो हिज़री सन् की दूसरी शताब्दी के अंतिम चरण तक पता चलता रहा और जिसमें वर्तमान समय में कम से कम आधे दर्जन के नाम और संक्षिप्त से परिचय अभी तक सुरक्षित है।

अब्वासी सलीफाओं के शासन के प्रारम्भिक काल में सूफी शब्द का प्रयोग अधिक होने लगा। उस समय सूफी शब्द व्यक्तियों के नाम के साथ सन्तत्व की उपाधि के रूप में जुड़ा रहता था, किन्तु पचास वर्षो के भीतर ही इसका प्रयोग संपूर्ण ईराक के रहस्यवादी साधकों के लिए होने लगा।

भारत में प्रथम सूफी

प्रामाणिक रूप से नहीं कहा जा सकता कि सर्वप्रथम कौन सूफी सन्त भारत में आये पर ऐसी मान्यता है कि सर्वप्रथम भारतवर्ष में मुस्लिम तीर्थ यात्रियों का एक दल शेख बिन मलिक ने नेतृत्व के करडगनोर (मालावबार) में आया और स्थानीय शासक को धर्मोपदेश द्वारा मुमलमान बनाने में सफल हुआ। 16वीं शताब्दी के एक मुसलमान इतिहासकार के अनुसार शेख शरफ बिन मलिक ने मालाबार राज्य को धर्मोपदेश द्वारा मुसलमान बनाने में सफल हुआ। लोगों का यह विश्वास भी है कि यह घटना मुहम्मद साहब के जीवन काल की है। उत्तरी भारत में पहले पहल आने वाले सूफियों में शेख इस्माइल का नाम आता है यह 1005 ई0 में लाहौर आये। इन्होंने बहुत से लोगों की अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करके मुसलमान बनाया। शेख इस्माइल का विद्वानगण भारत के प्रथम सूफी के रूप में मानते है।

भारत में आने वाले प्रारम्भिक सूफ़ियों में सबसे ज्यादा जिनकी प्रसिद्ध हुयी। उनमें सूफी हसन बिन इसमान अलीअल् हुिज्वेरी नाम आत है कहीं-कहीं पर तो इन्हें भारत में आने वाले सर्वप्रथम सूफी के नाम से भी उल्लेखित किया गया है यही इनकी प्रसिद्धी के कारण कहा गया है अल्हुज्विरी अफगानिस्तान देश गजनी नगर के निवासी थे और इस्लाम धर्म के एक बहुत बड़े विद्वान तथा धर्माचार्य थे। इनको दाता गंज बख्श भी कहा जाता है। सूफी मत पर इनकी रचना ‘कश्फुल महजूब’ प्रसिद्ध हैै।

इन्होंने ऐसा लिखा है कि वह कैदी बनाकर वहां लाया गया था। इनकी इस रचना में सूफी मत का विशद् विवेचन प्रस्तुत किया है। अबुल हसन अल्हुज्विरी के शिष्य फज़ल मुहम्मद बिन अलहसन अल्हुिज्वेरी से सूफी मत की शिक्षा ग्रहण की थी। बहुत से सूफ़ियों का वह विश्वास है कि अल्हुज्विरी भारतवर्ष के सन्तों के ऊपर अधिष्ठित है और यद्यपि उनकी मृत्यु हो गयी है फिर भी कोई सन्त बिना उनकी आज्ञा के भारत वर्ष में प्रवेश नहीे करता। सूफी मत के दृष्टिकोण से अल्हुिज्वेरी प्रसिद्ध जुनैद सिद्धांतो का मानने वाले थे और लगभग 60 वर्षो तक वे भ्रमण एवं धर्म प्रचार में लग रहे।

उन्होंने अविवाहित जीवन व्यतीत किया था और उनके मर जाने पर भी उनका नाम एक उच्चकोटि के वली की भॉति सदा आदर तथा सम्मान के साथ लिया जाता रह है। उनकी मृत्यु लाहौर नगर में हुई जहाँ पर उनकी समाधि आज भी वर्तमान है।

मोहम्मद बिन कासिम (711ई0) के सिन्ध व पंजाब विजय से लेकर मेहमूद गजनवी के आक्रमण के दौ सौ वर्ष पश्चात् तक कई सूफी सन्तों, धर्म प्रचारकों के नाम सुनाई देते है यथा-सय्यद नयर शाह, बाबा फरवरअलदीन, शेख, इस्माईल तथा शेख् अल्हुिज्वेरी आदि।

ईसा की 13वीं -14वीं शताब्दी में सूफी सन्तों का भारत देश के लगभग सभी भागों में आगमन हो गया था जैसे- सिन्ध, पंजाब, कश्मीर, दक्षिण भारत, बंगाल, उत्तरी भारत, कच्छ, गुजरात, राजस्थान तथा मालवा।

सूफी सम्प्रदायों की संख्या के बारे में मतभेद है, यों तो 175 तक मानी जाती है। 16वीं शताब्दी में अबुल फज़ल ने ‘‘आइने-अकबरी’’ में प्रचलित 14 सम्प्रदायों का उल्लेख किया है :- हबीबी, तफूरी, कख्र्ाी, सक्तों, जुनैदी, काजरूनी, तूसी, फिरदौसी, जैदी, अयाज़ी, अदहमी, हुबेरी, सहरवर्दी और चिश्ती।

उपरोक्त सम्प्रदायों के अतिरिक्त कादरी, शत्त्ाारी नक्शबन्दी मदारी आदि सम्प्रदायों ने भी भारत के विभिन्न भागों में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। 

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"ज़िद है दुनिया जीतने की" "हटो व्योम के मेघ पंथ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं"
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