दिव्यांग कोटे से नौकरी का मामला इस्तीफा, जांच और कानून के बीच फंसा अयोध्या का जीएसटी अधिकारी

दिव्यांग कोटे से नौकरी के मामले में अयोध्या के जीएसटी अधिकारी इस्तीफे से जुड़ा दस्तावेज दिखाते हुए

चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट
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दिव्यांग कोटे से नौकरी का मामला एक बार फिर प्रशासनिक ईमानदारी, संवैधानिक मूल्यों और जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है। अयोध्या में तैनात रहे जीएसटी विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी से जुड़ा यह प्रकरण अब केवल व्यक्तिगत आरोपों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह उस व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करता है जहां इस्तीफा, जांच से बचने का संभावित माध्यम बनता दिखाई दे रहा है। इस मामले में दिव्यांग प्रमाणपत्र, री-मेडिकल जांच, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और विभागीय निष्क्रियता—सब एक ही धागे में बंधे नज़र आते हैं।

दिव्यांग कोटे से नियुक्ति और उठते सवाल

दिव्यांग कोटे से नौकरी का मामला इसलिए संवेदनशील माना जाता है क्योंकि यह कोटा समाज के उन वर्गों के लिए बनाया गया है, जिन्हें शारीरिक अक्षमता के कारण अवसरों की दौड़ में पीछे रहना पड़ता है। आरोप है कि संबंधित अधिकारी को इसी कोटे के अंतर्गत सरकारी सेवा मिली, लेकिन बाद में उनके दिव्यांगता प्रमाणपत्र की सत्यता पर गंभीर सवाल उठे। यदि यह प्रमाणपत्र वास्तविक नहीं पाया जाता है, तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि उन वास्तविक दिव्यांग अभ्यर्थियों के अधिकारों का भी हनन है, जिनके लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी।

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जांच की शुरुआत और तीन साल से अधिक का ठहराव

प्रशासनिक रिकॉर्ड के अनुसार, दिव्यांग कोटे से नौकरी के इस मामले में 28 सितंबर 2021 से जांच चल रही है। जांच के दौरान कई बार संबंधित अधिकारी को री-मेडिकल एग्ज़ामिनेशन के लिए बुलाया गया, लेकिन आरोप है कि वह एक बार भी जांच के लिए उपस्थित नहीं हुए। यह तथ्य अपने आप में सवाल खड़ा करता है कि यदि दिव्यांगता वास्तविक है, तो पुनः परीक्षण से बचने की आवश्यकता क्यों पड़ी। इससे जांच की निष्पक्षता और गंभीरता पर भी प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं।

इस्तीफा और जांच से बचने का आरोप

मामले में नया मोड़ तब आया जब संबंधित अधिकारी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस इस्तीफे को लेकर उनके ही परिजनों द्वारा यह आरोप सामने आया कि यदि इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया, तो न केवल विभागीय जांच स्वतः समाप्त हो जाएगी, बल्कि किसी भी प्रकार की वित्तीय या प्रशासनिक रिकवरी की संभावना भी समाप्त हो जाएगी। इस दावे ने पूरे मामले को और अधिक गंभीर बना दिया है, क्योंकि यह संकेत देता है कि इस्तीफा यहां नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक कवच के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का 2016 का महत्वपूर्ण निर्णय

दिव्यांग कोटे से नौकरी के मामले में सुप्रीम कोर्ट का 2016 का एक महत्वपूर्ण निर्णय अक्सर उद्धृत किया जा रहा है। इस निर्णय में स्पष्ट कहा गया था कि यदि आंख या कान से संबंधित विकलांगता संदिग्ध पाई जाती है, तो संबंधित व्यक्ति का री-मेडिकल एग्ज़ामिनेशन अनिवार्य रूप से कराया जाना चाहिए। इस फैसले का उद्देश्य दिव्यांगता के नाम पर होने वाले संभावित दुरुपयोग को रोकना और व्यवस्था की पारदर्शिता बनाए रखना था। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब सर्वोच्च न्यायालय का स्पष्ट निर्देश मौजूद है, तो इस मामले में उसका पालन क्यों नहीं किया गया।

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प्रशासनिक चुप्पी और जवाबदेही का संकट

इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक पहलू प्रशासनिक चुप्पी है। न तो अब तक जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए गए हैं और न ही यह स्पष्ट किया गया है कि री-मेडिकल जांच में अनुपस्थित रहने पर क्या कार्रवाई की गई। यह चुप्पी केवल एक अधिकारी को नहीं बचाती, बल्कि पूरे सिस्टम की साख को कमजोर करती है। जब आम नागरिक यह देखता है कि वर्षों तक जांच लंबित रहती है और स्पष्ट निर्देशों के बावजूद निर्णय नहीं लिए जाते, तो व्यवस्था पर भरोसा डगमगाने लगता है।

दिव्यांग अधिकार बनाम फर्जीवाड़े की बहस

दिव्यांग कोटे से नौकरी का मामला एक दोहरी बहस को जन्म देता है। एक ओर राज्य की जिम्मेदारी है कि वह वास्तविक दिव्यांग व्यक्तियों को समान अवसर प्रदान करे, वहीं दूसरी ओर फर्जीवाड़े की संभावना पूरी व्यवस्था को संदेह के घेरे में ले आती है। यदि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई नहीं की जाती, तो इसका खामियाजा उन हजारों वास्तविक दिव्यांग अभ्यर्थियों को भुगतना पड़ता है, जिनके लिए यह कोटा जीवन बदलने का साधन होता है।

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क्या यह सिर्फ एक अधिकारी का मामला है?

सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या दिव्यांग कोटे से नौकरी का यह मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित है या फिर यह उस सिस्टम की खामी को उजागर करता है, जिसमें जांच को वर्षों तक लटकाया जा सकता है और इस्तीफा देकर जवाबदेही से बचा जा सकता है। यदि यह दूसरा सच है, तो यह प्रकरण केवल अयोध्या या जीएसटी विभाग तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे के लिए एक चेतावनी है।

निष्कर्ष: कानून, नैतिकता और विश्वास की परीक्षा

दिव्यांग कोटे से नौकरी का मामला यह स्पष्ट करता है कि कानून केवल पुस्तकों में लिखे शब्दों से नहीं चलता, बल्कि उसके क्रियान्वयन की इच्छाशक्ति से चलता है। अब यह शासन और प्रशासन पर निर्भर करता है कि वह इस प्रकरण को एक उदाहरण बनाता है या इसे भी फाइलों के ढेर में दबा देता है। क्योंकि इसी से तय होगा कि भविष्य में नियमों का सम्मान होगा या फिर नियमों के भीतर छिपा “गणितीय खेल” चलता रहेगा।

गोंडा के झंझरी विकासखंड में आयोजित उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस समारोह में मुख्य अतिथि और जिला प्रशासन के अधिकारी मंच पर उपस्थित
गोंडा जनपद के झंझरी विकासखंड स्थित वेंकटाचार क्लब में उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस समारोह के दौरान मंच पर मौजूद जनप्रतिनिधि और जिला प्रशासन के अधिकारी।

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