तेलंगाना में लाल से नीले तक : नक्सलवाद के पतन और प्रतीक राजनीति के उभार की कहानी

लाल हंसिया-हथौड़ा स्मारक से नीले आंबेडकर प्रतिमा तक फैला दृश्य, जो तेलंगाना में नक्सलवाद से आंबेडकरवाद तक के वैचारिक परिवर्तन को दर्शाता है।

तेलंगाना में लाल से नीले तक : नक्सलवाद के पतन और प्रतीक राजनीति के उभार की कहानी

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 सदानंद इंगीली के साथ दादा गंगाराम की रिपोर्ट

तेलंगाना के गांवों में आज भी सड़कों के किनारे पुराने लाल हंसिया-हथौड़े वाले स्मारक मिल जाते हैं, जो इस क्षेत्र में कभी गूंजे सशस्त्र संघर्ष की याद दिलाते हैं। लेकिन इन स्मारकों के समानांतर अब दलित बस्तियों में नीले रंग का वर्चस्व तेजी से बढ़ा है। चौक-चौराहों पर बी.आर. आंबेडकर की प्रतिमाएं और उनके आदर्शों से जुड़े नारे दिखाई देने लगे हैं। इसके साथ ही शिवाजी और विवेकानंद की नई मूर्तियां भी उभरती हिंदुत्ववादी ताकतों की पहचान बनकर सामने आ रही हैं। यह बदलाव केवल प्रतीकों का नहीं है — यह सामाजिक और वैचारिक बदलाव की गवाही देता है।

आंबेडकरवाद के प्रतीक नीले झंडे और मूर्तियों ने 1990 के दशक से ही लाल वामपंथी प्रतीकों को पीछे छोड़ दिया है। अब गांवों में जो नई तस्वीर उभर रही है, वह यह बताती है कि तेलंगाना की ज़मीन पर विचारधाराओं के बीच संघर्ष अब बंदूक से नहीं बल्कि प्रतीक चिह्नों के ज़रिए हो रहा है।

आंबेडकरवाद, हिंदुत्व और प्रतीक राजनीति

तेलंगाना के सामाजिक परिदृश्य में आंबेडकरवादी विचारधारा अब एक स्थायी पहचान बन चुकी है। नीला रंग, जो दलित चेतना, समानता और न्याय का प्रतीक माना जाता है, आज हर सार्वजनिक आयोजन और स्थानीय जुलूस में प्रमुखता से दिखाई देता है। आंबेडकर की प्रतिमाएं केवल श्रद्धांजलि नहीं बल्कि आत्मसम्मान की घोषणा हैं। वे यह कहती हैं कि यह समाज अब खुद को ‘वंचित’ कहकर सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि समान हक़ और गरिमा की मांग करता है।

दूसरी ओर, हिंदुत्ववादी प्रतीकों की उपस्थिति तेजी से बढ़ी है। शिवाजी और विवेकानंद की मूर्तियों की स्थापना गांवों और कस्बों के केंद्रों में की जा रही है। इन मूर्तियों के माध्यम से उभरती हुई हिंदुत्ववादी राजनीति स्थानीय पहचान को एक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रंग में रंगने का प्रयास कर रही है। ये प्रतीक शक्ति, पराक्रम और राष्ट्रभक्ति की छवि प्रस्तुत करते हैं, जो ग्रामीण युवाओं को आकर्षित करती है।

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तेलंगाना के सामाजिक जीवन में यह बदलाव रंगों के संघर्ष के रूप में भी दिखता है — लाल, जो कभी मजदूर आंदोलन और नक्सल विचारधारा का प्रतीक था, अब नीले और भगवा रंगों से ढंका जा रहा है। सार्वजनिक स्थानों पर यह प्रतिस्पर्धा इस बात का संकेत है कि अब विचारधाराएं अपने विस्तार के लिए हथियारों की नहीं, बल्कि प्रतीकों और स्मृतियों की लड़ाई लड़ रही हैं।

नक्सलवाद का उदय और तेलंगाना की भूमिका

भारत में नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई थी। यह आंदोलन दरअसल जमींदारी शोषण, भूमि असमानता और आदिवासियों के आर्थिक-सामाजिक शोषण के खिलाफ एक विद्रोह था। नक्सलबाड़ी की घटना के बाद यह विचार तेजी से फैला और जल्द ही यह आंदोलन बिहार, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना तक पहुंच गया।

तेलंगाना के समाज में पहले से मौजूद सामंती ढांचा और बंधुआ मजदूरी जैसी व्यवस्थाएं इस आंदोलन के लिए उपजाऊ ज़मीन बनीं। निज़ाम के शासन के बाद भी यहां ज़मींदारों और पेत्तमदारों का दबदबा बना रहा। भूमिहीन मजदूरों, दलितों और आदिवासियों की पीढ़ियाँ इस शोषण से तंग आ चुकी थीं। ऐसे में जब वामपंथी विचारधारा और सशस्त्र संघर्ष का संदेश यहां पहुंचा, तो उसे एक स्थायी आधार मिल गया।

1970 और 1980 के दशक में कोंडापल्ली सीतारमैया के नेतृत्व में “पीपल्स वॉर ग्रुप” और बिहार के “माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी)” जैसे संगठनों का गठन हुआ। इन संगठनों ने संसद की राजनीति को नकारते हुए सीधे सशस्त्र संघर्ष का रास्ता अपनाया। उन्होंने दंडकारण्य के जंगलों में दलित-आदिवासी समाजों के बीच आधार तैयार किया, भूमि पुनर्वितरण, न्यूनतम मजदूरी और बंधुआ मज़दूरी खत्म करने की मुहिम चलाई।

उन दिनों वारंगल का रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज, जो आज एनआईटी कहलाता है, माओवादी विचारधारा के युवाओं का केंद्र बन गया था। नंबाला केशव राव जैसे नेता यहीं से माओवादी आंदोलन से जुड़े। 1980 के दशक में भूमिहीन किसानों ने ज़मींदारों की ज़मीन जब्त कर ली, जिससे कई क्षेत्रों को “अशांत क्षेत्र” घोषित करना पड़ा।

संघर्ष का अंत और सुरक्षा रणनीतियाँ

1990 का दशक आते-आते तेलंगाना में सशस्त्र संघर्ष कमजोर पड़ने लगा। सरकार ने व्यापक स्तर पर पुलिस अभियान चलाए और विशेष बलों — जैसे Greyhounds — को नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात किया। इन अभियानों ने संगठनात्मक ढांचे को गंभीर चोट पहुंचाई।

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साल 2025 तक की सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, तेलंगाना-छत्तीसगढ़ सीमा पर बड़े ऑपरेशन हुए जिनमें माओवादियों के कई ठिकाने नष्ट किए गए। “ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट” जैसे अभियानों ने संगठन की ज़मीन और असर को सीमित कर दिया। कई पुराने कैडर और वरिष्ठ नेता मारे गए या आत्मसमर्पण कर चुके हैं।

तेलंगाना पुलिस और राज्य सरकार ने आत्मसमर्पण करने वालों के लिए पुनर्वास योजनाएं शुरू कीं। कई पूर्व नक्सलियों ने सरकारी योजनाओं के तहत अपने परिवारों के साथ सामान्य जीवन में वापसी की। भद्राद्री-कोठागुडेम जैसे जिलों में ऐसे उदाहरण अब आम हो चुके हैं। केंद्र सरकार ने मार्च 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य रखा है।

आंदोलन की वर्तमान स्थिति

नक्सलवाद का जनाधार अब पहले जैसा नहीं रहा। जिन आदिवासी और दलित इलाकों में कभी माओवादी संगठन सामाजिक सेवाओं और न्याय की बात करते थे, वहां अब सरकारी योजनाओं, रोजगार और शिक्षा ने जगह बना ली है। गांवों में युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ने और सड़क-स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के विस्तार से संघर्ष की सामाजिक ज़मीन कमजोर पड़ी है।

हालांकि यह कहना कि नक्सलवाद पूरी तरह समाप्त हो गया है, जल्दबाज़ी होगी। तेलंगाना-छत्तीसगढ़ की सीमा पर अब भी छोटे स्तर के हमले, फायरिंग और बारूदी सुरंग की घटनाएं सामने आती रहती हैं। इसके बावजूद, आंदोलन की रणनीतिक और वैचारिक दिशा स्पष्ट रूप से बदल चुकी है। अब माओवादी संगठन खुद स्वीकार कर रहे हैं कि सशस्त्र संघर्ष टिकाऊ नहीं रहा।

प्रतीक बनाम संघर्ष : नया सामाजिक समीकरण

आज तेलंगाना में संघर्ष बंदूक से नहीं, प्रतीकों से लड़ा जा रहा है। आंबेडकर की मूर्तियाँ, नीले झंडे और “जय भीम” के नारे इस बात की घोषणा करते हैं कि दलित समाज ने अब सामाजिक न्याय की लड़ाई को अपने हाथों में ले लिया है। वहीं शिवाजी और विवेकानंद की मूर्तियाँ यह दिखाती हैं कि हिंदुत्ववादी ताकतें इतिहास और संस्कृति के पुनः स्वामित्व के ज़रिए अपनी जड़ें मजबूत कर रही हैं।

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इस प्रतिस्पर्धा में नक्सलवाद अब कहीं पृष्ठभूमि में चला गया है। कभी जिन लाल झंडों से भय या उम्मीद का वातावरण बनता था, उनकी जगह अब नीले और भगवा रंग ने ले ली है। लेकिन इन प्रतीकों की लड़ाई के बीच मूल प्रश्न वही हैं — भूमि, न्याय, शिक्षा, समानता और गरिमा। अगर ये सवाल अनुत्तरित रहे, तो संघर्ष के नए रूप कभी भी जन्म ले सकते हैं।

तेलंगाना की चुनौतियाँ और भविष्य की दिशा

तेलंगाना की भौगोलिक स्थिति भी इस समस्या का हिस्सा है। छत्तीसगढ़ की सीमा से सटे जंगल और पठारी क्षेत्र आज भी पुलिस के लिए चुनौती बने हुए हैं। वहीं ग्रामीण इलाकों में विकास योजनाओं का असमान वितरण असंतोष को जन्म देता है।

राज्य सरकार ने नक्सलवाद के समानांतर सामाजिक-राजनीतिक संतुलन के लिए कई पहलें शुरू की हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं के विस्तार से आदिवासी और दलित इलाकों में सुधार हुआ है। साथ ही आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए पुनर्वास और सामाजिक पुनर्संयोजन की योजनाएं लागू की जा रही हैं ताकि वे मुख्यधारा में लौट सकें।

भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन पुनर्वास योजनाओं को टिकाऊ बनाया जाए और स्थानीय नेतृत्व को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाए। केवल पुलिस अभियान नक्सलवाद को समाप्त नहीं कर सकते, बल्कि सामाजिक न्याय और समान अवसर ही स्थायी समाधान दे सकते हैं।

तेलंगाना का अनुभव बताता है कि विचारधाराओं की जड़ें केवल बंदूक से नहीं बल्कि सामाजिक अन्याय और असमानता की मिट्टी से पनपती हैं। आज नक्सलवाद का प्रभाव सीमित है, लेकिन उसके पीछे के कारण — भूमि अधिकार, शिक्षा, रोजगार और सम्मान — अभी भी मौजूद हैं।

प्रतीकों की इस नई राजनीति में अब संघर्ष एक नए रूप में सामने है: नीला, भगवा और लाल रंग — तीनों एक ही सवाल से जूझ रहे हैं कि भारत का असली न्यायपूर्ण समाज कैसा होगा। शायद तेलंगाना का यही बदला हुआ परिदृश्य इस सवाल का सबसे जीवंत उत्तर है — कि संघर्ष बदल सकता है, पर उसकी आत्मा नहीं मरती।

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