अपराध

बालपन से शोषित हुई किंतु टूटी नहीं और खुद की बिगड़ सी गई जिंदगी को बुलंदियों तक खुद ले गई….

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट

मोनालिसा सबसे पहले मार्केटिंग एजेंसी चलाती थीं, उस कंपनी का टर्नओवर 30 करोड़ था। उसके बाद उन्होंने वेलनेस को लेकर अपनी एक नई कंपनी बनाई। इसके जरिए ये अकेलेपन, घरेलू हिंसा, कॉर्पोरेट टॉर्चर… जैसी चीजों को लेकर लोगों में अवेयरनेस फैलाती हैं। वर्कशॉप ऑर्गेनाइज करती हैं। काउंसलिंग भी करती हैं। इसके अलावा भी इनकी एक कंपनी है।

पिछले 30 साल से मोनालिसा दिल्ली के साकेत में रह रही हैं। यहीं पर मैं उनसे मिलने आया हूं। मोनालिसा बताती हैं, ‘पापा की मौत के वक्त हम लोग बस्तर में ही रहते थे। मैं तो एक साल की थी। एक बच्चे के लिए बाप का प्यार कैसा होता है, मैं हमेशा उस प्यार के लिए तरसती रही। मां ने ही हम सब को अकेले पाला-पोसा।

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मां की शादी 15 साल की उम्र में हो गई थी। हालांकि, शादी के बाद उन्होंने पढ़ाई पूरी की। जब पापा दुनिया से चले गए तो मां ने सरकारी नौकरी के लिए अप्लाय किया। उस वक्त आसानी से नौकरी मिल जाती थी। उन्हें भी मिल गई। मुझे याद है- मां मुझे और मेरे भाई को कमरे में बंद करके ऑफिस जाती थीं। बहन की शादी हो चुकी थी।’

बचपन की बातें सुनाते-सुनाते मोनालिसा के होंठ कांपने लगते हैं। वो ठहर जाती हैं। थोड़ा रुककर कहती हैं, ‘किसी का एक बार रेप-बलात्कार होता होगा, मेरे साथ तो 5 साल की उम्र से लेकर 17 साल की उम्र तक न जाने कितनी बार, कितने लोगों ने गलत किया। इसमें मेरे अपने भी थे।

साल मुझे याद नहीं। इंदिरा गांधी की सरकार थी। देश में रिफ्यूजियों के एक बड़े जत्थे को अलग-अलग जगहों पर बसाने की कवायद चल रही थी। मेरे पापा की कई बार सरकारी नौकरी लगी, लेकिन उन पर बिजनेस करने का भूत सवार था।

इस बीच पापा को रिफ्यूजियों को बसाने का काम मिला। उस समय हम लोग बस्तर में रहते थे। यहां हर तरफ जंगल ही जंगल था। ऐसे में आबादी को बसने-बसाने का काम चैलेंजिंग था। इस इलाके में कोई सुख-सुविधा नहीं थी। मेडिकल-एजुकेशन फैसिलिटी भी नहीं।

इसी जंगल के बीच एक रोज अचानक पापा बीमार हो गए। घर पर मां थी और हम तीन छोटे-छोटे बच्चे। हॉस्पिटल कई कोस दूर था। जब तक मां कुछ कर पातीं, पापा हम सब को अकेला छोड़ चले गए। पापा की जब मौत हुई मैं महज एक साल की थी।’

मोनालिसा कहती हैं, ‘जिंदगी में इतने उतार-चढ़ाव देख लिए हैं कि मेरा कलेजा अब पत्थर का हो चुका है। लंबे संघर्ष के बाद आज एक सफल बिजनेसवुमन हूं, बस इसी बात की खुशी है।’

मोनालिसा कहती हैं, ‘मां तो ऑफिस चली जाती थीं। वो आसपास रहने वाले एक शख्स जिन्हें वो भाई बोलती थीं, उन्हें मेरा ध्यान रखने के लिए बोल जाती थीं। उनके ऑफिस जाने के बाद बगल में रहने वाले वो मामा मेरे घर पर रहते थे।

मुझे आज भी पूरी तरह से याद है कि वो मेरे साथ गलत करते थे। मैं असहज महसूस करती थी। जब मां आतीं, उन्हें बताती, तो यही कहतीं- हर रोज तुम नई-नई कहानी बनाती रहती हो।

एक बार तो हद ही हो गई। मेरे घर के आसपास घना जंगल था। वो मुंहबोला मामा मुझे बीच जंगल में लेकर गया। उसने मेरा रेप किया। जब ये बात आसपास के इलाकों में फैली, मां के कानों में पहुंची, तब जाकर मां को यकीन हुआ कि मेरे साथ गलत हो रहा था।

केस-मुकदमा हुआ, कोर्ट-कचहरी का चक्कर। मैं तब 9-10 साल की थी। तारीख पर कोर्ट जाना पड़ता था। मुझे कटघरे में स्टूल रखकर खड़ा कराया जाता था।

मैं हमेशा सोचती रहती थी कि मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है। आज की तरह उस वक्त कोई पॉक्सो एक्ट या सिस्टम नहीं था। पॉक्सो एक्ट 2012 में आया।’

आसपास के लोग, मां… सब यही कहते थे कि मेरी इज्जत चली गई। मैं बहुत ज्यादा समझ नहीं पाती थी। मां का कहना था कि कुछ भी हो जाए रहना तो इन्हीं लोगों के बीच है। ऐसे में ज्यादा विरोध नहीं कर सकते। इस सिचुएशन में मैं खुद को कमरे में बंद करके रहने लगी।

इस दौरान एक ही चीज अच्छी हुई कि हमारे घर में किताबें बहुत थीं। मेरी उन किताबों से दोस्ती हो गई। अलग-अलग तरह की किताबें पढ़ने लगी। शुरू में तो मुझे डॉक्टर बनना था। शायद मन में रहा होगा कि पापा को यदि समय पर मेडिकल फैसिलिटी मिल गई होती, तो वो हमारे बीच होते, लेकिन…।’

लेकिन… क्या?

‘मेरी बड़ी बहन को पहला बच्चा हुआ था। वो मुझसे 14 साल बड़ी हैं। मेरी उम्र तकरीबन 16 साल रही होगी। मेरे जीजाजी ने मुझे जमशेदपुर बुला लिया। मां ने सीधा कहा- वहीं जाओ, बच्चे की देखभाल करना और थोड़ा-बहुत पढ़ लेना।

दरअसल, मैं घर में सबसे छोटी थी। मां हमेशा यही चाहती थी कि एक बेटा और एक बेटी हो। मैं तीसरी थी, तो शायद उन्हें लगता था कि मैं तो अनचाही हूं। मेरी तो घर में जरूरत थी ही नहीं। मां बात-बात पर ये ताना देती भी थीं।

गुस्से में झल्लाकर यहां तक कह देती थीं- तुम्हें कौन लाने गया था। न्योता देने गया था। तुम तो बिना बुलाए आई हो। तुम नहीं होती, तो कितना अच्छा होता। ये बात भी मेरे दिमाग में हमेशा खटकती रहती थी। इस वजह से मैं खुद में कुछ करने की इच्छा जगाती रही।’

दरअसल जमशेदपुर में जब मैं अपनी बहन के यहां गई, तो वहां जीजा मेरे साथ गलत करते थे। ये बात मेरी बहन को पता थी, फिर भी वो कुछ नहीं बोलती थी।’

वहां आप पढ़ाई कर रही थीं?

‘हां। जिस स्कूल में मेरा एडमिशन हुआ, वहां साइंस नहीं था। मजबूरी में कॉमर्स लेकर पढ़ना पड़ा। 12वीं खत्म होते ही, मां ने कहा- अब मेरी जिम्मेदारी खत्म। तुम्हारी शादी कर देती हूं। जो भी करना हो, पढ़ना-लिखना हो, शादी के बाद करना। मेरी उम्र महज साढ़े 17 साल थी। बहन ने स्टूडियो में ले जाकर मेरी एक तस्वीर लड़के वालों के घर भेजने के लिए क्लिक करवा दी।

मेरे लिए उन लोगों ने एक रिश्ता देख रखा था। लड़का आर्मी में था, उसकी उम्र 34 साल थी। यह सब जानकर मैं कांपने लगी कि 17 साल की लड़की 34 साल का लड़का। मतलब दोगुनी उम्र के लड़के से मैं शादी करूं। किसी को समझाने का कोई फायदा नहीं था। हार कर मैंने घर से भागने का फैसला कर लिया।’

भागकर दिल्ली आ गईं?

‘हां। मेरे पास 2 हजार रुपए थे। मैं भागकर दिल्ली आ गई। ये 1994 की बात है। एक जानने वाले के यहां 15 दिन रही। उसके बाद उसने कहा- बहुत हो गया। अपना बोरिया-बिस्तर बांधो और दफा हो जाओ।

बड़ी मुश्किल से मैंने एक नौकरी ढूंढी। बरसाती में रहने लगी। इसी बीच मैंने शादी कर ली। लड़का घर के पास का ही था। उस वक्त मुझे लगा कि जिंदगी में जो एक मर्द की कमी रही है बाप के रूप में, अब वो पति के रूप में पूरी हो सकती है।

किस्मत का खेल देखिए कि ये शादी महज 6 साल चली। पति शराब का आदी हो चुका था। दिन-रात बस शराब। तंग आकर मुझे अलग होना पड़ा।’

‘मैंने दो शादी की। दोनों ही बार पति चुनने को लेकर मेरा जो फैसला था, वो गलत साबित हुआ।

दूसरी शादी तो 17 साल तक चली। हमारा अच्छा-खासा बिजनेस हो चुका था। ये शादी मैंने एक क्लाइंट से ही की थी। बिजनेस के सिलसिले में हम नजदीक आते चले गए। शादी के बाद मुझे एक बेटी हुई।

5 साल के लिए मैंने बिजनेस से ब्रेक ले लिया, इसी बीच फिर से सब खत्म…। दूसरा पति भी शराब, नशे का आदी हो चुका था। पहले पति ने तो कभी मार-पिटाई नहीं की। दूसरे ने तो सारी हद पार कर दी।

मुझे याद है- जब उसका गुस्सा बढ़ता तो चिल्लाते-लड़ते वह मेरे पूरे कपड़े फाड़ देता था। एक बार तो मेरे गोद में बेटी थी। शराब के नशे में धुत, उसने मुझे गाड़ी से उठाकर बाहर फेंक दिया। मैं खून से रंग गई।

बेटी बड़ी हो रही थी। वह लगातार इन चीजों को देखती रही, एक दिन उसने कहा- मां या तो मैं घर से चली जाती हूं, या आप इस शादी से अलग हो जाओ।

बेटी की बातों को सुनने के बाद मैंने डिवोर्स लेने का फैसला किया। उस वक्त मैंने यह नियति मान ली थी। अब लगता है कि मेरी सोच कितनी गलत थी। अब मैं ज्यादा खुश हूं।’

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"कलम हमेशा लिखती हैं इतिहास क्रांति के नारों का, कलमकार की कलम ख़रीदे सत्ता की औकात नहीं.."

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