फाल्गुन का महीना आते ही उत्तर प्रदेश के अनेक नगर रंगों और परंपराओं से भर उठते हैं। किंतु इस बार कुछ प्रमुख धार्मिक-सांस्कृतिक स्थलों पर होली की तस्वीर बदली हुई दिखाई दे रही है। बाराबंकी के देवा से लेकर काशी और अयोध्या तक, परंपरा और परिवर्तन के बीच संतुलन साधने की कोशिश स्पष्ट दिख रही है।
देवा की मजार पर 120 वर्ष पुरानी परंपरा पर विराम की आशंका
बाराबंकी के देवा स्थित सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की मजार पर होली खेलने की परंपरा लगभग 120 वर्षों से चली आ रही है। बताया जाता है कि स्वयं हाजी साहब ने अपने जीवनकाल में इस परंपरा की शुरुआत की थी। वर्ष 1905 में उनके देह त्याग के बाद भी यह आयोजन निरंतर चलता रहा। पिछले चार दशकों से सहजादे आलम वारसी इसकी जिम्मेदारी निभाते रहे हैं।
गुरुवार को सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो में 62 वर्षीय सहजादे आलम वारसी ने उम्र और स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए आयोजन की जिम्मेदारी आगे किसी युवा को सौंपने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि परिवर्तन समय का नियम है और यदि नई कमिटी गठित होती है तो वे उसका मार्गदर्शन करेंगे।
इस बीच कस्बे के हिंदू समुदाय ने देवा नगर के पुरोहित अवध किशोर को अध्यक्ष बनाते हुए देवा होलिकोत्सव समिति का गठन किया है। अवध किशोर के अनुसार पुरानी कमिटी के साथ बैठक के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा। यह स्थिति परंपरा के निरंतरता और नेतृत्व परिवर्तन के बीच संतुलन का संकेत देती है।
काशी में मसाने की होली सीमित दायरे में
वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर रंगभरी एकादशी के अगले दिन चिता भस्म से खेली जाने वाली मसाने की होली विश्वविख्यात है। परंतु इस बार इस आयोजन पर सुरक्षा और व्यवस्थागत कारणों से ग्रहण की आशंका है।
काशी विद्वत परिषद, केंद्रीय ब्राह्मण महासभा और डोम राजा ने आयोजन को लेकर आपत्ति जताई है। वहीं पुलिस-प्रशासन ने घाट पर चल रहे निर्माण कार्य और सीमित स्थान को देखते हुए केवल परंपरा के निर्वाह तक सीमित रखने पर सहमति दी है।
एसीपी डॉ. अतुल अंजान त्रिपाठी के अनुसार घाट पर सरियों और निर्माण सामग्री के कारण भीड़ नियंत्रण संभव नहीं है। ऐसे में 15-20 लोगों को ही पारंपरिक रूप से आयोजन की अनुमति दी जाएगी। पूर्व में इस आयोजन में 25 हजार से अधिक लोग शामिल होते थे, जिससे अंतिम संस्कार कार्य में बाधा और अव्यवस्था की शिकायतें मिलती थीं।
अयोध्या में रंगभरी एकादशी से शुरुआत
अयोध्या में फाल्गुन शुक्लपक्ष की एकादशी से रंगभरी होली का आरंभ हो रहा है। हनुमानगढ़ी में नागा साधुओं की टोली बजरंग बली के साथ रंग-गुलाल से होली खेलेगी। इसके पश्चात पंचकोसी परिक्रमा क्षेत्र के मंदिरों में साधु-संतों को होली का आमंत्रण दिया जाएगा।
राम मंदिर में एकादशी के दिन केवल रामलला को टीका लगाया जाएगा, जबकि होली के दिन फूलों से उत्सव मनाया जाएगा। यहाँ परंपरा का निर्वाह व्यवस्थित और चरणबद्ध ढंग से किया जा रहा है।
परंपरा बनाम परिवर्तन
देवा, काशी और अयोध्या की तीनों तस्वीरें एक व्यापक प्रश्न की ओर संकेत करती हैं—क्या परंपराएँ समय के साथ स्वयं को ढाल रही हैं? देवा में नेतृत्व परिवर्तन का प्रश्न है, काशी में सुरक्षा और स्थान की सीमा, जबकि अयोध्या में नियंत्रित और व्यवस्थित आयोजन।
यह स्पष्ट है कि परंपरा स्थिर नहीं होती; वह समय, समाज और परिस्थितियों के साथ अपना स्वरूप बदलती है। इस वर्ष की होली संभवतः इस परिवर्तनशीलता की साक्षी बनेगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
देवा की मजार पर होली की परंपरा कब से है?
लगभग 120 वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है।
काशी में मसाने की होली सीमित क्यों की गई?
निर्माण कार्य और सुरक्षा कारणों से भीड़ नियंत्रण को देखते हुए आयोजन सीमित किया गया है।
अयोध्या में रंगभरी होली कब से शुरू होती है?
फाल्गुन शुक्लपक्ष की एकादशी से रंगभरी होली का आरंभ होता है।
