विकास की सड़कों पर ठहरता जीवन : जहाँ इलाज और पहुँच अब भी एक संघर्ष हैं

चित्रकूट के सुदूरवर्ती गांव में खराब सड़क पर बीमार बुज़ुर्ग को पीठ पर ले जाती महिला, पीछे फंसी एम्बुलेंस और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र

रिपोर्ट: संजय सिंह राणा
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बुंदेलखंड का चित्रकूट ज़िला वर्ष 2025 में एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है, जहाँ विकास के सरकारी आँकड़े और ज़मीनी अनुभव आमने-सामने खड़े हैं। यहाँ सड़क और स्वास्थ्य महज़ विभागीय विषय नहीं हैं, बल्कि यह तय करते हैं कि कोई गाँव मुख्यधारा से जुड़ा रहेगा या धीरे-धीरे सामाजिक सुख-सुविधाओं से बाहर होता चला जाएगा। यह रिपोर्ट किसी योजना की प्रशंसा या किसी विभाग की आलोचना भर नहीं है, बल्कि उन परिस्थितियों का दस्तावेज़ है, जिनमें चित्रकूट की जनता जी रही है।

सड़कें: काग़ज़ पर प्रगति, ज़मीन पर अस्थिरता

वर्ष 2025 में चित्रकूट ज़िले में सड़क निर्माण और मरम्मत के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, लोक निर्माण विभाग और ग्रामीण अभियंत्रण सेवा के माध्यम से लगभग 180 से 220 करोड़ रुपये के बीच बजट स्वीकृत होने का उल्लेख सरकारी रिकॉर्ड में मिलता है। इन योजनाओं के अंतर्गत लगभग 160 से 190 किलोमीटर नई सड़कों के निर्माण या उन्नयन तथा 120 से 150 किलोमीटर पुरानी सड़कों की मरम्मत का दावा किया गया।

हालाँकि, यह आँकड़े तभी तक आश्वस्त करते हैं, जब तक मानसून के बाद सुदूरवर्ती इलाकों की ओर न देखा जाए। मानिकपुर, राजापुर और कर्वी ब्लॉक के पहाड़ी और वनवर्ती क्षेत्रों में सड़कें केवल डामर की परत नहीं होतीं, बल्कि वे भूगोल से निरंतर संघर्ष करती संरचनाएँ होती हैं। बरसात के बाद कई स्थानों पर नई बनी सड़कों के हिस्से उखड़ते या धँसते दिखाई दिए। पंचायत स्तर की शिकायत पुस्तिकाओं के अनुसार, नई बनी सड़कों के लगभग 20–25 प्रतिशत हिस्सों में पैचवर्क की आवश्यकता पड़ी, जबकि मरम्मत किए गए मार्गों में लगभग 30 प्रतिशत हिस्से पुनः क्षतिग्रस्त हुए।

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बरगढ़–सेमरा मार्ग इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। काग़ज़ों में इस मार्ग पर छह किलोमीटर से अधिक की मरम्मत दर्ज है, लेकिन वास्तविकता यह रही कि तीन किलोमीटर क्षेत्र में जलभराव और कटाव के कारण आवागमन बाधित रहा। इसका सीधा असर एम्बुलेंस और आवश्यक सेवाओं पर पड़ा, जहाँ पहले 35–40 मिनट में तय होने वाला सफ़र 75–90 मिनट तक पहुँच गया।

सड़क की कमी और सामाजिक दूरी

चित्रकूट में सड़क की समस्या केवल यातायात तक सीमित नहीं रहती। ज़िले की अनुमानित 20 से 25 प्रतिशत आबादी आज भी ऐसे गाँवों में निवास करती है, जहाँ हर मौसम में चलने योग्य सड़क उपलब्ध नहीं है। ऐसे क्षेत्रों में स्कूलों की उपस्थिति घटती है, साप्ताहिक बाज़ार प्रभावित होते हैं और लोगों का रोज़गार अस्थिर होता है। धीरे-धीरे ये गाँव सामाजिक और आर्थिक प्रवाह से कटने लगते हैं, जिसे केवल ‘अविकास’ नहीं, बल्कि ‘सामाजिक दूरी’ कहा जाना चाहिए।

स्वास्थ्य: इमारतें हैं, लेकिन समय नहीं

वर्ष 2025 में चित्रकूट का स्वास्थ्य ढांचा काग़ज़ पर व्यवस्थित दिखाई देता है। ज़िले में एक जिला अस्पताल, कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, दो दर्जन से अधिक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सैकड़ों उप-स्वास्थ्य केंद्र दर्ज हैं। इस वर्ष कुछ केंद्रों में भवन मरम्मत, पानी-बिजली की व्यवस्था और सीमित उपकरणों की उपलब्धता भी दिखाई गई।

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चित्रकूट से उठते असहज सवाल

लेकिन वास्तविक चुनौती इमारतों की नहीं, बल्कि कार्यशीलता की है। सुदूरवर्ती क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अक्सर प्राथमिक उपचार और रेफरल तक सीमित रह जाते हैं। स्वीकृत पदों की तुलना में लगभग 30 से 40 प्रतिशत तक चिकित्सकों की कमी बनी हुई है। विशेषज्ञ डॉक्टरों—विशेषकर स्त्री रोग और एनेस्थीसिया से जुड़े पद—अक्सर रिक्त रहते हैं, जिससे जटिल मामलों में स्थानीय निर्णय संभव नहीं हो पाता।

मानिकपुर और राजापुर जैसे इलाकों से जिला अस्पताल तक पहुँचने में सड़क की स्थिति और एम्बुलेंस की सीमित उपलब्धता के कारण ढाई से तीन घंटे तक का समय लग जाता है। चिकित्सा विज्ञान में जिसे ‘गोल्डन आवर’ कहा जाता है, वह समय कई मामलों में रास्ते में ही समाप्त हो जाता है। इसका सबसे अधिक असर गर्भवती महिलाओं, बुज़ुर्गों और गंभीर रोगियों पर पड़ता है।

जांच, रेफरल और आशा कार्यकर्ता

स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी जांच सुविधाओं की अनियमितता है। कई प्राथमिक और सामुदायिक केंद्रों में एक्स-रे या अल्ट्रासाउंड जैसी मूलभूत सुविधाएँ या तो नियमित नहीं हैं, या तकनीकी और मानव संसाधन की कमी से ठप रहती हैं। परिणामस्वरूप बीमारी का सही आकलन समय पर नहीं हो पाता।

इस पूरी व्यवस्था को संभालने का भार आशा और एएनएम कार्यकर्ताओं पर आ जाता है। एक-एक कार्यकर्ता पर आबादी का बोझ मानकों से कहीं अधिक है। इसके बावजूद प्रोत्साहन भुगतान में देरी और प्रशासनिक जटिलताओं के कारण उनका मनोबल प्रभावित होता है, जबकि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ यही कार्यकर्ता हैं।

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सड़क और स्वास्थ्य: एक ही संकट के दो पहलू

चित्रकूट में सड़क और स्वास्थ्य को अलग-अलग विषयों की तरह देखना वास्तविकता से मुँह मोड़ना होगा। खराब सड़कें स्वास्थ्य संकट को गहरा करती हैं और कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था सड़क की हर कमी को जीवन-घातक बना देती है। जब इलाज तक पहुँचने में पूरा दिन लग जाए, तो बीमारी केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाती, बल्कि परिवार और समाज की समस्या बन जाती है।

निष्कर्ष: समीक्षा नहीं, ज़मीनी दस्तावेज़

वर्ष 2025 का चित्रकूट यह स्पष्ट करता है कि विकास की असली कसौटी नई योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि पहले से मौजूद ढांचे की टिकाऊ कार्यशीलता है। यह लेख समीक्षा नहीं, बल्कि एक दस्तावेज़ है—जो दर्ज करता है कि चित्रकूट में सड़क और स्वास्थ्य के मोर्चे पर क्या हुआ, और उससे अधिक यह कि क्या अब भी अधूरा है।

पाठकों के सवाल – ज़मीनी जवाब

क्या 2025 में चित्रकूट की सड़कें बेहतर हुईं?

काग़ज़ों में सड़क निर्माण और मरम्मत हुई, लेकिन मानसून के बाद कई सुदूरवर्ती इलाकों में सड़कें अस्थिर रहीं।

स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे बड़ी समस्या क्या रही?

डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी तथा समय पर जांच और रेफरल की व्यवस्था का अभाव।

सबसे अधिक प्रभावित कौन रहा?

सुदूरवर्ती गाँवों की महिलाएँ, बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएँ और दैनिक मज़दूरी पर निर्भर परिवार।

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