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स्मार्ट मीटर को बिजली व्यवस्था में पारदर्शिता और सुधार का औज़ार बताया गया था। दावा था कि इससे खपत का सही हिसाब मिलेगा और उपभोक्ता को राहत मिलेगी। लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसकी तस्वीर अलग दिख रही है। सीमित संसाधनों में जीवन गुज़ारने वाले ग्रामीण उपभोक्ताओं के लिए यह तकनीक राहत नहीं, बल्कि बढ़ते बिल और जवाबहीन व्यवस्था का कारण बनती जा रही है। यही विरोधाभास इस दस्तावेजी रिपोर्ट की पड़ताल का केंद्र है।
उत्तर प्रदेश सरकार और बिजली विभाग ने प्रदेश में बिजली व्यवस्था को “आधुनिक, पारदर्शी और उपभोक्ता–हितैषी” बनाने के उद्देश्य से स्मार्ट मीटर लगाने की योजना को तेज़ी से लागू किया। दावा किया गया कि इससे न केवल बिजली चोरी पर अंकुश लगेगा, बल्कि उपभोक्ताओं को सटीक रीडिंग, समय पर बिल और डिजिटल भुगतान की सुविधा भी मिलेगी।
हालिया खबर में उल्लेख है कि लगभग 100 गावों के करीब तीन लाख उपभोक्ताओं को विद्युत आपूर्ति/राहत योजनाओं के अंतर्गत लाभ दिया जाना है—जिससे संकेत मिलता है कि जिलास्तर पर कुल उपभोक्ता की संख्या लाखों में है।
लेकिन बलरामपुर जिले के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों से सामने आ रही तस्वीर इन दावों के बिल्कुल उलट है। यहां स्मार्ट मीटर उपभोक्ताओं के लिए राहत कम और परेशानी का कारण ज़्यादा बनते दिखाई दे रहे हैं।
यह रिपोर्ट उसी ज़मीनी हकीकत का दस्तावेज़ है—जहां तकनीक के नाम पर जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ा, शिकायतों पर विभाग खामोश रहा और भरोसे की जगह डर ने ले ली।
स्मार्ट मीटर: उद्देश्य और सरकारी दावा
स्मार्ट मीटर को बिजली सुधार की रीढ़ बताया गया। विभाग के अनुसार: मैनुअल रीडिंग से छुटकारा, वास्तविक समय (रियल टाइम) में खपत की जानकारी, गलत बिलिंग की संभावना खत्म, उपभोक्ता को मोबाइल/एसएमएस से सूचना, लाइन लॉस और चोरी पर नियंत्रण।
इन दावों के साथ जिले के कई क्षेत्रों—खासकर ग्रामीण इलाकों—में स्मार्ट मीटर लगाए गए। उपभोक्ताओं को बताया गया कि इससे बिल कम होगा, क्योंकि “जितनी खपत, उतना ही भुगतान” का सिद्धांत लागू होगा।
ज़मीनी सच्चाई: बिल बढ़ा, भरोसा घटा
बलरामपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद बिजली बिल असामान्य रूप से बढ़ गया है।
ग्रामीण उपभोक्ताओं का कहना है कि— वे सर्दियों में केवल 2–3 बल्ब, कभी–कभार टीवी या मोबाइल चार्जर का ही उपयोग करते हैं न ही हीटर, न गीजर, न एसी जैसे भारी उपकरण। इसके बावजूद 1,200 से 2,500 रुपये तक के बिल आ रहे हैं। यह बढ़ोतरी सिर्फ एक–दो घरों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई गांवों में यही हाल है।
सर्दियों में कम खपत, फिर भी ज़्यादा बिल—कैसे?
ग्रामीण इलाकों में सर्दियों के मौसम में बिजली की खपत सामान्यतः न्यूनतम होती है। खेतों में सिंचाई कम, पंखे बंद, कूलर–फ्रिज सीमित उपयोग में—फिर भी बिल कई गुना बढ़ जाना कई सवाल खड़े करता है: क्या स्मार्ट मीटर की रीडिंग सही है? क्या मीटर में तकनीकी गड़बड़ी है? क्या मीटर की कैलिब्रेशन सही ढंग से की गई? क्या उपभोक्ता को खपत समझने की जानकारी दी गई? इन सवालों का जवाब न तो विभाग के पास है, न उपभोक्ताओं को कोई स्पष्ट सूचना।
शिकायतों पर विभाग की “मौन नीति”
सबसे गंभीर पहलू यह है कि शिकायत करने पर भी उपभोक्ताओं को कोई ठोस राहत नहीं मिल रही। ग्रामीणों का आरोप है कि— बिजली उपकेंद्र या कार्यालय जाने पर टालमटोल, “मीटर सही है” कहकर मामला बंद कर दिया जाता है। लिखित शिकायत का कोई जवाब नहीं दिया जाता। हेल्पलाइन या ऑनलाइन पोर्टल पर भी समाधान नहीं सिर्फ विभाग की दुरुस्त नीति की बात सुना दी जाती है।
कई उपभोक्ताओं का कहना है कि उन्हें उलटे डराया गया— “बिल नहीं भरोगे तो कनेक्शन कट जाएगा।” यह स्थिति उपभोक्ताओं के मनोबल को पूरी तरह तोड़ रही है।
आर्थिक दबाव: गरीब और मध्यम वर्ग सबसे ज़्यादा प्रभावित
बलरामपुर जैसे जिले में बड़ी आबादी— खेती, मजदूरी, छोटे व्यापार, दैनिक कमाई पर निर्भर है। ऐसे परिवारों के लिए 2,000 रुपये का बिजली बिल केवल एक बिल नहीं, बल्कि—राशन में कटौती, बच्चों की पढ़ाई पर असर, कर्ज़ लेने की मजबूरी का कारण बन जाता है।
स्मार्ट मीटर, जो “सुविधा” के नाम पर लगाया गया था, अब उनके लिए डर का मीटर बन चुका है।
पारदर्शिता का दावा, जानकारी का अभाव
स्मार्ट मीटर की सबसे बड़ी खासियत बताई गई—“उपभोक्ता खुद अपनी खपत देख सकता है।” लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि— अधिकांश ग्रामीण उपभोक्ताओं को यह नहीं बताया गया कि मीटर कैसे पढ़ें? मोबाइल ऐप या एसएमएस सुविधा के बारे में जानकारी नहीं, डिजिटल साक्षरता का अभाव, भाषा और तकनीकी जटिलता, ऐसे में पारदर्शिता का दावा सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह गया।
क्या स्मार्ट मीटर निजी कंपनियों के लिए फायदेमंद?
कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और उपभोक्ता संगठनों का सवाल है कि— स्मार्ट मीटर की आपूर्ति और रखरखाव निजी कंपनियों के ज़रिए भुगतान मॉडल उपभोक्ता–विरोधी बनकर रह गया है। बिलिंग सिस्टम पर उपभोक्ता का नियंत्रण शून्य के बराबर रह गया है।
ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि यह व्यवस्था जनता से ज़्यादा कंपनियों के हित में डिज़ाइन की गई है।
विभाग की जिम्मेदारी और जवाबदेही
बिजली आपूर्ति की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड और उससे जुड़े वितरण निगमों की है। लेकिन सवाल यह है— क्या स्मार्ट मीटर लगाने से पहले उपभोक्ताओं को भरोसे में लिया गया? क्या ट्रायल या टेस्टिंग की गई? क्या शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था बनाई गई? यदि नहीं, तो इसका खामियाज़ा जनता क्यों भुगते?
सामाजिक असर : तकनीक से डरता ग्रामीण समाज
इस पूरे घटनाक्रम का एक गहरा सामाजिक प्रभाव भी है। ग्रामीण समाज, जो पहले से ही— ऑनलाइन सिस्टम, डिजिटल भुगतान, तकनीकी शब्दावली से असहज है, अब बिजली जैसी बुनियादी सेवा में भी खुद को असहाय महसूस कर रहा है। यह तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि डिजिटल बहिष्करण की स्थिति पैदा कर रहा है।
सुविधा की मंशा, संकट की वास्तविकता
बलरामपुर में स्मार्ट मीटर का अनुभव यह संकेत देता है कि— तकनीक को बिना संवाद लागू किया गया। आंकड़ों की पारदर्शिता नहीं रखी गई और उपभोक्ता को प्रणाली के सामने अकेला छोड़ दिया गया।
स्मार्ट मीटर अपने आप में गलत नहीं हैं, लेकिन कमज़ोर क्रियान्वयन और असंवेदनशील व्यवस्था ने उन्हें ग्रामीण उपभोक्ताओं के लिए संकट का कारण बना दिया है।
जब तक— रीडिंग की स्वतंत्र जांच, गलत बिल पर तत्काल सुधार, ग्रामीण–अनुकूल शिकायत व्यवस्था और सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक यह कहा जाना अनुचित नहीं होगा कि बलरामपुर में स्मार्ट मीटर सुविधा कम और आर्थिक दबाव ज़्यादा बनकर उभरे हैं।
पाठकों के सवाल
क्या स्मार्ट मीटर अपने आप में गलत तकनीक है?
नहीं, लेकिन इसके क्रियान्वयन, निगरानी और शिकायत निवारण की व्यवस्था कमजोर मानी जा रही है।
ग्रामीण उपभोक्ताओं के बिल अचानक क्यों बढ़े?
उपभोक्ताओं का आरोप है कि खपत में बदलाव न होने के बावजूद यूनिट रीडिंग असामान्य रूप से बढ़ गई।
क्या गलत बिल की जांच की कोई स्वतंत्र व्यवस्था है?
फिलहाल ऐसी किसी स्वतंत्र और पारदर्शी व्यवस्था की जानकारी उपभोक्ताओं को नहीं दी गई है।
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