बालाजी मंदिर काम्यवन में श्रीमद्भागवत कथा — शुकदेव–परीक्षित संवाद से मोक्ष का संदेश

बालाजी मंदिर काम्यवन में फूलों से सुसज्जित श्रीराम स्वरूप, भागवत सप्ताह कथा के दौरान भक्तिमय श्रृंगार।

हिमांशु मोदी की रिपोर्ट
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काम्यवन स्थित प्राचीन बालाजी मंदिर परिसर में चल रही श्रीमद्भागवत सप्ताह कथा के दूसरे दिन बुधवार को श्रद्धा, भक्ति और वैराग्य से ओतप्रोत वातावरण देखने को मिला। कथा व्यास पंडित विनोद शर्मा जी ने श्रोताओं को शुकदेव जी के जन्म, राजा परीक्षित के जीवन प्रसंग तथा शुकदेव–परीक्षित संवाद की मार्मिक और शिक्षाप्रद कथा सुनाई। कथा के दौरान यह स्पष्ट संदेश उभरकर सामने आया कि कलियुग में प्रभु का नाम-स्मरण, भागवत कथा श्रवण और सत्संग ही मानव जीवन के कल्याण का सुनिश्चित मार्ग है।

शुकदेव–राजा परीक्षित संवाद: अहंकार से आत्मबोध तक

कथा व्यास ने विस्तार से वर्णन किया कि एक बार धर्मराजा परीक्षित वन भ्रमण के लिए गए। भ्रमण के दौरान उन्हें तीव्र प्यास लगी। उसी समय उन्होंने समीप ही समीक ऋषि को समाधिस्थ अवस्था में तपस्या करते देखा। राजा ने उनसे जल की याचना की, किंतु समाधिस्थ होने के कारण ऋषि उत्तर नहीं दे सके। उस क्षण कलियुग के प्रभाववश राजा परीक्षित के मन में यह भाव उत्पन्न हुआ कि साधु ने उनका अपमान किया है।

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एक क्षण का आवेग और सात दिन का विधान

आवेग में आकर राजा परीक्षित ने पास ही पड़े एक मृत सर्प को उठाकर समीक ऋषि के गले में डाल दिया। यह दृश्य वहीं खेल रहे बालकों ने देख लिया और जाकर ऋषि पुत्र को इसकी सूचना दी। क्रोध में आकर ऋषि पुत्र ने शाप दिया कि सातवें दिन तक्षक नामक सर्प राजा परीक्षित को दंश देकर भस्म कर देगा। यह प्रसंग यह दर्शाता है कि क्रोध और अहंकार किस प्रकार बड़े से बड़े धर्मात्मा को भी पतन की ओर ले जा सकता है।

समीक ऋषि का पश्चाताप और धर्म की पहचान

जब समीक ऋषि को इस पूरे घटनाक्रम का ज्ञान हुआ तो उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा कि राजा परीक्षित महान धर्मात्मा हैं और उनसे यह अपराध कलियुग के प्रभाव में हुआ है। ऋषि ने इसे व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि समय का प्रभाव माना और पूरी घटना की जानकारी स्वयं राजा परीक्षित तक पहुँचाई। यह प्रसंग क्षमा, विवेक और आत्मसंयम का उच्चतम आदर्श प्रस्तुत करता है।

राजा परीक्षित का वैराग्य और गंगा तट की ओर प्रस्थान

शाप का ज्ञान होते ही राजा परीक्षित ने राजधर्म का पालन करते हुए तत्काल अपना राज्य पुत्र जनमेजय को सौंप दिया और गंगा नदी के पावन तट पर जाकर आत्मकल्याण का मार्ग अपनाया। वहाँ देश-देशांतर से ऋषि-मुनि, तपस्वी और देवतुल्य संत एकत्र हुए। अंततः महर्षि वेदव्यास के पुत्र शुकदेव जी का आगमन हुआ, जिसने इस कथा को अमर बना दिया।

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सात दिन की भागवत कथा और मोक्ष का द्वार

शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सात दिनों तक श्रीमद्भागवत महापुराण की दिव्य कथा का रसपान कराया। यह कथा केवल शास्त्रीय उपदेश नहीं, बल्कि जीवन की नश्वरता, आत्मा की अमरता और भक्ति की सर्वोच्चता का जीवंत दर्शन है। कथा श्रवण के माध्यम से राजा परीक्षित ने अपने जीवन का परम उद्देश्य—मोक्ष—प्राप्त किया।

कलियुग में नाम-स्मरण ही कल्याण का साधन

कथा व्यास पंडित विनोद शर्मा जी ने श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि कलियुग में न कठिन तप संभव है, न दीर्घ यज्ञ। ऐसे समय में प्रभु का नाम-स्मरण, कीर्तन, सत्संग और भागवत कथा श्रवण ही जीव के उद्धार का सहज और सुलभ मार्ग है। जो व्यक्ति नियमित रूप से हरि नाम का स्मरण करता है, उसका जीवन स्वतः पवित्र और सार्थक हो जाता है।

भजन-कीर्तन, आरती और प्रसाद वितरण

दूसरे दिन की कथा के दौरान संगीतमय भजन-कीर्तन ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। श्रद्धालुओं ने पूरे मनोयोग से भागवत जी की आरती की और प्रसाद ग्रहण किया। बालाजी मंदिर परिसर “हरि बोल” और “जय श्रीकृष्ण” के जयघोष से गूंज उठा, जिससे उपस्थित श्रद्धालुओं के मन में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हुआ।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

शुकदेव–परीक्षित संवाद का मुख्य संदेश क्या है?

इस संवाद का मुख्य संदेश यह है कि जीवन नश्वर है और भक्ति, वैराग्य व आत्मबोध ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

राजा परीक्षित ने राज्य त्याग क्यों किया?

शाप का ज्ञान होते ही उन्होंने सांसारिक मोह छोड़कर आत्मकल्याण के लिए गंगा तट पर जाकर भागवत कथा श्रवण का मार्ग चुना।

कलियुग में भागवत कथा का क्या महत्व है?

कलियुग में भागवत कथा श्रवण, नाम-स्मरण और सत्संग को सबसे सरल और प्रभावी साधना माना गया है।

काम्यवन में आयोजित कथा का विशेष आकर्षण क्या रहा?

संगीतमय कथा, भावपूर्ण व्याख्या और भक्तिमय वातावरण इस आयोजन का मुख्य आकर्षण रहा।

अपना घर आश्रम भरतपुर में लोहड़ी पर्व मनाते प्रभुजन, अग्नि के चारों ओर परंपरागत नृत्य और सिख संस्कृति के अनुसार उत्सव।
भरतपुर स्थित अपना घर आश्रम में लोहड़ी पर्व के दौरान प्रभुजन अग्नि के चारों ओर पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ उत्सव मनाते हुए।

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