नदियों में मातम का उफान : पहाड़ों पर बारिश तेज और तबाही का बढ़ता खतरा

तेज बहाव वाली नदी पर लकड़ी के पुल से गुजरते लोग

अंजनी कुमार त्रिपाठी की रिपोर्ट

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नदियों में मातम का उफान और पहाड़ों पर बारिश तेज : आपदा की जड़ें

उत्तर भारत में इन दिनों नदियों में मातम का उफान और पहाड़ों पर बारिश तेज जैसी प्राकृतिक घटनाएं सिर्फ समाचार की सुर्खियां नहीं हैं, बल्कि लाखों लोगों की जिंदगी और आजीविका को प्रभावित कर रही हैं। तेज बारिश ने पहाड़ों से लेकर मैदानों तक तबाही मचाई है।

इस भीषण आपदा के पीछे कई वैज्ञानिक कारण हैं। एक ओर पश्चिमी विक्षोभ और दक्षिण-पश्चिमी मानसून का टकराव है, वहीं दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी में वायुदाब की असामान्य स्थिति। यही वजह है कि इस बार की बारिश तूफानी और घातक साबित हो रही है।

जलवायु परिवर्तन : पहाड़ों पर बारिश तेज होने का बड़ा कारण

जलवायु वैज्ञानिक मानते हैं कि हिमालयी क्षेत्रों का बढ़ता तापमान इस संकट का मूल कारण है।

पहले 4000 मीटर की ऊंचाई पर बारिश लगभग न के बराबर होती थी।

अब बढ़ते तापमान के कारण बादल ऊंचाई पर जमने लगे हैं और वहां भी जोरदार बारिश होने लगी है।

वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, तापमान में 1 डिग्री की वृद्धि से बादल 8% ज्यादा पानी जमा कर लेते हैं।

यानी हर बार तापमान बढ़ने पर बरसात का पैमाना भी बढ़ता जा रहा है। यही वजह है कि पहाड़ों पर बारिश तेज और खतरनाक बनती जा रही है, जिससे नदियों में अचानक मातम का उफान दिखाई देता है।

धराली की तबाही और बादल फटने की गलतफहमी

धराली की त्रासदी अभी तक लोगों की यादों में ताजा है। उस वक्त समाचारों में लिखा गया कि वहां बादल फटा, लेकिन वास्तविकता अलग थी।

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वहां लंबे समय तक जरूरत से ज्यादा बारिश हुई।

हिमनदों के बर्फीले हिस्से अतिसंतृप्त हो गए।

मोरेन (प्राकृतिक बर्फ-और-मिट्टी की दीवारें) टूट गईं।

इसके बाद पानी तेजी से नीचे की ओर बह निकला और तबाही मच गई।

भारी बारिश के बाद बाढ़ में डूबी झुग्गियां और सड़कें
पहाड़ों पर बारिश तेज होने से निचले इलाकों की बस्तियां जलमग्न।

अगर सटीक पूर्वानुमान लगाया जाता तो कई जानें बचाई जा सकती थीं। यही वह जगह है जहां हमारी व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आती है।

नदियों में मातम का उफान : पूर्वानुमान प्रणाली की कमजोरियां

भारतीय मौसम विभाग (IMD) और केंद्रीय जल आयोग जैसी संस्थाएं मौसम और बाढ़ पूर्वानुमान का दावा तो करती हैं, लेकिन उनकी कार्यक्षमता अभी भी कमजोर है।

डॉप्लर वेदर राडार केवल 500 किलोमीटर के दायरे तक का अनुमान लगाते हैं।

किसी खास जगह की सटीक भविष्यवाणी कर पाना मुश्किल है।

सैटेलाइट भी हिमालयी क्षेत्रों में बादलों के कारण सही डेटा नहीं दे पाते।

इसलिए नदियों में मातम का उफान जैसी घटनाओं को पहले से रोकना लगभग असंभव हो जाता है।

तकनीक और आधुनिक उपकरणों की कमी

हिमालय जैसे नाजुक इलाकों में अभी तक पर्याप्त आधुनिक उपकरण मौजूद नहीं हैं।

बांधों और ग्लेशियर झीलों की वास्तविक समय की जानकारी नहीं मिलती।

बेसिनों में पानी का स्तर लगातार मॉनिटर नहीं किया जाता।

अर्ली वॉर्निंग सिस्टम कमजोर है।

हालांकि सरकार 10 हजार करोड़ खर्च करके नई तकनीक और राडार लगाने की योजना बना रही है। दावा है कि यह सिस्टम दुनिया के सबसे उन्नत सिस्टम में शामिल होगा। लेकिन सवाल वही है: आखिर यह कब तक होगा?

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मानवजनित कारण : विकास के नाम पर विनाश

पहाड़ों पर बारिश तेज होने से तो खतरा है ही, लेकिन इंसानी गतिविधियों ने इसे कई गुना बढ़ा दिया है।

सड़क निर्माण के लिए जंगल काटे गए।

नदियों के कछारों को पाट दिया गया।

जल निकासी मार्ग बंद हो गए।

चारधाम परियोजना जैसे कामों ने नदियों और घाटियों को और असुरक्षित बना दिया।

धराली और बद्रीनाथ जैसे क्षेत्रों में स्थानीय लोगों ने बार-बार चेतावनी दी थी, लेकिन उनकी अनसुनी की गई। इसका नतीजा यह निकला कि जब नदियों में मातम का उफान आया, तो सैकड़ों जिंदगियां बह गईं।

स्थानीय लोगों की भागीदारी का महत्व

एनडीएमसी के दिशानिर्देश कहते हैं कि किसी भी निर्माण या आपदा प्रबंधन में स्थानीय लोगों की भागीदारी जरूरी है।

स्थानीय लोग नदी और पहाड़ों के स्वभाव को अधिकारियों से ज्यादा समझते हैं।

वे बता सकते हैं कि कौन-सा क्षेत्र सुरक्षित है और कौन-सा नहीं।

धराली की त्रासदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां ग्रामीणों ने पहले ही चेताया था।

यानी राडार और सर्वे के साथ-साथ स्थानीय ज्ञान को भी महत्व देना जरूरी है।

मैदानी इलाकों में असर: खेतों और शहरों की तबाही

नदियों में मातम का उफान सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता। इसका असर मैदानों तक दिखाई देता है।

पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में हजारों एकड़ फसलें डूब जाती हैं।

पुल, सड़कें और स्कूल बर्बाद हो जाते हैं।

लोगों का विस्थापन होता है।

दुकानों और कारोबार पर ताले लग जाते हैं।

शहरों की हालत भी खराब है। दिल्ली का उदाहरण लें—यहां 100 से ज्यादा तालाब थे, जिन्हें पाटकर मॉल और सड़कें बना दी गईं। यही कारण है कि अब थोड़ी सी बारिश में भी दिल्ली जलमग्न हो जाती है।

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न्यायपालिका और प्रशासन की लापरवाही

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) और सुप्रीम कोर्ट ने कई बार प्रशासन को फटकार लगाई।

दिल्ली के यमुना प्लेन पर अवैध निर्माण का मामला हो या

सिक्किम की तीस्ता नदी पर हादसा,

हर बार चेतावनी दी गई, लेकिन जमीन पर सुधार नहीं हुआ। नतीजा यह है कि पहाड़ों पर बारिश तेज होते ही मैदानों और शहरों में बाढ़ जैसी स्थिति बन जाती है।

समाधान: टिकाऊ और समावेशी विकास

अगर सच में नदियों में मातम का उफान जैसी त्रासदियों से बचना है, तो हमें विकास की परिभाषा बदलनी होगी।

संवेदनशील इलाकों में बड़े प्रोजेक्ट रोकने होंगे।

टिकाऊ विकास को प्राथमिकता देनी होगी।

भूवैज्ञानिक और जलविज्ञान से जुड़े स्वतंत्र अध्ययन कराने होंगे।

संवेदनशील क्षेत्रों का नक्शा सार्वजनिक करना होगा ताकि लोग खुद भी सावधान रह सकें।

अर्ली वॉर्निंग सिस्टम को उन्नत करना होगा।

नदियों में मातम का उफान रोकने के लिए नीयत और सक्रियता जरूरी

नदियों में मातम का उफान और पहाड़ों पर बारिश तेज दोनों ही प्राकृतिक और मानवजनित कारणों का परिणाम हैं। जलवायु परिवर्तन, प्रशासनिक लापरवाही, तकनीकी कमी और असंवेदनशील विकास ने मिलकर इसे और भयावह बना दिया है।

आपदा चाहे पहाड़ पर हो या शहर पर, असर हमेशा अर्थव्यवस्था और समाज पर पड़ता है। इसलिए जरूरत है:

सही पूर्वानुमान तकनीक की,

स्थानीय लोगों की भागीदारी की,

और टिकाऊ विकास की।

अगर हमने समय रहते कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में नदियों में मातम का उफान और भी खतरनाक रूप ले सकता है।

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