मंदाकिनी नदी… वही नदी, जिसके तट पर आस्था जन्म लेती है, आज सवालों के बीच कराह रही है।
नोटिस जारी हुए, शिकायतें हुईं—फिर भी अवैध निर्माण क्यों खड़े हैं? क्या यह लापरवाही है या मिलीभगत? चित्रकूट की जीवनदायिनी पर यह रिपोर्ट उन सवालों को सामने लाती है, जिन्हें अब और टाला नहीं जा सकता।
चित्रकूट की पहचान केवल एक धार्मिक-पर्यटन स्थल के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति, प्राकृतिक विरासत और लोक-आस्था के साझा केंद्र के रूप में रही है। इसी पहचान की धुरी है मां मंदाकिनी नदी—जिसके तट पर आस्था, जीवन और इतिहास एक-दूसरे से संवाद करते हैं। किंतु आज वही जीवनदायिनी नदी अपने विस्तारित क्षेत्र में अवैध कब्ज़ों, अनियंत्रित निर्माण और प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण कराहती दिखाई देती है। यह रिपोर्ट उन्हीं तथ्यों, घटनाक्रमों और सवालों का दस्तावेज़ी विश्लेषण है, जिनका उल्लेख जन-आवाज़ में सामने आया है।
आस्था बनाम अतिक्रमण: टकराव की जड़ें
मंदाकिनी नदी का विस्तारित क्षेत्र केवल जल-धारा नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, बाढ़-नियंत्रण और सामाजिक जीवन का आधार है। नियम स्पष्ट हैं—नदी-तट, बफर ज़ोन और विस्तारित क्षेत्र में निर्माण प्रतिबंधित या कड़े नियमन के अधीन होता है। इसके बावजूद, आरोप है कि भू-माफियाओं ने योजनाबद्ध ढंग से अवैध कब्ज़े कर आवासीय और व्यावसायिक ढांचे खड़े किए। यह केवल भूमि का प्रश्न नहीं; यह नदी के प्रवाह, जल-गुणवत्ता, जैव-विविधता और धार्मिक आस्था पर सीधा प्रहार है।
नोटिस, पत्राचार और ‘अधूरी कार्रवाई’ का सच
उपलब्ध तथ्यों के अनुसार, चित्रकूट विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण द्वारा पूर्व में अवैध निर्माणों को लेकर नोटिस जारी किए गए। इतना ही नहीं, प्राधिकरण के सचिव स्तर से सदर कोतवाली कर्वी के प्रभारी निरीक्षक को शिकायती पत्र भी भेजा गया—ताकि विधिसम्मत कार्रवाई आगे बढ़े।
यहाँ प्रश्न उठता है:
यदि नोटिस जारी हुए और शिकायतें दर्ज हुईं, तो ध्वस्तीकरण/सीलिंग जैसी निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं दिखी?
क्या प्रक्रियात्मक जटिलताओं के नाम पर समय खींचा गया, या प्रभावशाली दबाव ने कदम रोक दिए?
हौसले कैसे बुलंद हुए?
रिपोर्टेड घटनाक्रम बताता है कि कार्रवाई में देरी ने दबंगों के हौसले बढ़ाए। आरोप यह भी हैं कि शासन-निर्देशों की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हुए निर्माण जारी रहा। यह परिदृश्य एक प्रशासनिक संदेश देता है—यदि नियमों का उल्लंघन करके भी दंड न मिले, तो अवैध गतिविधियाँ सामान्यीकृत हो जाती हैं। यह स्थिति न केवल नदी-क्षेत्र में, बल्कि जिला मुख्यालय के स्टेशन रोड जैसे शहरी इलाकों में भी देखी गई—जहाँ मकान और व्यावसायिक इमारतें नियमों की अनदेखी के साथ खड़ी होने के आरोप हैं।
भय का माहौल और संस्थागत दबाव
सबसे चिंताजनक आरोपों में से एक है—प्राधिकरण के अवर अभियंता को फर्जी मुकदमे में फँसाने की धमकी। यदि तकनीकी अधिकारियों पर ऐसा दबाव बनता है, तो नियमन की रीढ़ कमजोर होती है। हालांकि, यह भी दर्ज है कि पूर्व जिलाधिकारी ने एक समय कठोर कार्रवाई करते हुए अवैध निर्माणाधीन बिल्डिंग गिरवाई थी। यह उदाहरण बताता है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति हो, तो नियम लागू हो सकते हैं—परंतु निरंतरता क्यों टूटी?
‘अनदेखी’ या ‘मिलीभगत’—बड़ा सवाल
जन-चर्चा का केंद्रीय प्रश्न यही है कि क्या यह अनदेखी है—जहाँ फाइलें, नोटिस और पत्राचार के बीच कार्रवाई दम तोड़ देती है? या फिर मिलीभगत—जहाँ प्रभाव, आर्थिक हित और सत्ता-समीकरण नियमों पर भारी पड़ते हैं? दस्तावेज़ी दृष्टि से, किसी निष्कर्ष पर पहुँचना जांच का विषय है; किंतु कार्रवाई के अभाव में संदेह स्वाभाविक रूप से गहराता है।
पर्यावरणीय प्रभाव: जो दिखता नहीं, पर भुगतना पड़ता है
अवैध निर्माण नदी के प्राकृतिक फ्लड-प्लेन को संकुचित करता है। नतीजा— बरसात में जल-स्तर का असामान्य बढ़ाव, तट-क्षरण और गाद जमाव, जल-गुणवत्ता में गिरावट, धार्मिक घाटों की क्षति, यह प्रभाव धीरे-धीरे सामने आता है, लेकिन दीर्घकाल में जन-जीवन पर भारी पड़ता है।
20 जनवरी 2026: नागरिक हस्तक्षेप की घड़ी
उद्धृत सूचना के अनुसार, 20 जनवरी 2026 को वरिष्ठ पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपने जा रहे हैं—मांग स्पष्ट है: मंदाकिनी के विस्तारित क्षेत्र में अवैध निर्माण ध्वस्त हों, दोषियों पर कानूनी कार्रवाई हो, भविष्य में रोकथाम के लिए स्थायी तंत्र बने। इसी क्रम में, सुबह मां मंदाकिनी के तट पर प्रणाम और फिर कलेक्ट्रेट जाकर ज्ञापन—यह प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि संवैधानिक और नागरिक अधिकारों के तहत किया जा रहा हस्तक्षेप है।
जन-अपील: आस्था की रक्षा, नियमों के साथ
आम जनमानस से अपील है कि वे नदी-रक्षा के लिए तट पर पहुँचकर शांतिपूर्ण ढंग से आवाज़ उठाएँ। यह आंदोलन किसी व्यक्ति-विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि नियमों के अनुपालन और सार्वजनिक संसाधन की रक्षा के लिए है। आस्था का संरक्षण तभी सार्थक है, जब वह पर्यावरण और कानून—दोनों के साथ चले।
प्रशासन के सामने कार्यसूची
तत्काल संयुक्त सर्वे, टाइम-बाउंड कार्रवाई, डिजिटल ट्रैकिंग, अधिकारी-सुरक्षा, स्थायी बफर ज़ोन और नागरिक भागीदारी—ये वे कदम हैं जिनसे स्थिति बदली जा सकती है।
नदी बचेगी तो शहर बचेगा
मंदाकिनी केवल जल-धारा नहीं—वह चित्रकूट की आत्मा है। अवैध कब्ज़े इस आत्मा पर आघात हैं। अतीत की एक सख़्त कार्रवाई यह प्रमाण है कि नियम लागू हो सकते हैं; आज ज़रूरत है निरंतरता, पारदर्शिता और राजनीतिक-प्रशासनिक इच्छाशक्ति की। यदि अब भी देर हुई, तो सवाल केवल नदी का नहीं रहेगा—यह शासन-विश्वसनीयता और सामाजिक भविष्य का प्रश्न बन जाएगा।
संदर्भित नागरिक पहल
इस अभियान में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता प्रशासन के समक्ष वही मांग रख रहे हैं, जो किसी भी लोकतंत्र की बुनियाद है—कानून का राज। मां मंदाकिनी की पुकार केवल भावनात्मक नहीं; यह कानूनी, पर्यावरणीय और नैतिक पुकार है। अब सुनना सरकार और प्रशासन पर है—और समय, बहुत कम।
