सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था: आलोचना और भरोसे के बीच खड़ा चित्रकूट
स्वास्थ्य और सुरक्षा पर उठते गंभीर सवालों की पहली परत चित्रकूट की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ती है। जिला चिकित्सालय से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आज भी ग्रामीण और शहरी गरीब आबादी की पहली और आख़िरी उम्मीद बने हुए हैं। चाहे आर्थिक रूप से कमजोर परिवार हो या मध्यम वर्ग, बीमारी की स्थिति में सबसे पहले रुख सरकारी अस्पतालों की ओर ही किया जाता है।
यह अलग बात है कि चिकित्सकों की कमी, विशेषज्ञ इलाज की अनुपलब्धता और कुछ गंभीर बीमारियों के लिए संसाधनों का अभाव अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। परिणामस्वरूप कई बार मरीजों को प्रयागराज, सतना या झांसी जैसे दूरस्थ शहरों की ओर रुख करना पड़ता है। यही वह बिंदु है, जहां से स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल खड़े होते हैं।
सोशल मीडिया का शोर और ज़मीनी सच्चाई का अंतर
स्वास्थ्य और सुरक्षा पर उठते गंभीर सवाल अक्सर सोशल मीडिया पर तीखे रूप में सामने आते हैं। दवाओं की कमी, डॉक्टरों की अनुपस्थिति या अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही जैसे आरोप तेजी से वायरल होते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इन मंचों पर शोर मचाने वालों में से बहुत कम लोग ग्रामीण गरीबों की वास्तविक पीड़ा को समझने या उनकी आवाज़ बनने का प्रयास करते हैं।
गांवों में रहने वाला आम नागरिक आज भी सरकारी अस्पताल को निजी अस्पतालों की तुलना में अधिक सुरक्षित मानता है। कारण स्पष्ट है—निजी अस्पतालों में इलाज की लागत इतनी अधिक है कि गरीब परिवार अक्सर इलाज शुरू होने से पहले ही हार मान लेता है। कई मामलों में आर्थिक अभाव ही जीवन और मृत्यु के बीच की सबसे बड़ी दीवार बन जाता है।
निजी अस्पताल बनाम सरकारी व्यवस्था: गरीब की मजबूरी
स्वास्थ्य और सुरक्षा पर उठते गंभीर सवाल तब और गहरे हो जाते हैं, जब निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर नज़र जाती है। इलाज के नाम पर भारी भरकम बिल, अनावश्यक जांच और भर्ती की मजबूरी—ये सभी बातें गरीब परिवार के लिए किसी सजा से कम नहीं होतीं। ऐसे में सरकारी अस्पताल, तमाम कमियों के बावजूद, गरीब के लिए जीवनरेखा बने रहते हैं।

यह विडंबना ही है कि जिन सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर सबसे ज्यादा निर्भरता है, उन्हीं पर सबसे अधिक अविश्वास भी जताया जाता है। आलोचना आवश्यक है, लेकिन ज़मीनी हकीकत से कटकर की गई आलोचना व्यवस्था को सुधारने के बजाय उसे कमजोर ही करती है।
पुलिस प्रशासन की भूमिका: सवाल क्यों, भरोसा कैसे?
स्वास्थ्य और सुरक्षा पर उठते गंभीर सवालों का दूसरा बड़ा स्तंभ पुलिस प्रशासन है। किसी भी समाज में पुलिस की भूमिका केवल कानून लागू करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह सामाजिक संतुलन की रीढ़ होती है। चित्रकूट में भी पुलिस की आवश्यकता हर दौर में रही है और आगे भी रहेगी।
यह सच है कि पुलिस की कार्यशैली पर आरोप-प्रत्यारोप कभी खत्म नहीं होते। चाहे पूर्ववर्ती सरकारें रही हों या वर्तमान शासन, पुलिस हमेशा आलोचना के केंद्र में रही है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि जैसा समाज होता है, वैसी ही उसकी संस्थाएं भी बनती हैं।
उपेंद्र प्रताप सिंह का उदाहरण और आरोपों की राजनीति
स्वास्थ्य और सुरक्षा पर उठते गंभीर सवालों के बीच कुछ उदाहरण विचारणीय हैं। सदर कोतवाली कर्वी में प्रभारी निरीक्षक रहे उपेंद्र प्रताप सिंह का कार्यकाल आम जनता के साथ बेहतर तालमेल के लिए जाना गया। लगभग डेढ़ वर्ष से अधिक समय तक उनकी कार्यशैली को सराहा गया।
लेकिन जैसे ही उन्होंने थाना भरतकूप का कार्यभार संभाला, कुछ ही लोगों द्वारा उन पर गंभीर आरोप लगाए जाने लगे। अवैध गतिविधियों में संलिप्तता से लेकर उच्च अधिकारियों की नज़दीकी जैसे दावे सामने आए। जबकि ज़मीनी हकीकत यह रही कि जहां-जहां उनकी तैनाती रही, वहां कानून व्यवस्था को लेकर संतुलित और अनुशासित दृष्टिकोण देखने को मिला।
पुलिस का कठिन कर्तव्य और अदृश्य संघर्ष
स्वास्थ्य और सुरक्षा पर उठते गंभीर सवाल उठाने वालों को यह भी देखना चाहिए कि पुलिस किन परिस्थितियों में काम करती है। कड़ाके की ठंड, मूसलाधार बारिश और चिलचिलाती धूप—हर मौसम में पुलिसकर्मी जनता की सुरक्षा में डटे रहते हैं। न उन्हें मौसम की चिंता होती है, न निजी असुविधाओं की।
यह स्वीकार करना होगा कि हर विभाग में कुछ भ्रष्ट तत्व हो सकते हैं, लेकिन कुछ लोगों की गलतियों के आधार पर पूरी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करना सामाजिक संतुलन के लिए घातक हो सकता है।
दस्यु विहीन चित्रकूट: पुलिस की सबसे बड़ी उपलब्धि
स्वास्थ्य और सुरक्षा पर उठते गंभीर सवालों के बीच चित्रकूट की एक बड़ी उपलब्धि को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। दशकों तक पठारी और तटीय इलाकों में दस्युओं का आतंक रहा। शाम ढलते ही लोग घरों में कैद हो जाया करते थे।
सरकारी नीतियों और पुलिस प्रशासन की निरंतर कार्रवाई के चलते आज चित्रकूट दस्यु-विहीन जिला बन चुका है। दिन हो या रात, लोग अब बिना भय के यात्रा कर रहे हैं। यह बदलाव पुलिस की रणनीति और साहसिक प्रयासों का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
पत्रकारिता और पुलिस: निर्भरता का अनकहा रिश्ता
जिले में सैकड़ों पत्रकार कार्यरत हैं, जो विकास, भ्रष्टाचार और माफियाओं के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं। जब ये पत्रकार सुनसान इलाकों में कवरेज के लिए निकलते हैं, तो उन्हें सबसे अधिक भरोसा पुलिस प्रशासन पर ही होता है।
इसके बावजूद पुलिस पर लगातार सवाल उठना यह दर्शाता है कि हम आलोचना तो करते हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई को समझने का धैर्य नहीं रखते।
2026 की दहलीज़ पर उम्मीद और ज़िम्मेदारी
स्वास्थ्य और सुरक्षा पर उठते गंभीर सवालों के बीच नया वर्ष 2026 दस्तक देने जा रहा है। आम जनमानस को उम्मीद है कि यह वर्ष स्वास्थ्य सेवाओं, सुरक्षा व्यवस्था और रोज़गार के अवसरों में सकारात्मक बदलाव लाएगा।
समाज का चौथा स्तंभ, प्रशासन, पुलिस और जनप्रतिनिधि—सबसे यह अपेक्षा की जा रही है कि नए वर्ष में ज़मीनी हकीकत को समझते हुए निर्णय लिए जाएंगे, ताकि भरोसा और व्यवस्था दोनों मजबूत हो सकें।
सवाल–जवाब
स्वास्थ्य और सुरक्षा पर उठते गंभीर सवाल क्यों महत्वपूर्ण हैं?
क्योंकि ये सवाल सीधे आम नागरिक के जीवन, भरोसे और मूलभूत अधिकारों से जुड़े होते हैं।
क्या सरकारी अस्पताल आज भी गरीबों की पहली पसंद हैं?
हाँ, निजी अस्पतालों की महंगी सेवाओं के कारण सरकारी अस्पताल आज भी गरीबों की मुख्य आशा हैं।
पुलिस पर आरोप लगते रहने से समाज पर क्या असर पड़ता है?
लगातार अविश्वास से पुलिस और समाज के बीच तालमेल कमजोर होता है, जो अंततः सामाजिक सुरक्षा को प्रभावित करता है।










