
लखनऊ में सरकारी ज़मीनों की खुली लूट
आज के दौर में जब शासन पारदर्शिता और ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ की बात करता है, उसी दौर में राजधानी के ग्रामीण इलाकों से यह आरोप उठना कि सरकारी ऊसर, बंजर, नवीनपरती, चारागाह और चकरोड जैसी सार्वजनिक भूमि को योजनाबद्ध ढंग से हड़प लिया गया—व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है। अख़बारों और सोशल मीडिया पर रोज़ाना उभरती भूमाफिया और खनन माफिया से जुड़ी खबरें अब किसी अपवाद की तरह नहीं, बल्कि एक स्थायी सच की तरह सामने आ रही हैं।
सरोजिनी नगर तहसील: जहाँ सरकारी ज़मीन निजी प्लॉट में बदल दी गई
सरोजिनी नगर तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्रामीण क्षेत्रों—नीवा, खटोला, वीवीपुर, खसरवारा, पहाड़पुर, मकदूमपुर, भदरसा, नटकुर, बंथरा, उम्मेदखेड़ा, खाडेदेव और नरेरा—से ग्रामीणों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। ग्रामीणों के अनुसार ग्राम प्रधानों, क्षेत्रीय लेखपालों, प्रॉपर्टी डीलरों, खनन माफियाओं और कुछ पुलिस अधिकारियों की आपसी सांठगांठ से सैकड़ों बीघा सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा किया गया।
आरोप है कि जिस भूमि का उपयोग पशुचारण, सार्वजनिक रास्तों और तालाबों के रूप में होना चाहिए था, उसे या तो मिट्टी पाटकर प्लॉटिंग में बदल दिया गया या फिर पोकलेन मशीनों से खुदाई कर कृत्रिम तालाब बना दिए गए। यह सब कुछ कथित रूप से राजस्व अभिलेखों में हेरफेर और कूटरचित दस्तावेज़ों के सहारे किया गया। उदाहरण के रूप में देख जा सकता है कि,
पुश्तैनी जमीन पर कब्जा
चंद्रावल के लक्ष्मण खेड़ा में विधवा विमलेश की पुश्तैनी जमीन पर फर्जी तरीके से कब्जा दिखाकर बिना डीएम की अनुमति के जमीन बेची गई। इस जमीन पर पेट्रोल पंप बनाने का काम शुरू कर दिया गया है। इसी इलाके के सुनील कुमार की पुश्तैनी जमीन पर भी फर्जी कब्जा दिखाकर तहसील कर्मियों ने अवैध पट्टा जारी किया।
डीएम और डीसीपी तक शिकायत
बेहसा के संतोष कुमार रावत, सुमन और मृगनयनी की जमीनों पर भी तहसील, नगर निगम लेखपाल और स्थानीय पुलिस की मदद से भूमाफिया अवैध कब्जा कर रहे हैं। पीड़ितों ने बताया कि उन्होंने सरोजनी नगर एसडीएम, डीएम और डीसीपी तक शिकायत की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
खनन माफिया का तांडव: बंजर ज़मीन से ‘अवैध तालाब’ तक
ग्रामीणों का कहना है कि खनन माफियाओं ने बंजर और ऊसर भूमि को निशाना बनाया। दिन-रात पोकलेन मशीनें चलती रहीं, मिट्टी निकाली गई और उसे आसपास के तालाबों में भर दिया गया। परिणामस्वरूप न केवल पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ा, बल्कि सरकारी भूमि की पहचान ही मिटा दी गई। इसके बाद उसी भूमि को निजी भू-खंडों के रूप में बेच दिया गया।
यह पूरा खेल इतना संगठित बताया जा रहा है कि बिना स्थानीय प्रशासन की मौन सहमति के इसका संभव होना कठिन प्रतीत होता है। सवाल यह नहीं है कि यह सब कैसे हुआ, बल्कि यह है कि इतने बड़े पैमाने पर हुए इस कथित घोटाले को रोकने वाला कौन था—और वह क्यों चुप रहा।
शिकायतें, समाधान दिवस और ‘ठंडा बस्ता’
सूत्रों के अनुसार, ग्रामीणों ने तहसील सरोजिनी नगर के समाधान दिवस में सैकड़ों बार लिखित शिकायतें दर्ज कराईं। इन शिकायतों में खसरा–खतौनी, नक्शे और ज़मीनी साक्ष्यों का हवाला दिया गया, लेकिन नतीजा शून्य रहा। उल्टा, शिकायत करने वाले परिवारों को ही दबंगों के कोप का शिकार होना पड़ा।
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें डराया-धमकाया गया, चुप रहने की नसीहत दी गई और पुलिस–प्रशासन के चक्कर काटने को मजबूर किया गया। न्याय की उम्मीद लेकर जब वे अधिकारियों के पास पहुँचे, तो उन्हें ही संदिग्ध नज़र से देखा गया।
मुख्यमंत्री तक पहुँची शिकायत, फिर भी सन्नाटा
ग्रामीणों ने हिम्मत जुटाकर 22 दिसंबर 2025 को मुख्यमंत्री कार्यालय और जिलाधिकारी लखनऊ को ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में भूमाफियाओं के नाम, स्थान और कथित अनियमितताओं का उल्लेख किया गया। लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी उस शिकायत पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब शासन की शीर्ष कुर्सी पर बैठे योगी आदित्यनाथ स्वयं भूमाफियाओं और माफिया संस्कृति के खिलाफ सख्त बयान देते रहे हैं। ज़मीनी हकीकत इन बयानों से मेल क्यों नहीं खा रही—यह सवाल अब आम जनमानस पूछ रहा है।
प्रशासनिक संरक्षण या राजनीतिक पहुंच?
ग्रामीणों का दावा है कि जिन लोगों पर सरकारी भूमि हड़पने का आरोप है, उनकी ऊँची राजनीतिक और प्रशासनिक पहुँच है। क्षेत्रीय नेताओं का संरक्षण और अधिकारियों की मिलीभगत के कारण अरबों रुपये की सरकारी संपत्ति निजी हाथों में चली गई। इसके बावजूद आज तक किसी बड़े अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति पर निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई।
यह केवल भूमि का मामला नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे का सवाल है, जो आम नागरिक शासन-प्रशासन पर करता है। जब राज्य अपनी ही संपत्ति नहीं बचा पा रहा, तो आम आदमी अपनी ज़मीन, अपने अधिकार और अपनी सुरक्षा के लिए किसके पास जाए?
जनता के मन में उठते सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने ग्रामीण इलाकों में सरकार के प्रति निराशा और असंतोष को जन्म दिया है। लोग खुलकर कहने लगे हैं कि भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि सख्त निर्देश भी कागज़ों तक सीमित रह जाते हैं। अधिकारी खुलेआम आदेशों की अनदेखी करते हुए दिखाई देते हैं, और इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है।
यह रिपोर्ट खनन माफियाओं और भूमाफियाओं के कारनामों का केवल एक उदाहरण है। सवाल यह है कि क्या इस पर कोई ठोस और निष्पक्ष जांच होगी, या फिर यह भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबी रह जाएगी।
जनता के सवाल, व्यवस्था के जवाब
सरोजिनी नगर क्षेत्र में किस प्रकार की सरकारी भूमि पर कब्जे का आरोप है?
आरोप है कि ऊसर, बंजर, नवीनपरती, चारागाह, चकरोड और तालाब जैसी सरकारी भूमि को अवैध रूप से प्लॉटिंग और खनन के जरिए निजी संपत्ति में बदला गया।
ग्रामीणों ने शिकायत कहाँ-कहाँ दर्ज कराई?
ग्रामीणों ने तहसील समाधान दिवस, जिलाधिकारी लखनऊ और मुख्यमंत्री कार्यालय तक लिखित व ऑनलाइन शिकायतें दर्ज कराई हैं।
अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
ग्रामीणों के अनुसार प्रशासनिक संरक्षण, राजनीतिक पहुंच और अधिकारियों की मिलीभगत के कारण शिकायतें ठंडे बस्ते में पड़ी हैं।
इस मामले में आगे क्या अपेक्षा की जा रही है?
ग्रामीण निष्पक्ष जांच, दोषियों पर सख्त कार्रवाई और सरकारी भूमि की पुनः बहाली की मांग कर रहे हैं।










