नाबालिग लड़का और 23 वर्षीय गर्लफ्रेंड पकड़े गए रंगेहाथ, आगे जो हुआ वह गंभीर सवाल छोड़ गया

गोरखपुर में नाबालिग लड़का और 23 वर्षीय युवती से जुड़ा विवादित प्रेम और जबरन शादी का सांकेतिक दृश्य

✍️इरफान अली लारी की रिपोर्ट
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नाबालिग लड़का और 23 वर्षीय गर्लफ्रेंड का यह मामला सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह कानून, सामाजिक दबाव, पुलिस की भूमिका और बाल अधिकारों से जुड़े कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

नाबालिग लड़का और 23 वर्षीय गर्लफ्रेंड से जुड़ी यह चौंकाने वाली घटना उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के पिपराइच थाना क्षेत्र से सामने आई है। पहली नज़र में यह मामला प्रेम संबंधों का प्रतीत होता है, लेकिन जैसे-जैसे घटनाक्रम आगे बढ़ता है, यह सामाजिक भय, कानून की अनदेखी और प्रशासनिक संवेदनहीनता की परतें खोलता चला जाता है। एक 16 वर्षीय किशोर का अपनी 23 वर्षीय प्रेमिका से मिलना उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बन गया, जिसकी परिणति पहले जबरन विवाह, फिर थाने में कथित बदसलूकी और अंततः पंचायत व कोर्ट मैरिज तक पहुंची।

गुपचुप मुलाकात और रंगेहाथ पकड़े जाने की घटना

जानकारी के अनुसार, पिपराइच इलाके का रहने वाला 16 साल का किशोर अपनी 23 वर्षीय प्रेमिका से मिलने चुपचाप उसके घर पहुंचा था। दोनों के बीच प्रेम संबंध काफी समय से बताए जा रहे हैं, लेकिन इसकी जानकारी परिवार वालों को नहीं थी। इसी दौरान लड़की के परिजन अचानक घर पहुंच गए और दोनों को एक साथ देख लिया। यह क्षण पूरे घटनाक्रम का टर्निंग पॉइंट बन गया।

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परिजनों का गुस्सा चरम पर था। सामाजिक बदनामी और भविष्य की आशंकाओं ने उन्हें ऐसा कदम उठाने के लिए प्रेरित किया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

मोहल्ले के सामने सिंदूर, डर और सामाजिक दबाव

लड़की के घरवालों ने बिना देर किए मोहल्ले के लोगों को इकट्ठा किया। उनके मन में यह भय था कि यदि मामला खुला रह गया तो सामाजिक बदनामी होगी और भविष्य में कानूनी उलझनें पैदा हो सकती हैं। इसी डर के चलते उन्होंने नाबालिग किशोर से लड़की की मांग में सिंदूर भरवा दिया और इसे विवाह का रूप दे दिया।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या एक नाबालिग को सामाजिक दबाव में विवाह के लिए बाध्य किया जा सकता है? कानून की दृष्टि में यह विवाह वैध नहीं माना जाता, फिर भी समाज में ऐसे मामलों को “इज्जत बचाने” के नाम पर जायज़ ठहराया जाता रहा है।

थाने का रुख और कानूनी मान्यता की कोशिश

मोहल्ले में कराई गई इस कथित शादी के बाद परिजन रात में ही किशोर और युवती को लेकर पिपराइच थाने पहुंचे। उद्देश्य था इस विवाह को कानूनी रूप दिलाना ताकि भविष्य में कोई विवाद न खड़ा हो। हालांकि, यहीं से मामला और अधिक गंभीर हो गया।

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परिजनों का आरोप है कि थाने में मौजूद एक दीवान, जो उस समय सिविल ड्रेस में थे और कथित तौर पर नशे में थे, उन्होंने बेहद अभद्र व्यवहार किया। उन्हें थाने से भगा दिया गया और किशोर को हवालात में बंद कर दिया गया।

हवालात में नाबालिग और उठते सवाल

एक नाबालिग को हवालात में बंद किया जाना अपने आप में गंभीर सवाल खड़े करता है। बाल अधिकारों और किशोर न्याय कानून के तहत नाबालिग के साथ इस तरह का व्यवहार पूरी तरह गैर-कानूनी माना जाता है। परिजनों का कहना है कि पूरी रात किशोर हवालात में बंद रहा और अगले दिन शनिवार की सुबह उसे रिहा किया गया।

इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस की कार्यप्रणाली और संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। क्या नाबालिग के मामले में बाल कल्याण समिति को सूचित किया गया? क्या उसके अधिकारों का संरक्षण किया गया? इन सवालों के जवाब फिलहाल अधूरे हैं।

पंचायत, मंदिर विवाह और कोर्ट मैरिज

थाने से रिहाई के बाद गांव में एक पंचायत बुलाई गई। दोनों परिवारों ने आपसी बातचीत के बाद सहमति जताई। इसके बाद मंदिर में विधिवत शादी करवाई गई और फिर इस रिश्ते को कानूनी मान्यता देने के लिए कोर्ट मैरिज भी कराई गई।

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अब युवती को पूरे रीति-रिवाज के साथ ससुराल विदा कर दिया गया है। हालांकि, कानूनी दृष्टि से नाबालिग की उम्र और विवाह की वैधता को लेकर अभी भी कई प्रश्न अनुत्तरित हैं।

प्रेम, कानून और समाज के बीच फंसा एक किशोर

नाबालिग लड़का और 23 वर्षीय गर्लफ्रेंड का यह मामला एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमारे समाज में प्रेम, कानून और सामाजिक दबाव के बीच संतुलन कितना कमजोर है। एक किशोर, जो खुद अपनी उम्र और अधिकारों को समझने की अवस्था में है, उसे जीवनभर के बंधन में बांध दिया गया।

यह घटना केवल गोरखपुर या पिपराइच तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई हिस्सों में ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं, जहां कानून से ज्यादा समाज के डर को प्राथमिकता दी जाती है।

इस पूरे मामले ने प्रशासन, समाज और कानून व्यवस्था के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या नाबालिग के अधिकार सुरक्षित हैं? क्या पुलिस ने अपने कर्तव्यों का पालन किया? और सबसे बड़ा सवाल—क्या सामाजिक दबाव के नाम पर किसी किशोर का भविष्य तय कर देना न्यायसंगत है? इन सवालों के जवाब तलाशना अब बेहद ज़रूरी हो गया है।

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